Sunday, 5 July 2020

एक निमंत्रण ऐसा भी


आजकल ट्रेन यात्रा कितनी सुलभ हो गई है। एडवांस मनचाहा टिकट बुक कर लें। निर्धारित समय पर अपनी कार, या ओला/उबर से स्टेशन पहुँच जाएँ। ट्रेन यात्रा समाप्त होने पर पुनः मनचाही सवारी से अपने गंतव्य पहुँच जाएँ। गंतव्य गाँव है तब भी कोई मुश्किल नहीं। गाँव-गाँव तक अच्छी सड़कें बन गई हैं। अब तों ग्रामवासियों का स्टेटस सिम्बल हाथी/घोड़े के बजाय मोटरकार हो गई है।
एक जमाना था जब महज एक पोस्टकार्ड ही समाचार जानने का जरिया होता था। शादी का कार्ड बुकपोस्ट से सफर तय करता था। टेलीफ़ोन दुर्लभ था और ट्रंक काल पर बातें करना बात का बतंगड़ हो जाने का शर्तिया अंदेशा।
बात 1976 की है। धीरे-धीरे डीजल इंजिन, स्टीम इंजिन की जगह ले रही थी। यह एमर्जन्सि काल था। यह समय आम नागरिक के लिए बहुत डरावना था पर चोरी-डकैती और नक्सल इरादे उसी तरह कामयाब थे। लगता था की जैसे शराब और नशाखोरी सरकार रेविन्यू बटोरने के लिए नहीं रोकती थी वैसे ही चोरी-डकैती, अपहरण और नक्सलिस्म पुलिस की मजबूरी थी।
मेरे मित्र अशोक मिश्रा दोपहर 1 बजे धनबाद से सासाराम स्टेशन पहुंचे।साले की शादी थी। चलते समय हितेशियों  ने खबरदार कर दिया था। इलाका डकैतों का है। लूटते तो हैं ही, निशानदेही के अंदेशे से जिंदा भी नहीं छोड़ते हैं। 3 बजे तक आसरा देखा। लगता था चिट्ठी नहीं मिली। गलती अशोक की भी थी। योजना ससुराल पहुँच कर बारात के साथ विवाह स्थल पहुंचाना था। छुट्टी न मिलने के कारण अशोक सीधे विवाह स्थल ही जा रहे थे। स्टेशन से बाहर बस पकड़ने निकले।
नोखा की बस चार बजे आई। छोटी 407 मिनी बस थी । बड़ी मुश्किल से बैठने की जगह मिली। वह भी इस कारण की पैंट-शर्ट, लाल एक्सक्लूसिव जूते और हाथ में मोटरी के बजाय बजाब्ता लाल सूटकेस देखकर कंडक्टर सरकारी ऑफिसर या पोलिसिया समझ बैठा था। बस खचाखच भरी थी। अंदर काफी गर्मी हो गई थी।  खिड़की के पास एक रोबदार, गठियाए पर धूप से झुलसे वृद्ध बैठे थे। जैसे ही अशोक ने खिड़की खोलने के लिए हाथ बढ़ाया। वृद्ध ने इशारे से मना कर दिया। बस की छत पर काफी यात्री बैठे थे, खैनी मुंह में दबाये हुए। अगर खिड़की खुली तो पूरा का पूरा थूक का सैलाब बदन सरोबार कर सकता था।
20 किलोमीटर की दूरी बस ने एक घंटे में पूरी की। अशोक के साथ बगल में बैठे वृद्ध और 4-5 जन भी उतरे। बात करने पर मालूम हुआ की दो जन सीतलपुर में बाराती जा रहे थे, बाकी राजपुर के निवासी थे जिन्हे भी सीतलपुर होकर जाना था। मालूम हुआ आसपास गाँवों को मिलाकर 4-5 शादी थी।  सीतलपुर 5 किलोमीटर पूरब था और वहाँ पैदल ही जाना था। समय गंवाना बेकार था। सहयात्रियों में कोई भी संदिग्ध नहीं लग रहा था बल्कि वृद्ध को समुचित आदर दिखते सब संस्कारी लग रहे थे। भगवान का आसरा करते अशोक जी निकल पड़े।
निगाहें पूरब की ओर डूबते सूरज पर थी। तभी पीछे से किसी के दौड़ते हुए नजदीक आने की आहट आई। नंगे बदन गमछा लपेटे कोई श्रमिक लग रहा था। वृद्ध ने हांक लगाते हुए रूकने को कहा। पूछा – अबे कहाँ जा रहा है? कौन जात है ? उसने झुक कर कहा- मालिक ! कहार हैं। सादी में कंपनी के लिए बीड़ी-तंबाकू लेने गए थे। । नाच-गाना होवेगा ! बुजुर्ग ने उसे कहा- साहब का बक्सा ले ले और सीतलपुर मालिक के जिम्मे दे देना। उस श्रमिक ने अशोक का लाल सूटकेस थामा, सिर पर रखा और दौड़ लिया। इसे भी अशोक ने भगवान भरोसे छोड़ दिया। कोई चारा भी न था। बुजुर्ग मुस्कुराहट के साथ बुदबुदाये – लगता है लौंडा नचाएंगे इसीलिए बीड़ी-तंबाकू का इंतजाम हुआ है। रास्ते भर कोई भी किसी से परिचय नहीं मांग रहा था। बहुत कम देर का साथ था या फिर परिचय बेतकल्लुफ़ी को सीमा में न बांध दे। अशोक को सिगरेट की लत थी। इस कारण भी वह बुजुर्गवार से दूरी बनाए हुए था।  
अभी आधी ही दूरी तय हुई थी की अंधेरा होने लगा। दूर रोशनी दिखायी देने लगी थी। सड़क छोडकर दाहिने तरफ नाले को पार करना था। सब लोग धोती समेत कर नाले मे उतर पड़े। अशोक को पहले जूता-मोजा उतरना पड़ा और उसके बाद पैंट घुटने के ऊपर तक समेटना पड़ा। इस कारण पीछे पड़ गए। नाले में गलत जगह पैर पड़ गया जहां गड्ढा ज्यादा था। जैसे ही आधा नाला पार हुआ, सामने दूसरे किनारे पर 5-6 लठैत खड़े दिखे। अशोक क्या सभी जहां के तहां जड़वत हो गए, सिवाय वृद्ध के । शायद लठैत हमारे दिल का हाल जान गए। वहीं से चिल्लाये – हमलोग के मेहमान आ रहे हैं, उन्ही को लिवा ले जाने आयें हैं, डरिए मत पार लग जाइए। जान में जान आई। उन लठैतों ने वृद्ध का बारी-बारी से पैर छूआ। पीछे अंधेरे में जीप लगी थी। वृद्ध सज्जन को जीप पर बैठा कर बढ़ गए।  
गाँव के अंधेरीया में जब पेट्रोमैक्स जलता है तो बहुत दूर तक उजाला हो जाता है। बरातियों की मेहमान-नवाज़ी के लिए स्पेशल रोशनी का इंतजाम था। ठीक बीचोबीच तिपाई पर पेट्रोमैक्स रखा था। परती खेत पर तारपोलीन बिछाया गया था। एकदम किनारे पुआल के मुलामियत पर सफ़ेद चादर बिछी थी। मसनद भी था। 100 बरातियों के सोने का इंतजाम था। दूसरी तरफ सामने की ओर 4-6 चौकियों को मिलाकर उस पर दरी बिछायी गई थी। इसी मंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रम यानी नाच-गाना होना था।
अशोक अपने साले दूल्हे और उनके मित्रो के साथ शामियाने का एक कोना पकड़ लिए। सिगरेट भी पीना था वह भी बहुत सावधानी के साथ- नीचे पुआल, ऊपर कपड़े का शामियाना और दूसरे कोने पर बराती के बुजुर्गों की नजर। खैर शामियाना काफी लंबा-चौड़ा था। आते ही खबर का आदान-प्रदान हो गया था। लगन की भरी तेज़ी के कारण बनारस से बाई का इंतजाम नहीं हो पाया। सासाराम से बाई की व्यवस्था की गई थी।
8 बजे तक बरातियों को भोजन करा दिया गया। 9 बजते-बजते पूरा पंडाल शरातियों से भर गया। बाराती अलग पर सबसे आगे बीच में। बैठकी उम्र के लिहाज से पूरे तमीज़ के साथ लगी थी। मंच पर ढोलक-हार्मोनिअम की जगह ग्रामोफोन पर फिल्मी गाने की आवाज बड़े-बड़े स्पीकर से गूंज रही थी। पाकीजा के चलते-चलते गाने की शुरुआत के साथ दो बाई मंच पर घूँघट लिए थिरकने लगीं। पहले गाने की महीनियत तीसरे गाने के बजते ही गायब हो गई। स्पीकर की जोरदार आवाज को दोनों बाई अपने घुंघरू की आवाज से दबाने की कोशिश में मीना कुमारी से शम्मी कपूर बन गई थीं। किसी ने बताया की बाई लोग नहीं मिली तो सब्जी बेचने वाली कुंजरिनो को उठा लाये थे। कुछ देर बाद फरमायीशी नाच-गाना होने लगा। बुजुर्गवार के पास बाई जाकर व्योछावर भी ले आती थीं। कार्यक्रम 2 बजे रात तक चला। अशोक तो यह सब देखते-सुनते कभी का सो गया।
सुबह शोर मचे पर अशोक की नींद खुली। पुलिस की जीप लगी थी। किसी डाकू को खोज रहे थे। पुलिस के जाने के बाद अशोक ने शरातियों ने पूछा। पुलिस उस इलाके के दुर्दांत डाकू परमा सिंह की तलाश में आई थी। वही वृद्ध जो बस से साथ उतरा था और जिसे ले जाने घाट के किनारे जीप सवार इंतजार कर रहे थे।  


ये तो होना ही था

रघुराज हमेशा की तरह दोपहरी की तपिश कम होते ही अपने नाती को लेकर पार्क में आए। वे अपनी पसंदीदा बेंच पर बैठ गए। बेंच के बाई तरफ बच्चों के खेलने का प्ले स्टेशन था और दायी तरफ छोटा सा तालाब जिसमें इस बेला में 10-15 बत्तकें तैरती मिलती थीं। 5 वर्ष का अर्जुन दौड़ता हुआ प्ले स्टेशन की ओर चला गया। रघुराज ने जैसे ही अपने पॉकेट में हाथ डाला, बत्तकें एक कतार बना उनकी ओर आने लगीं। रघुराज बिस्कुट और ब्रेड का टुकड़ा बिखेर देते थे। कोई-कोई बत्तक तो उनके हाथ से भी टुकड़े चुग लेती थी। पार्क की दूर तक फैली हरियाली, क्यारिओं में तरह-तरह के फूल, जॉगिंग और कसरत करते युवा, सैर करते वरिष्ठ, मखमली घास पर दौड़ते-खेलते बच्चे, तालाब और उनपर मस्ती करतीं बत्तकें, किसी का भी मन मोह लेता। शाम का ये दो घंटा दिनभर का सबसे आह्लादित करने वाला समय था। वे हर दिन इस समय का इंतजार करते थे।

अर्जुन कभी-कभी पास आकर बॉटल से पानी पी लेता और खेलते समय होने वाली एक-दो घटनाएँ उखड़ती साँसों के साथ बताकर फिर खेलने भाग जाता। घटनाएँ मसलन- आज मैंने उसे स्लाइडिंग में हरा दिया, आज हाइड अँड सीक में मैं एक बार भी चोर नहीं बना, अनन्या मुझसे ज्यादा बड़ी पेंगें लगती है झूले पर वगैरह। इधर दो-तीन दिनों से उसकी सारी बातें अनन्या पर केन्द्रित होती। एक बार अर्जुन-अनन्या दोनों पानी पीने भागे-भागे आए। रघुराज ने देखा की अनन्या शायद वहाँ खलेने आते बच्चों में सबसे सुंदर और आकर्षक थी। रघुराज ने प्रशंसा की और कहा – बहुत प्यारी हो।“ अर्जुन कुछ सोच में पड़ गया। दोनों दौड़ कर लौटने लगे तो अर्जुन लौट कर मेरे पास आया और बोला –“नानू ! अनन्या अच्छी है ना । वह कहती है की मैं उसे बहुत अच्छा लगता हूँ “ मैंने मुस्कुराकर सिर हिला दिया। जिस दिन अनन्या वापस अपने शहर लौट गई उस दिन अर्जुन बहुत उदास था। उस दिन पार्क में वह रघुराज की गोद में सिर रख सो गया, खेलने नहीं गया। रघुराज अर्जुन का सिर सहलाते सोच रहा था कि क्या इतनी छोटी उम्र में भी.... ? उन्हें अपना बचपन याद आ गया।

रीना रघु से दो साल बड़ी रही होगी। उनकी दोस्ती घर के बाड़े के पास लगे आम के पेड़ के चलते हुई। पेड़ रघु के बाड़े में था। ज़्यादातर कच्चे-पके आम रीना के हाते में गिर जाते थे। रघु जब भी आम चुनने जाता दोनों में लड़ाई हो जाती। दोस्ती तब हुई जब आम गिरने पर रीना ने आवाज लगाकर बुलाया और सब आम रघु को दे दिया। रघु शरमाकर आधे से ज्यादा आम रीना को लौटा दिये।

रीना जब भी कच्चे आमों का चटकारा बनती नमक-मिर्च के साथ तो रघु को जरूर बुलाती। पड़ोसियों के बीच बहुत अच्छी आवाजाही होती थी। कोई खबर होती, कोई फिल्म लगती, कोई व्यंजन बनता तो सबका आदान-प्रदान होता। जिस दिन रीना के स्कूल में छुट्टी होती, रीना और रघु टिफिन में कुछ भी डालकर लाते और आम के पेड़ की छाया में बैठकर सांझा करते।पूछने पर कहते की हमलोग पिकनिक कर रहे हैं ।
रीना की बड़ी बहन की शादी होने वाली थी। रीना की दीदी जब कभी किसी गाने का रिहर्सल करती तो रीना और रघु जज बनते। तय यह होता कि दीदी को भी रीना-रघु का गीत सुनना पड़ेगा। एक दिन टिफिन सांझा करने के बाद दोनों कोई गीत गुनगुना रहे थे। आसपास की कोई खबर ही नहीं रही। जब सिर उठाया तो देखा की सबकोई शांत खड़े मुस्कुरा रहे थे ।

बड़े लोग इन दोनों की प्रगाढ़ मित्रतता पर चुटकियाँ लेने से बाज नहीं आते। एक दोपहरी रघु और रीना बैर की तलाश में जंगल की ओर ज्यादा गहरे चले गए । रास्ता भूल गए । किसी तरह पूछते टोह लगते ये दोनों बहुत देर बाद घर लौटे । घर के बरामदे में तो भीड़ लगी थी । दोनों दिखे तब जान में जान आयी। पर किसी ने मजाक कर ही दिया - हमलोग तो सोचे कि दोनों भाग लिए.। सबलोग खिलखिला के हंस पड़े। कुछ अच्छा भी  होता रहा । अगर रघु सुबह तैयार होने  या पढ़ने में आनाकानी करता तो खबरदार कर दिया जाता - रीना से शिकायत कर देंगे। इसी तरह अगर रीना घर के काम में हाथ बंटाने में आलस दिखाती तब रघु को आवाज लगा दी जाती ।

जीवन की गाड़ी कई मौसम झेलते, कई पड़ाव बदलते एक नए शहर पहुंची। रघु कभी भी जीवन के उन जीवंत क्षणों को नहीं भूला। अब वह एक शांत, शर्मीला, कम बोलने वाला किशोर हो गया था ।

रघु स्कूल की परीक्षा पास कर कॉलेज में एड्मिशन की तैयारी कर रहा था। एक शाम जब वह अपने कमरे में पढ़ाई में व्यस्त था तभी छोटा भाई बुलाने आया – देखो ! कोई मिलने आया है। बैठके में आने पर एक पूरा परिवार दिखाई पड़ा। वह किसी को पहचान नहीं पाया। तभी एक मोटी-ताजी,युवा लड़की ने मुस्कुराकर कहा-“ “नहीं पहचाना ! मैं रीना हूँ । अरे ! रघु तो शरमा रहा है।“वह मेडिकल में दाखिले के लिए आई हुई थी। वह तरह-तरह के संस्मरण सुना रही थी। रघु जड़वत खड़ा सुनता रहा। उसकी यादाश्त में तो वही छुई-मूयी नन्ही सी रीना बसी हुई थी।