सूरजवन दो बड़े शहरों के बीच एक खूब घना जंगल था । उत्तर के तरफ पहाड़ों की लंबी
तराई और दक्षिण मे नदी सूरजवन की रक्षा करती थी । आज सूरजवन मे बहुत चहल-पहल थी।
कारण था शेरनी रानी ने महीने पहले दो खूबसूरत शावकों को जन्म दिया था। आज दोनों
शावकों का नामकरण होना था । शेर राजा ने पूरे जंगल को दावत दे डाली थी। सेनापति
हाथी राठौर के लिए पड़ोस के जंगल से सिंगापूरी केलों का 10 हौद मंगाया गया था। भालू
मंत्री के लिए श्हद से भरा दो घड़ा आया था। सभी के पसंद के मुताबिक भोज मे इंतजाम
था।
जश्न के बीच, बंदर पंडित के
सामने दोनों शावकों को लाया गया। दोनों बहुत खूबसूरत, पर एकदम एक जैसी शक्ल-सूरत। कभी-कभी तो उनकी माँ भी धोखा खा जाती थी। एक का
नाम शेरु रखा गया क्योंकि वह मिजाज से बहुत निडर और तेज-तर्रार था। दूसरे का नाम
मेरु रखा गया । मेरु बहुत शरारती और खिलाड़ी स्वभाव का था। दोनों बहुत तेज थे। दो
दिन मे उन्हे अपने नाम का ज्ञान हो गया। दोनों बहुत तरह के खेल खेला करते। जब
लौटने का समय होता तो दोनों एक दूसरे को आवाज लगते। आवाज भी एक खास किस्म की –
याहू ! याहू ! दोनों संग-संग घर लौटते।
शेरु और मेरु को माँ के साथ खेलना बहुत अच्छा लगता था। पिता से उन्हे डर लगता
था। कभी-कभी खेलते-खेलते वे सड़क की ओर निकल जाया करते थे। इस बात से माँ बहुत डरती
थी। एक दिन माँ उन दोनों को लेकर सड़क के पास के झुरमुठ मे छिपकर बैठ गई। सड़क पर
छोटी-बड़ी सभी तरह की गाड़िया दौड़ रही थी। माँ ने सबकी पहचान कराई। पहले तो
शेरु-मेरु गाड़ियों को भी किसी तरह का भयानक जानवर समझ बैठे थे। माँ ने बताया की
इनमे दुनिया का सबसे भयानक जानवर सवारी करता है जिसे इंसान कहते हैं। तभी एक मोटर
कार रुकी । उसमें से एक आदमी निकला। कार का
मुंह खोलकर उसे पानी पिलाया। कार के जाने के बाद शेरु-मेरु हंसने लगे। इतना छोटा
जानवर जिसके न लंबे दाँत हैं और न नुकीले नाखून। दो पैरों से चलने वाला क्या
खतरनाक भी हो सकता है। लौटते समय माँ ने
इंसान के बारे मे बहुत कुछ बताया। खासकर उसकी बंदूक और भाले के बारे मे बताया। यह भी बताया की उनके चाचा को
इन्सानों ने कैसे घेरकर बंदूक का निशाना बनाया था।
बहुत दिनों तक शेरु-मेरु सड़क की तरफ नहीं गए। पर होनी को कोई कैसे टाल सकता
है। एक शाम दोनों आस-पास खेल रहे थे। मालूम नहीं शेरु कहाँ छिप गया था।
खोजते-खोजते मेरु सड़क की तरफ निकल आया। अंधेरा होने को आ रहा था। पूरी सड़क वीरान
थी। अचानक मेरु को लगा की सड़क के उस पर झड़ियों मे कोई छिपा है। शेरु को पकड़ने के
रोमांच मे वह सड़क पार करने लगा। तभी सड़क पर एक मोटर कार आने लगी। कार की दोनों
आंखे भयंकर चमक रही थी। मेरु की आंखे चौधियाँ गई। वह अंधा सा हो गया और सड़क पर बैठ
गया । मोटर कार ठीक उसके सामने चिंघारते हुए रूकी। उसमें से एक आदमी निकला। उसने
मेरु के ऊपर एक भारी कपड़ा डाल दिया । मेरु को उस कपड़े मे लपेट कर कार की डिक्की
खोल उसमें बंद कर दिया। देखते-देखते कार आँखों से ओझल हो गई। शेरु अबतक छिपा हुआ
सबकुछ देख रहा था। वह कार के पीछे दौड़ा भी । कार की रफ्तार को वह पकड़ नहीं पाया।
शेरु हाफ़ता हुआ माँ के पास गुफा मे पहुंचा। माँ तो ऐसे ही अंधेरा हो जाने के
कारण व्याकुल इंतजार कर रही थी।मेरु को न देख व्हा बहुत घबरा गई। शेरु ने सब बात
बताई। यह भी बताया की कैसे मेरु को गाड़ी के मुंह मे डाला गया था। शेर राजा और
शेरनी रानी रात भर सड़क के किनारे बैठे मेरु की बाट जोहते रहे। अंत मे सबेरा होने पर हाथी सेनापति और भालू मंत्री
उन्हे बीहड़ मे लौटा लाये। सभी पक्षियों को चारों दिशाओं मे मेरु का पता लगाने के
लिए भेजा गया। स्वयम बंदर पंडित अपने शिष्यों के साथ छिपते-छिपाते उस शहर गए जिधर
कार गई थी। इतने बड़े शहर मे मेरु को खोज निकालना सूई के समान था। शेरनी माँ हर सुबह
सड़क के किनारे आ बैठती। अंधेरा होने पर लौटती। दोनों माँ-बाप खाना-पीना भूल गए थे।
उनके दुख को कोई भी कम नहीं कर पाता था । मेरु के दुख मे दोनों बीमार रहने लगे। वर्ष
भर के अंदर दोनों की मृत्यु हो गई।
मेरु कार की डिक्की के अंधेरे मे बहुत देर पड़ा रहा। कार के हिचकोलो से उसे
नींद आ गई। जब आँख खुली तो उस्न अपने को एक बड़ी गुफा मे पाया। वह गुफा नहीं थी ।
वह कार का गैरेज था। उसका पैर एक खूँटे से चैन कर दिया गया था। उसके सामने दूध से
भरा कटोरा रख दिया गया था। पहले तो वह बहुत चीखा-चिल्लाया-गुर्राया पर अंत मे
थक-हार कर शांत होकर बैठ गया। उसका गला सूख गया था। उसे बड़े ज़ोरों की भूख लग गई
थी। बहुत सहमते उसने दूध के कटोरे मे मुंह लगाया। दूध अच्छा था। उसने एक सांस मे
कटोरा खाली कर दिया। देखते-देखते, सप्ताह बीत गया। अब
उसे मांस के टुकड़े भी खाने को मिलते थे। शाम के समय गैरेज का दरवाजा खोल दिया जाता
था। भीड़ उमड़ पड़ती थी उसे देखने के लिए। बच्चे बड़े बूढ़े सभी आते थे। खूब फोटो खींची
जाती थी। शुरू मे मेरु चमकारे से डरता था।
बाद मे उसे आदत हो गई।
एक दिन गैरेज के पास एक वैन आकर खड़ी हुई। वैन मे आए अजनबी उसके पास आने की
कोशिश करने लगे। मेरु गुर्रा कर और पंजे दिखाकर उन्हे पास आने से रोकता रहा। तभी
उसके गले मे कुछ चुभता हुआ सा लगा। मेरु को डार्ट से बेहोश कर दिया गया था। इस बार
जब वह नींद से जागा तो उसने अपने को तरह-तरह के जानवरों के बीच पाया। कोई पेड़ नहीं, कोई झाड़ी नहीं, कोई जंगल नहीं।
हाथी और ऊंट को छोड़कर सभी जानवर पिंजरे मे बंद थे। 10 से ज्यादा तो बड़े-बड़े शेर
रहे होंगे। भालू भी था, बंदर भी थे और एक
भयंकर बनमानुस भी था। तोता-मैना अपनी भाषा कम आदमी की भाषा ज्यादा बोलते थे। उसे
देश के एक बड़े सर्कस कंपनी मे लाया गया था।
बहुत दिनों तक तो उसे पिंजरे मे रख सर्कस मे होती ट्रेनिंग दिखते रहे। एक
महीने बाद उसे भी सर्कस के रिहर्सल मे रखा जाने लगा। उसे भी उठना –बैठना , आने-जाने-खाने –पीने की ट्रेनिंग दी जाने लगी। उसे की-वर्ड याद कराया जाने
लगा। एक महीने बाद ट्रेनिंग कठिन होने लगी। कुर्सी पर बैठना, रिंग के अंदर से छ्लंग लगाना, और ऊंचे बार पर
चलना सिखया जाने लगा। उसे ये सब ट्रेनिंग बहुत अच्छी लगती थी। मेरु कुछ ही दिन मे सबकुछ
ठीक से कर रिंग मास्टर को खुश कर देता था।
एक सुबह, रिंग मास्टर उसके
पास आकर बहुत प्यार करने लगा । उसे खाने के लिए स्वादिष्ट हड्डी भी मिली। उसके बाद
रिंग मास्टर मेरु को प्रैक्टिस के लिए अखाड़े के अंदर ले गया। बीचोबीच 4 फूट की
ऊंचाई पर रिंग लटकाई गई। उसके बाद उस रिंग पर रस्सी लपेटी गई। मेरु को कई बार उसके
अंदर से छलांग लगाने का इशारा किया गया। एक बार भी गलती नहीं हुई। सभी लोग ताली
बजाने लगे। उसके बाद वह हुआ जो उसने कभी न सुना था और न देखा था। पर देखते ही एक
शेर होने के बावजूद वह बहुत भयभीत हो गया। रिंग से आग की लपट निकल रही थी। जानवर , खासकर रोये वाले जानवर जन्मजात सबसे ज्यादा आग से भयभीत होते हैं। उस दिन उसे
दो बार करेंट वाले कोड़े से मारा गया। सभी
जानवर अपने पिंजरे से यह सब देख रहे थे। कोड़े की आवाज सुनकर बंदर चीखने लगे, शेर गुर्राने लगे , बनमानुस और भालू
अपना सीना पीटने लगे। एक शेर के बच्चे को कोड़े से मारना उन्हे बहुत बुरा लगा था।
मेरु को कैद मे रखा गया। उसे भूखा रखा गया। उसे डराया गया। उसे मारा गया। उसे
दुलार भी किया गया। आखिरकार, मेरु ने एक दिन आग
की लपटों से घिरे रिंग के बीच से छलांग लगा ही दी। उस दिन रिंग मास्टर से लेकर, सर्कस के सभी खिलाड़ी, यहाँ तक की पिंजरे
मे बंद जानवरों मे खुशी की लहर दौड़ गई। सभी को उनके लायक भोज सामग्री दी गई।
देखते-देखते ३ वर्ष बीत गए। मेरु अब एक सजीला जवान हो गया था। उसके करतब, खासकर, जलते रिंग की छलांग
और लंबी ऊंची रस्सी पर चलना देखने के लिए
भीड़ उमड़ पड़ती थी। मेरु का खेल सर्कस का शो-स्टोपर हुआ करता था दो जलती रिंग के अंदर से छलांग लगाना।। मेरु अपने भाई और माता-पिता को एक क्षण
के लिए भी नहीं भूला था। जब कभी वह बहुत उदास हो जाता तो उसे भालू अपने से सटाकर
बैठा लेता। मेरु कितनी बार नींद मे सपने से चौक उठता था। उसे बस यही सपना आता था
की शेरु उसकी तेज रफ्तार कार के पीछे दौड़ता हुआ ओझल होता जा रहा है। उसे हमेशा
सूरजवन की याद आती रहती थी। है। उसे हमेशा माता-पिता की याद आती रहती थी। बस उसे
यह समझ मे नहीं आ रहा था कि किस तरह पिंजरे और सर्कस से आजादी मिले और वह भाग कर
अपने माता-पिता और भाई शेरु के पास पहुँच जाये।
३ वर्षों मे शेरु बहुत सजीला, गठीला और फुरतीला पर
खूंखार शेर बन चुका था । खूंखार बनाने के बहुत कारण थे। मेरु का लापता होना सभी के
लिए बहुत दुखदायी था ।शेरु-मेरु की मान तो मेरु के इंतजार मे रोते-रोते मर गई।
उनके पिता जो सुबह-शाम मेरु को खोजने काली सड़क के तरफ जाते थे, एक दिन गोली के शिकार हो गए। शेरु स्वयम बिना भाई के अकेला रहने से चिड़चिड़ा
हो गया। माँ-बाप की अकाल मृत्यु और मेरु से बिछड़ना ,
शेरु को खूंखार बनाते चल गए।
शेरु को सूरजवन का राजा बनाया गया । उसे क्रोध बहुत जल्द आता था। इस कार्न, सभी जानवर उससे दूरी बनाए रखते थे। अब महीने मे एक-आध बार ही सूरजवन मे सभा
हुआ करती थी। जानवर मात्र समाचार का आदान-प्रदान करते थे। कोई शिकवा-शिकायत नहीं।
उन्हे पता था की इंसाफ मे किसी न किसी को मृत्यु दंड अवश्य मिलेगा। शेरु शिकार
करने और भोजन करने अपने माँ-बाप की तरह दूसरे जंगल जाया करता था। वह भी अपने वन के
जानवरों को अपने परिवार का सदस्य मानता था। पर क्रोध में वह दोषी को अपने हाथों से
मृत्यु दंड देता था।
शेरु अभी भी सड़क की तरफ जाता था। वह घंटों सड़क के किनारे झाड़ियों मे छिपकर
बैठा रहता। उसे उम्मीद थी की एक दिन मेरु अवश्य वापिस आएगा। वह एक बार सड़क के
किनारे-किनारे उस तरफ बहुत दूर तक चलाया गया था जिधर गाड़ीवाले उसे उठाकर ले गए थे।
मेरु सर्कस के कारवां के साथ शहर- शहर जाता रहा। जब कभी कारवां किसी जंगल के
बीच से गुजरता रहता मेरु आवाजें सुनने-समझने और महक पहचानने की भरसक कोशिश करता।
एक वर्ष बहुत बारिश हुई। एक तरफ नदी का चढ़ता पानी और दूसरी तरफ पहाड़ियों से
गिरता पानी शहर में बहुत भयानक बाढ़ ले आया। लोग-बाग सामान-असबाब लेकर ऊंची जगहों
पर जाने लगे। मवेशी और अन्य जानवर भी अपनी जान बचाने की भरसक कोशिश कर रहे थे। कुछ
तो द्दोब गए और कुछ पहाड़ियों पर सुरक्शित जगहों पर चले गए। उसी समय सर्कस कंपनी भी
उसी शहर में तम्बू गाड़े खेल दिखा रही थी। वे ऐसी भंयकर बाढ़ में भरी-भरकम लश्कर और
जानवरों के साथ भागे तो कहाँ भांगे । बढ़वासी में उन्होने जो कुछ बन्न्ध पाये उसे
लेकर पहाड़ियों पर भाग गए। जानवरों को मजबूरन पिजरे से खोलना पड़ा। क्या नजारा था ? हाथी और ऊंट के ऊपर सवारी करते भालू,
बंदर और शेर। सभी बहते-बचते पहाड़ी की ओर निकल पड़े।
तभी मेरु को अपने जंगल की गंध आई। वह व्याकुल हो गया। वह एक हाथी के ऊपर बैठा
हुआ बाढ़ को पार कर रहा था। उससे रहा न गया। उसने बेतहाशा एक पेड़ की टहनी पकड़ पेड़ पर चढ़ गया। पेड़ की
फुनगी पर बैठ वह भूखे-प्यासे दिन-रात बाढ़ के पानी के उतरने का इंतजार करने लगा। ४
दिनों बाद बाढ़ के पानी का बहाव कम हुआ और कहीं-कहीं जमीन भी दिखने लगी। मेरु पेड़
से उतर कर जंगल मे घुस गया।
शेरु को भी मेरु की गंध मिलने लगी थी जबकी वे एक-दूसरे से मिलों दूर थे। शेरु
धीरे-धीरे गंध की ओर बढ्ने लगा। ऐसे बाढ़ के चलते जंगल में पहले से बसी गंध मे बहुत
कमी आ आ गई थी। हवा विपरीत होने पर गंध भी मिलना बंद हो जाती थी। रात गहराती चली
जाती थी। एक समय ऐसा आया की शेरु-मेरु को एक दूसरे की जोरदार खुशबू मिलने लगी।
दोनों अनायास चिल्लाने लगे । शेरु-शेरु,
मेरु-मेरु।
उनका मिलाप भारत मिलाप जैसा ही प्यारा और द्रवित करने वाला था। जंगल के सभी
जानवरों की अंखे गीली थीं। शेरु-मेरु तो एक दूसरे को छोडते ही नहीं थे। कभे गले
मिलना, कभी चाटना, कभी सूंघना और कभे पंजों से एक दूसे के शरीर को सहलाना। यह मंजर रात भर चला।
सुबह-सबेरे, भेड़ियों के जमात
बहुत सारा स्वादिष्ट भोजन लेकर पहुंचे। मेरु तो कई दिनों से भूखा था।
कुछ दिनों बाद जंगल के राजा शेरु ने
आम सभा बुलाई। सभी जानवर डरते-सहमते सभा मंच के चारो तरफ जमा होने लगे। पर यह
क्या। उस चट्टान जैसे मंच पर जो राजा का सिंहासन हुआ करता था। उसपर तरह-तरह के
सवाड़ीस्घ्त भोजन रखे हुए थे। पेड़ की डालोंपर तरह-तरह के पक्षी समूह बैठे हुए थे।
कभी मैं समूह राग भैरवी पर कोई गीत गाता तो कभी तोते राग मालकौस छेड़ते। जब गधे और
घोड़े अपनी तान छेड़ते तो वातावरण हंसी से गूंज उठता । सभी ने मोर का नृत्य और भालू
का पाश्चात्य डांस बहुत पसंद किया। जब शेरु राजा मेरु के साथ मंच पर सज-धज कर आए
तो यह पता पाना असंभव सा था की कौन शेरु है और और कौन मेरु। जब हाथी ने जय-जयकार
की ध्वनि ले साथ सर्वप्रथम शेरु को माला पहनाई तब सभी को मालूम हुआ।
आज बहुत ही महत्वपूर्ण
“The air was full of all the night noises
that, taken together, make one big silence...”
Keep peace withe Lords of the
Jungle — the Tiger, the Panther, and Bear.
And trouble not Hathi the Silent, and mock not the Boar in his lair.
And trouble not Hathi the Silent, and mock not the Boar in his lair.
“One of the beauties of
Jungle Law is that punishment settles all scores. There is no nagging
afterward.”