Saturday, 27 June 2020

कोबरा

मैंने गौडफादर पर बनी मूवी पहले देखी और बाद मे उपन्यास। मूवी का सबसे रोमांचक क्षण तब आता है जब अपने पाँचों माफिया दावेदारों से रंजिश भुलाकर माईकल से मिलने का दिन तय होता है। माईकल के दिमाग में एक निर्मम योजना थी। तय दिन सुबह माईकल चर्च में अपने बड़े भाई के बच्चे का बपतिस्मा करा रहा होता है, चर्च की घंटियाँ बज रही होती हैं और उसी समय पाँचों दुश्मनों को मौत के घाट उतारा जा रहा होता है। मुझे अपने मोहल्ले के १२ वर्षीय रघुराज की याद आ गयी ।  उसने भी उस कच्ची उम्र में अपने तीन दुश्मनों से  एक झटके में इंतकाम लिया था ।

वह समय आजाद भारत के अंगड़ाई लेकर जागने का था। एक तरफ पंडित नेहरू बड़े-बड़े कल-कारखाने लगवा रहे थे तो दूसरी ओर सुहारवर्दी का पुतला जलाया जाता था। आजाद भारत का पहले छात्र आंदोलन की आग ठंडी पड चुकी थी। उपराष्ट्रपति राधाकृष्णनन राष्ट्रपति पद की दावेदारी ठोकने लगे थे।

रघु घर का क्या पूरे पड़ोस का दुबला-पतला , कमजोर दिखने वाला, सबसे छोटे कद का लड़का था। यही कमजोरी उसकी मजबूती होने वाली थी। उसकी कोशिश रहती की वह खेलकूद में ही नहीं अपितु बदमाशी, मस्ती, लड़ाई-झगड़े यहाँ तक की पढ़ाई-लिखाई में भी सबसे अव्वल रहे। पीटता था पिटाता था परंतु झुकता नहीं था। मजाल है की कोई उसको चोट अथवा हानि पहुंचा दे। कितना भी ताकतवर हो, कितना भी चालाक हो , रघु बदला ले ही लेता था, आज नहीं तो कल, कल नहीं तो बरसों बाद। इसी कारण उसे उसके सहचर कोबरा-करैत की संज्ञा देते ते।

एक बार किसी बात पर उसकी तकरार अपने से बड़े और शक्तिशाली लड़के भोला  से हो गई। बात मारा-मारी पर आ गई। उस लड़के ने रघु की जमकर पिटाई की। उस दिन के बाद रघु उसके साथ खेल में तो शामिल होता था पर बातचीत बिलकुल बंद। 6 महीने बाद सब कोई आसपास (लुका-छिपी) खेल रहे थे। रघु ने देख रखा था कि खेल के मैदान के कोने में एक बड़ा गड्ढा था। उसमें एक काला कटखना कुत्ता दोपहरी की गर्मी से बचने के लिए आराम करता था। भोला  चोर बना था और बाकी छिपे लड़को को खोज रहा था। सबसे पहले रघु बरामद हुआ। रघु ने गड्ढे के पास जाकर ऐसा दिखाया कि कोई उसमें छिपा हुआ है। भोला  ताड़ गया।भोला  ने जांच करने के लिए एक कंकड़ फेका। यहीं गलती हो गई। गड्ढे में हरकत हुई।  जैसे ही वह धप्पा करने के लिए गड्ढे में झाँका, काला कुत्ता कंकड़ से बौखलाया, उसपर झपट पड़ा । लहू लुहान भोला  को रघु और सब खेलेने वालों ने टांग कर घर पहुंचाया। मोटे सूए से 14 इंजेक्शन लगे उसके पेट पर। 15-20 दिन बाद भोला  खेल के मैदान पर आया। आते ही रघु की तरफ बढ़ा। सब कोई चौकन्ने हो गए। आश्चर्य कि भोला  ने रघु के पैर पकड़ लिए और माफी मांगी।

उस दिन के बाद लोगबाग ज्यादा सचेत हो गए। कोई रघु से पंगा नहीं लेता था। पर दुनिया तो बहुत बड़ी है। एक दिन क्रिकेट खेलते समय गेंद गोपाल के दोमंजिले छत पर जा गिरी। गोपाल के चाचा कॉलेज में पढ़ते थे। बहुत गुस्सैल और तुनक मिजाज थे। एयर गन से चिड़ियों का शिकार करते थे। किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी गेंद लिवा लाने की। जाते भी कैसे। दोपहर को सबकोई घर का दरवाजा बंद करके आराम करते थे। ऐसे भी पड़ोस में बच्चों का शोरगुल किसे अच्छा लगता है। रघु को एक मौका लग गया अपनी बहादुरी दिखाने का। जबतक कोई समझता वह छत से नीचे आते बरसाती ह्यूम पाइप से ऊपर चढ़ता दिखाई दिया जैसे लोग ताड़ के पेड़ पर चढ़ते हैं। छत पर उसे गेंद खोजने में परेशानी हो रही थी। गेंद मिल तो गया पर साथ ही गोपाल के चाचा जग गए। वे चिल्लाये, एयर गन लेकर दौड़े और नीचे उतरते रघु पर छर्रा दाग दिया। छर्रे से रघु की बांह छिल गई। उसके बाद रघु ने गोपाल के व्यसक चाचा को अभिवादन करना छोड़ दिया। जब भी दोनों आमने-सामने होते, रघु की घूरती आंखे उन्हें हिंसक नजरों से पीछा करती।

सब बच्चों ने पैसा जमा कर क्रिकेट के बैट और 4 विकेट बढ़ई से बनवाए थे। उस सड़क के दादा शंकर को बैट-विकेट पसंद आ गए। जब भी इच्छा होती मांगकर अथवा छीन कर ले जाता। एक बार तो हुज्जत कुछ ज्यादा बढ़ गई। शंकर एक तगड़ा घूंसेबाज़ था। रघु के आपत्ति करने पर उसने एक घूंसा उसके मुंह पर जड़ दिया। होंठों से खून छलक उठा। शंकर बैट-विकेट छीन कर अपने घर ले गया। उसने धमकी भी दे डाली। अगर कोई भी हाथ लगाएगा तो बहुत पिटेगा। उसके बाद छोटे बच्चे दीवार पर 3 लकीर खींचकर या एक तिपाई रखकर पुराने टूटे बैट से खेलने लग गए। जब कभी शंकर का मन करता वह बैट-विकेट खेलने अपने कोर्टयार्ड में बुला लेता। शायद अंग्रेजों के शासन में हिंदुस्तानियों को ऐसा ही लगता होगा जैसा इन बच्चों को लगता था।

एक दिन रघु फिर शंकर के हाथों बुरी तरह पीट गया। रघु अपने साथियों के साथ बैट-विकेट वापस हथियाने की बहुतेरी योजना बनाता रहता था। इसकी चुगली रमेश ने शंकर से कर दी। रघु ने मन ही मन फैसला किया। वह अपनी योजना में किसी को शामिल नहीं करेगा। कोई भी चूक बहुत भारी हो सकती थी। इसलिए बचने का रास्ता भी अचूक होना चाहिए।

देखते-देखते एक साल बीत गए। रघु के पिताजी का तबादले का ऑर्डर आ गया। एक महीने के अंदर जाना था। एक-एक करके दिन नजदीक आता जा रहा था। रघु की बैचेनी बढ़ती जा रही थी। घर का समान बड़े-बड़े लकड़ी के बक्से में पैक होता जा रहा था। एक दिन दोपहरी को एक ट्रक घर के सामने आ लगा। कुली तैयार पैकेज लादने लगे। यही एक और आखिरी मौका था।

ढलती दोपहरी को रघु शंकर के घर के सामने था। शंकर का छोटा भाई शुक्ला जो हर वक्त खेलने को तैयार रहता था, दौड़ कर आ गया और मिन्नत करने लगा “आसपास” खेलने को। ऐसा हरदम होता था। यही रघु की योजना की बुनियाद बनी। पहले रघु चोर बना और दिखावटी देर लगाकर शुक्ला को ढूंढा। इसे बीच रघु ने ताड़ लिया की बैट-विकेट घर के पिछले हिस्से में खुले गैरेज की दीवार पास रखा था। गैरेज के बगल से गलियारा पीछे की दीवार तक जाता था। दीवार 10 फीट ऊंची रही होगी। उसके पीछे सर्विस लेन थी जहां अहले सुबह मेहतर आते थे और देर रात कभी-कभी चोर। बच्चे भी आम-अमरूद-ईमली चोरी से तोड़ने उधर जाते थे।

इस बार शुक्ला चोर बना। उसे आँख मूँद कर 100 तक गिनती गिननी थी वह भी मकान की ओट में दूसरी ओर खड़े होकर। 100 तक गिनती गिनने में 7 वर्ष के बच्चे को 3 मिनट तो लगते ही। रघु दौड़ कर छिपने के बजाय गैरेज के अंदर से  बैट-विकेट लेकर दौड़ता  हुआ एक-एक कर सभी को दीवार के पार सर्विस लेन की तरफ उछाल दिया।

आसपास खेलने के बाद थक कर रघु और शुक्ला गेट के बाहर पुलिया पर सुस्ताने और बतियाने लगे। तभी एक गिरगिट सामने वाले गोपाल के चाचा के मुंडेर पर दिखा और दिखा 6/6 फीट का हरी नक्काशी वाली शीशे की बहुत बड़ी खिड़की। गोपाल का पूरा परिवार पूजा की छुट्टियों में गाँव गया हुआ था। रघु के दिमाग की बत्ती कौंधी। शुक्ल को गिरगिट पर निशाना साधने के लिए उकसाया। भला छोटे से शुक्ला से क्या निशाना सधता। कमान रघु ने संभाली। बड़ा सा पत्थर उठाया। रघु का सोचा समझा  निशाना भी भयानक रूप से चूंका। गिरगिट को लगने के बजाय शीशे पर लगा। पूरा भारी-भरकम शीशा आवाज के साथ गिरा। शुक्ला को काटो तो खून नहीं। दोनों में तुरत सहमति हुई- किसी को कुछ नहीं बताएँगे और अपने-अपने घर भाग लिए।

रघु अपने घर से एक बोरा लेकर तेज कदमों से 2 फरलांग दूर सर्विस लेन गया। बैट-विकेट को बोरे में डाला, बोरे का मुंह को रस्सी से कसकर बांधा। तुरत ही वह ट्रक के पास आकर, खलासी से उस बोरे को सहेज कर रखवा दिया।

वर्षा रुक-रुक कर लगातार हो रही थी। शाम का अंधेरा छाने लगा था। ट्रक अब रवाना होने की तैयारी में था। रघु की अगली योजना और भी रोमांचक थी। रघु ने अपना टूटा जूता हाथ में लिया और माँ से पैसे लेकर मरम्मत को निकल गया। सुबह होते ही ट्रेन से रवाना होना था। मोची को जूता देकर 1 घंटे में आने को कह रघु अपने दूसरे मिशन पर निकल पड़ा। उसे मालूम था कि शंकर रात होने पर खेल कर दोस्तो के साथ मस्ती कर घर लौटता है।

रघु पुनः सर्विस लेन में आगे बढ़ रहा था। अंधेरा बढ़ता ही जा रहा था। उसके हाथ में गुलेल और 5 शीशे की गोलियां थीं। शंकर के घर के पिछवाड़े पुरानी दीवार के पास पहुँच उसने 2-3 ईंटें दीवार से निकाले पैर जमाने के लिए। दीवार पर चढ़ रघु अपने शिकार की ताक में जम कर बैठ गया। ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा।

शंकर भींगते ठिठुरते सामने गेट से दाखिल हो आगे बढ्ने लगा। तभी गुलेल की गोले झन्नाटे से उसकी कनपटी पर लगी। वह वहीं अचेत होकर गिर गया।

घर से निकले एक घंटे से ऊपर हो चुका था। रघु मोची की दुकान से जूता लेकर बारिश में भींगते हुए 100 मीटर के धावक की तरह दौड़ते हुए घर की ओर भागा। सामने से रमेश आ रहा था। बिल्ली के भाग से छींका टूटा। रघु ने मुट्ठी बाँधी और बगल से गुजरते हुए उसके पेट पर एक जोरदार मुक्का मारा। एकदम न्यूटन के इम्पल्सिव फोर्स सा मुक्का खाकर रमेश कराहते हुए वही बैठ गया।

सुबह पाँच बजे रघु का पूरा परिवार विक्टोरिया से स्टेशन के लिए रवाना हो गया। ट्रेन तो 9 बजे सुबह थी पर बहुत सारा सामान लगेजवैन में भी चढ़ाना था। ट्रेन छूटने से कुछ पहले रघु के पिताजी के मातहत विदा करने आए। चपरासी माँ की ओर मुखातिब होकर बोला- माताजी ! रघु बाबू बहुत पोपुलर हैं। बहुत से साथी घर पर आए थे । निराश लौट गए।

Saturday, 20 June 2020

मैजिस्ट्रेट

यह कहानी तबकी है जब सरसों तेल 6 रुपये किलो और शुद्ध घी 35 रुपये किलो मिलता था। यह उस समय की कहानी है जब 2 किलो चीनी और 1 लिटर किरासन तेल के लिए घंटों राशन दुकान की लाइन में लगना पड़ता था। यह कहानी 1980 के दशक के शुरुआती वर्षों की है जब मध्यम वर्ग के लिए स्कूटर और इंग्लिश मीडियम स्कूल स्टेटस सिम्बल हुआ करता था। यह कहानी रांची कारखाने के टाउनशिप की है जहां 1500 रुपये पाने वाले इंजीनियर को 50 रुपये में 3 रूम का फ्लॅट मिलता था और बिजली का बिल मात्र 10 रुपये आता था। सबसे बढ़िया तो निशुल्क चिकित्सा थी।

मेरे बगलगीर एक बंगाली महाशय थे। रांची शहर में उनका विशाल पुश्तैनी मकान था। इस कारण उनका फ्लॅट हमेशा किराए पर रहता था। फ्लॅट मय बिजली और पानी के मात्र 100 रुपये में। उनकी शर्तें बहुत ही तर्कसंगत थीं। किरायेदार भला मानुस, ट्रांसफरेबल सरकारी नौकरीयाफ़्ता हो। अबतक उनके फ्लॅट में केन्द्रीय स्कूल के शिक्षक ही रहते आए थे । इस बार एक मैजिस्ट्रेट आए। मेरे बगलगीर के पिता भी रिटायर्ड सिविल जज थे – उनकी सिफ़ारिश पर।

सत्यप्रिय और उनका परिवार बहुत ही मिलनसार था। मेरे 3 बच्चे उनके भी। मेरे भी 2 लड़कियां उनकी भी। सोच-विचार, रहन-सहन बहुत कुछ मिलता था- यहाँ तक की वेतन भी। सत्यप्रिय जी को मेरे साथ बैठकी बहुत रास आती थी। उन्हें भी क्लैसिक किताबों, पाश्चात्य संगीत और स्वादिष्ट भोजनों में रुचि थी। फर्क एक अवशय था । कारखाने के इंजीनियर के भ्रष्ट होने की गुंजाईश ना के बराबर थी। सत्यप्रिय जैसे मैजिस्ट्रेट को ईमानदार रहने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ती थी। उससे भी ज्यादा उन्हे ईमानदार दिखाये देने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती थी – अपने मातहतों से, अपनी बीबी-बच्चों से और मौजूदा न्यायायिक प्रणाली से। सबसे तो वे निपट सकते थी पर अपने बीबी-बच्चों से सामजस्य बैठाना बहुत टेढ़ी खीर थी।

टाउनशिप में 2 केन्द्रीय विद्यालय थे। वहाँ सत्यप्रिय के बच्चों का दाखिले आसानी से हो जाता। पर सोसाइटी के सब बच्चे इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ते थे। मेरे बच्चे भी रंग-बिरंगी यूनिफ़ॉर्म पहन कारखाने की बस से स्कूल जाते और बेवजह खेलते समय भी इंग्लिश में बातें करते। 1 महिना तो निर्णय लेने में लग गया। आखिरकार सत्यप्रिय ने अपनी मजबूरी मुझे बताई। वे चाहते थे की उनकी बड़ी बेटी का दाखिला कान्वेंट में हो जाये। इसके लिए वे 15 दिनों से अपनी बेटी से सिर्फ इंग्लिश में ही बातें कर रहे थे।

कान्वेंट का सत्र आरंभ हो चुका था। मैं उन्हे और उनकी बेटी को अपने स्कूटर में बैठाकर कान्वेंट ले गया। 11 किलोमीटर दूर था। बिटिया का इंग्लिश उच्चारण बहुत ही अच्छा था। एड्मिशन हो गया। उस समय केन्द्रीय विद्यालय की फीस मात्र 1 रुपये हुआ करती थी। कान्वेंट की फीस 60 रुपये थी। लौटते समय 2 जोड़ी यूनिफ़ॉर्म और जूते खरीदने में 500 रुपये हलकान हो गए। हमलोगों को प्रति बच्चे बस का मासिक किराया 10 रुपये देना पड़ता था। सत्यप्रिय को कार्पोरेशन की बस की इजाजत तो मिल गई पर वहाँ भी उन्हें 50 रुपये मासिक भाड़ा देना पड़ा। उनके चेहरे पर दर्दीली मुस्कुराहट मुझसे देखी नहीं जाती थी।

उनके घर कोर्ट से दिया एक नौकर 24 घंटे रहता। साथ ही सुबह-सुबह फ़ाइल लेने-लेजाने के लिए साइकल से एक चपरासी आता। सत्यप्रिय ने अपनी छोटी बेटी को पास के मोंटेसरी में दाखिला करवा दिया था। जब सब कोई जा चुके होते तो घर का काम-काज निबटा कर उनकी श्रीमती अपने गोद वाले बच्चे को लेकर मेरे घर आ जाती। कभी नौकर भेजकर मेरी श्रीमती को बुलवा भेजती। जो भी अच्छा बना होता वह एक दूसरे सांझा करते। शाम के समय सत्यप्रिय को मेरे साथ घूमना अच्छा लगता। उस समय हमलोग हर तरह की बातें करते- हर तरह की। हम दोनों को टहलते देख कोई भी समझ लेता की एक सरकारी अधिकारी है तो दूसरा इंजीनियर। सत्यप्रिय अपने पहनावे और रख-रखाव पर लेशमात्र भी कमी नहीं होने देते। बाल सँवरे हुए, फुलशर्ट और फुललपैंट पूरी क्रीज के साथ, जूता चमकता हुआ और आंखे स्थिर, दूर दृष्टि वाली।

कुछ दिनों से वे मेरे स्कूटर को आते-जाते निहारते रहते थे। मैं भाँप गया। पूछने पर मालूम हुआ की वह कचहरी दो किश्तों में आते जाते हैं। टाउनशिप से काली मंदिर, मेन रोड तक बस से तथा स्टेटस की खातिर वहाँ से कचहरी तक रिक्शे से। कुल मिलाकर एक दिन का 5 रुपया और महीने का 130 रुपया खर्च हो जाता है। मैंने उन्हें सुझाव दिया की इतने की EMI में तो स्कूटर आ जाएगा। उन्हें यह बात भा गई। बैंक से लोन लेकर उन्होने एक लेंबबरेटा स्कूटर ले लिया। एक हफ्ते में वे परिवार सहित पूरी रांची घूम आए। अपने सहयोगियों के घर भी हो आए। एक महीना आनन-फानन में बीत गया।

बेटी की पढ़ाई और स्कूटर के पेट्रोल के खर्च से उनका तलवार की धार पर चलने वाला बजट बुरी तरह बिगड़ने लगा। उनकी श्रीमती साहसी और समझदार थीं। वे चपरासी से कचहरी के पास आढ़त से रसद और सब्जी मंगाने लगीं। कहती उधर आधे दाम में मिल जाता था। गाँव से चावल आने लगा। बनिए का उधार होने लगा। मुश्किल तब होती थी जब कोई बाहरी मेहमान आ जाता अथवा गाहे-बगाहे कोई नया खर्च मंडराने लगता – मसलन बीमारी, बेटी के स्कूल का फंकशन और उसके लिए नए लिबास, अथवा कॉलेज में पढ़ते छोटे भाइयों की जरूरतें। कभी-कभी आपतस्थिति में मेरे परिवार से प्रगाढ़ता काम आती। हमलोगों को सत्यप्रिय जैसे ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ सरकारी अधिकारी सहायता करने में बहुत खुशी होती।

एक दिन मैं कचहरी के पास किसी काम से गया। ईच्छा हुई सत्यप्रिय जी का कोर्ट देखा जाए। वकील से मार्गदर्शन लिया। पेशकार सामने के दरवाजे के पास खड़ा था। वह मुझे पहचानता था। मैं चुपके से पिछले दरवाजे से उनके कोर्ट में आकर कोने की एक कुर्सी पर बैठ गया। पेशकार बुरी तरह व्यस्त था। वह वकीलों और दूसरों से कागज लेता, फ़ाइल के अंबार में कुछ खोजता और उसी पुर्जे में शायद तारीख लिख कर दे देता। हाथ मे छिपकर दी गई राशि को देखता और फ़ाइल ऊपर-नीचे कर देता। इससे ज्यादा मुझे कुछ समझ नहीं आया।

मैजिस्ट्रेट सत्यप्रिय बगल के कमरे से दाखिल हुए। सन्नाटा छा गया। 15 मिनटों में उन्होने दो जिरह और कई केस पर अपना निर्णय सुनाया। ज़्यादातर तारीख बढ़ाने का मामला दिखा। जिनकी तारीख बढ़ती वे पेशकार के पास जाते। एक बात तो तय थी। सत्यप्रिय बहुत अच्छी इंग्लिश बोलते थे और कोर्ट में उनका बहुत आदर था।

शाम को मैंने उन्हे बताया। उन्हे अपनी तारीफ बहुत अच्छी लग रही थी। हो भी क्यों न ! एक ईमानदार, जानकार और कर्तव्यनिष्ठ मैजिस्ट्रेट के लिए इससे ज्यादा आकर्षक बोनस और क्या हो सकता था।

देखते-देखते 3 वर्ष बीत गए। उनका तबदला हो गया। जैसा होता है बिछड़ने पर। मर्दों की आँखें गीली हुई। औरतें खूब रोयी। कुछ ऑफिस के फ़र्निचर थे। उसे मेरे पास रखवा, फ्लॅट को ताला लगा, उनका परिवार विदा हो गया।

अगले दिन वही चपरासी आया फ़र्निचर लेने। कायदे से हमलोगों ने उसे चाय व नाश्ता कराया। बातें भी हुई। वह सत्यप्रिय का गुणगान करते नहीं थक रहा था विशेषकर ईमानदारी की बारे में। मैंने चपरासी बाटाया की वह जो सब्जी और राशन लाता था उससे उनको बहुत मदद हो जाती थी। मैंने उससे आढ़त और दुकान का पता पूछा जिससे की मैं भी कभी-कभार व्होलसेल ले सकूँ।

चपरासी थोड़ा उदास हो गया। सब्जी और राशन सस्ता जरूर मिलता था पर उतना भी नहीं। हमलोग कोर्ट के स्टाफ सामान को मालकिन के बजट के लायक सस्ता कर देते थे।