Thursday, 18 April 2013

ये मेरा जंगल ! वो तुम्हारा जंगल ! - २


समय के साथ-साथ कितनी यादें, कितने लोग याद नहीं रहते हैं पर एक माँ को अपना खोया हुआ बेटा नहीं. थोड़ी सी भी आहट होने पर माँ शेरनी चौंक कर इधर-उधर देखने लगती थी. बड़ा बेटा राम शेरू बहुतेरी कोशिश में लगा रहता था माँ का मन फुसलाने में. वह तरह तरह के करतब दिखाता. माँ सोचती कि श्याम भी ऐसे ही करतब करता था. खरगोश को भागते देखती तो उसे लगता कि श्याम भी उसके पीछे दौड़ता हुआ अभी दिखेगा. पेड़-पौधे भी अब ज्यादातर शांत और दुखी दीखते थे. अब शेरनी माँ शिकार राम के लिए और राम को सिखाने के लिए करती. राम भी बिना किसी साथी या भाई के ज्यादा गंभीर और थोडा गुसैल होने लगा था. साल बीतते-बीतते माँ शेरनी ने बिस्तर पकड लिया. पर राम अब गबरू जवान हो गया था. अब शिकार वही करता और तबतक नहीं खाता जबतक माँ कुछ खा नहीं ले.
माँ शेरनी समय-समय पर राम को पथरीले जंगल और उसमें रहने वाले उन दो पैरों वाले जानवरों के बारे में बताती रहती. वह बताती थी कि ये जानवर अपने आगे के दो पैरों से क्या-क्या करते हैं; ये लोग अपना गंदा और कुरूप शरीर छिपाने के लिए रंगीन कपडे पहनते हैं; ये लोग खाते कम, बर्बाद उससे ज्यादा और संग्रह सबसे ज्यादा करते हैं; इनलोगों में मिलकर रहने और बांटकर खाने की आदत नहीं है और ये हमेशा आपस में लड़ते रहते हैं. वह यह भी बताती कि शेर कभी अपने शिकार को बंदी नहीं बनाते और नाही उन्हें संग्रह करके रखते हैं. वह यह भी बताती कि दस छोटे खगोश को मारकर पेट भरने के बजाय एक उतना बड़ा ही शिकार करो जिससे हम सबका पेट भर जाए और थोडा छोटे मांसभक्षी जानवरों और पक्षियों के लिए भी छोड़ देना चाहिए. माँ कभी-कभी बरगद के पेड़ पर चिपके पैरासाइट दिखाया करती थी. वह कहती थी कि ये दो पैर वाले जानवर जो अपने को मनुष्य कहते हैं इन पैरासाइट से कम नहीं हैं क्योंकि ये मनुष्य भी प्रकृति और प्राकृतिक सम्पदा का उसी प्रकार शोषण करते हैं. माँ हमेशा राम को कहती थी कि वह हरदम अपने छोटे भाई को इन दानवों के कैद से छुडाने की कोशिश में लगा रहे. अगर इच्छा-शक्ति मजबूत होगी तो ईश्वर अवश्य एक अच्छा अवसर प्रदान करेंगे. एक रात जब राम शिकार कर लौटा तो उसकी माँ बहुत खोजने पर पहाड़ी टीले पर पथरीले शहर के तरफ निहारती मृत मिली.  
शोक समारोह में जंगल के सभी पशु पक्षी सम्मलित हुए. मंत्री भालू के प्रस्ताव और सेनापति हाथी के समर्थन पर सभी ने सर्व सम्मति से रामू शेर को अपना राजा घोषित कर दिया. बंदरों की सेना ने दूर-दूर तक यथायुक्त ढिंढोरा पीट कर समाचार फैला दिया. पक्षियों ने आसपास के अन्य जंगलों में जाकर वहां के समाचार-वाहकों को बतला दिया. ऐसा बहुत आवश्यक होता है. इसके बाद किसी भी अन्य जंगलवासियों को सीमा उलंघन करने का बहाना नहीं मिलता है. अन्यथा विदेशी अपना घर तो ठीक-ठाक रखते हैं और इधर तोड़-फोड़, चोरी-डकैती करने आ जाते हैं.
रामू शेर को अपना राज्य भलिभांति रखने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती. दिन में एक बार पूरे क्षेत्र का पैदल दौरा , खासकर उन जगहों पर जहां पक्षी  ज्यादा शोर मचा रहे हों अथवा वहां जहां बिना किसी बात के लोग आपस में लड़ाई-झगड़ा कर रहे हों. कभी-कभी सीमा उलंघन होने पर चौकसी देखनी पड़ती थी और कुछ ज्यादा ताकत लगाकर दहाड़ना पड़ता था. रामू शेर एक प्रसन्नचित और बहादुर राजा था. मात्र उसे दो पैरों वाले मनुष्यों से घृणा थी और डर केवल आग की लपटों से लगता था. आग से तो सभी जानवर डरतें है.जानवरों के रोयें बड़ी जलती आग में जल जाते हैं और उन्हें आग बुझाना भी तो नहीं आता. देखते-देखते रामू शेर चार वर्ष का हो गया. वह किसी भी क्षण अपने भाई श्याम को नहीं भूला था. 
  
To be continued…

Wednesday, 17 April 2013

ये मेरा जंगल ! वो तुम्हारा जंगल ! - १



 वनस्पतियों से भरे-पूरे, जानवरों की विविधता और बहुतायता से महकते और गूंजते वन-प्रांत हमारी प्रकृति की प्राकृतिक देन थी. अब हमलोग मानव सभ्यता से परे इस क्षेत्र को जंगल कहते हैं जिसपर हमलोगों का शासन कम ही चलता है. इस युग के अशांत, असभ्य, शोरगुल और अविश्वास से भरे मानव सभ्यता से ओत-प्रोत गाँवों-कस्बों और शहरों को पथरीले जंगल से कम क्या कहा जा सकता है ? सभ्यता तो उन्ही जंगलों में दिख रही है जिसकी प्राकृतिक सम्पदा आज भी सुरक्षित है. वहां आज भी सबकुछ प्राकृतिक नियमों के अनुसार ही हो रहा है.
ऐसे ही एक प्राकृतिक जंगल में शेर के दो जुडवा बच्चे अपनी माँ शेरनी के साथ रहते थे. पिता शेर कभी-कभी ही मिलने आते थे. चार महीने के ये बच्चे जिनका नाम माँ ने बड़े प्यार से राम और श्याम रखा था, तबतक उधम मचाते रहते थे जबतक नींद न आ जाये. बड़ा शांत और गंभीर था पर छोटा बहुत शरारती. एक बार तो पिता शेर ने उसकी पिटाई भी कर दी थी जब उसने सोते हुए उनकी मूछें खींची थीं.
राम-श्याम को आस-पास खेलना बहुत अच्छा लगता था. एक छिप जाता था तो दूसरा उसे खोज निकालता था. एक दिन दोनों खेलते-खेलते बहुत दूर निकल आये. छोटकू श्याम तो भागते-भागते जंगल को चीरती काली भयावनी पट्टी के पार चालला गया . उस काली पाटती पर गोलनुमा पंजों पर लुढ़कते हाथी और भैंसे जैसी आकृति आ-जा रही थी. माँ ने इस काली पट्टी से दूर रहने को कहा था और ये भी कहा था कि इन जानवारों के अन्दर दुनिया के सबसे बदमाश दो पैरों वाले जानवर छिपे रहते हैं.
श्याम बहुत डरा हुआ था. उसे मालूम ही नहीं पड़ा कि कब वह खेल के जोश में पट्टी के पार आ गया. अब लौटने में बहुत डर लग रहा था. राम भी झुरमुट में छिपा सहमा-सहमा सबकुछ देख रहा था. जब पट्टी पर सन्नाटा चा गया तब राम ने श्याम को इस पार जल्दी से आ जाने को कहा. पर जैसे ही श्याम पट्टी के बीच में आया एक भयंकर मुंह वाला हाथी चिन्घारते हुए सामने आ खड़ा हुआ. जबतक श्याम में भाग जाने की शक्ति आती, उस हाथी में से दो पैर वाला जानवर निकला और उसे गर्दन से पकड़ कर हाथी के अन्दर ले जाकर चेन से बाँध दिया. राम उस घरघराती आवाज करने वाले हाथी में श्याम को जाता देखता रहा.
शेरनी माँ दोनों बच्चों का खाने पर बहुत देर से 
इन्तजार कर रही थी. राम को मुंह लटकाए रोता हुआ देख कर वह बहुत घबडा गयी. राम ने सुबकते हुए सब-कुछ बताया. माँ तो एकदम सन्नाटे में आ गयी. दौड़ती हुई काली पट्टी पर आ गयी. हाथियों के गोल पैरों के निशान का पीछा करते बहुत दूर तक चली गयी. जहां पत्थरों का जंगल शुरू होता था. जिसमे दो पैर वाले बहुत ही हिंसक जानवर रहते थे. पर अपने जंगले में तो एक महक से किसी का भी पता चल जाता था. इस पत्थर के जंगल में जहां तरह-तरह के गोल पैरों वाले जानवर दौड़ा करते थे और भयंकर बदबूदार प्रदूषण फैलाते थे, वहां कोई भी महक पहचानना असंभव था. बहुत दिनों तक कभी अकेले कभी राम के साथ, शाम के धुन्धलानें के बाद घंटो ऊंचाई से उस आग की रौशनी से दमकते पत्थर के जंगल को निहारती रहती थी कि शायद कहीं उसका प्यारा मुन्ना दिख जाये. एक-दो बार तो वह उस भयावह पथरीले जंगल के अन्दर तक खोज आई. पर राम उसके पीछे आ जाता था और वह राम को भी खोना नहीं चाहती थी. हाय रे माँ का दिल ! शायद वह मरते दम तक इस तरह निहारना नहीं छोड़ेगी.   
To be continued…miles to go….