Sunday, 5 July 2020

ये तो होना ही था

रघुराज हमेशा की तरह दोपहरी की तपिश कम होते ही अपने नाती को लेकर पार्क में आए। वे अपनी पसंदीदा बेंच पर बैठ गए। बेंच के बाई तरफ बच्चों के खेलने का प्ले स्टेशन था और दायी तरफ छोटा सा तालाब जिसमें इस बेला में 10-15 बत्तकें तैरती मिलती थीं। 5 वर्ष का अर्जुन दौड़ता हुआ प्ले स्टेशन की ओर चला गया। रघुराज ने जैसे ही अपने पॉकेट में हाथ डाला, बत्तकें एक कतार बना उनकी ओर आने लगीं। रघुराज बिस्कुट और ब्रेड का टुकड़ा बिखेर देते थे। कोई-कोई बत्तक तो उनके हाथ से भी टुकड़े चुग लेती थी। पार्क की दूर तक फैली हरियाली, क्यारिओं में तरह-तरह के फूल, जॉगिंग और कसरत करते युवा, सैर करते वरिष्ठ, मखमली घास पर दौड़ते-खेलते बच्चे, तालाब और उनपर मस्ती करतीं बत्तकें, किसी का भी मन मोह लेता। शाम का ये दो घंटा दिनभर का सबसे आह्लादित करने वाला समय था। वे हर दिन इस समय का इंतजार करते थे।

अर्जुन कभी-कभी पास आकर बॉटल से पानी पी लेता और खेलते समय होने वाली एक-दो घटनाएँ उखड़ती साँसों के साथ बताकर फिर खेलने भाग जाता। घटनाएँ मसलन- आज मैंने उसे स्लाइडिंग में हरा दिया, आज हाइड अँड सीक में मैं एक बार भी चोर नहीं बना, अनन्या मुझसे ज्यादा बड़ी पेंगें लगती है झूले पर वगैरह। इधर दो-तीन दिनों से उसकी सारी बातें अनन्या पर केन्द्रित होती। एक बार अर्जुन-अनन्या दोनों पानी पीने भागे-भागे आए। रघुराज ने देखा की अनन्या शायद वहाँ खलेने आते बच्चों में सबसे सुंदर और आकर्षक थी। रघुराज ने प्रशंसा की और कहा – बहुत प्यारी हो।“ अर्जुन कुछ सोच में पड़ गया। दोनों दौड़ कर लौटने लगे तो अर्जुन लौट कर मेरे पास आया और बोला –“नानू ! अनन्या अच्छी है ना । वह कहती है की मैं उसे बहुत अच्छा लगता हूँ “ मैंने मुस्कुराकर सिर हिला दिया। जिस दिन अनन्या वापस अपने शहर लौट गई उस दिन अर्जुन बहुत उदास था। उस दिन पार्क में वह रघुराज की गोद में सिर रख सो गया, खेलने नहीं गया। रघुराज अर्जुन का सिर सहलाते सोच रहा था कि क्या इतनी छोटी उम्र में भी.... ? उन्हें अपना बचपन याद आ गया।

रीना रघु से दो साल बड़ी रही होगी। उनकी दोस्ती घर के बाड़े के पास लगे आम के पेड़ के चलते हुई। पेड़ रघु के बाड़े में था। ज़्यादातर कच्चे-पके आम रीना के हाते में गिर जाते थे। रघु जब भी आम चुनने जाता दोनों में लड़ाई हो जाती। दोस्ती तब हुई जब आम गिरने पर रीना ने आवाज लगाकर बुलाया और सब आम रघु को दे दिया। रघु शरमाकर आधे से ज्यादा आम रीना को लौटा दिये।

रीना जब भी कच्चे आमों का चटकारा बनती नमक-मिर्च के साथ तो रघु को जरूर बुलाती। पड़ोसियों के बीच बहुत अच्छी आवाजाही होती थी। कोई खबर होती, कोई फिल्म लगती, कोई व्यंजन बनता तो सबका आदान-प्रदान होता। जिस दिन रीना के स्कूल में छुट्टी होती, रीना और रघु टिफिन में कुछ भी डालकर लाते और आम के पेड़ की छाया में बैठकर सांझा करते।पूछने पर कहते की हमलोग पिकनिक कर रहे हैं ।
रीना की बड़ी बहन की शादी होने वाली थी। रीना की दीदी जब कभी किसी गाने का रिहर्सल करती तो रीना और रघु जज बनते। तय यह होता कि दीदी को भी रीना-रघु का गीत सुनना पड़ेगा। एक दिन टिफिन सांझा करने के बाद दोनों कोई गीत गुनगुना रहे थे। आसपास की कोई खबर ही नहीं रही। जब सिर उठाया तो देखा की सबकोई शांत खड़े मुस्कुरा रहे थे ।

बड़े लोग इन दोनों की प्रगाढ़ मित्रतता पर चुटकियाँ लेने से बाज नहीं आते। एक दोपहरी रघु और रीना बैर की तलाश में जंगल की ओर ज्यादा गहरे चले गए । रास्ता भूल गए । किसी तरह पूछते टोह लगते ये दोनों बहुत देर बाद घर लौटे । घर के बरामदे में तो भीड़ लगी थी । दोनों दिखे तब जान में जान आयी। पर किसी ने मजाक कर ही दिया - हमलोग तो सोचे कि दोनों भाग लिए.। सबलोग खिलखिला के हंस पड़े। कुछ अच्छा भी  होता रहा । अगर रघु सुबह तैयार होने  या पढ़ने में आनाकानी करता तो खबरदार कर दिया जाता - रीना से शिकायत कर देंगे। इसी तरह अगर रीना घर के काम में हाथ बंटाने में आलस दिखाती तब रघु को आवाज लगा दी जाती ।

जीवन की गाड़ी कई मौसम झेलते, कई पड़ाव बदलते एक नए शहर पहुंची। रघु कभी भी जीवन के उन जीवंत क्षणों को नहीं भूला। अब वह एक शांत, शर्मीला, कम बोलने वाला किशोर हो गया था ।

रघु स्कूल की परीक्षा पास कर कॉलेज में एड्मिशन की तैयारी कर रहा था। एक शाम जब वह अपने कमरे में पढ़ाई में व्यस्त था तभी छोटा भाई बुलाने आया – देखो ! कोई मिलने आया है। बैठके में आने पर एक पूरा परिवार दिखाई पड़ा। वह किसी को पहचान नहीं पाया। तभी एक मोटी-ताजी,युवा लड़की ने मुस्कुराकर कहा-“ “नहीं पहचाना ! मैं रीना हूँ । अरे ! रघु तो शरमा रहा है।“वह मेडिकल में दाखिले के लिए आई हुई थी। वह तरह-तरह के संस्मरण सुना रही थी। रघु जड़वत खड़ा सुनता रहा। उसकी यादाश्त में तो वही छुई-मूयी नन्ही सी रीना बसी हुई थी।








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