वह समय आजाद भारत के अंगड़ाई लेकर जागने का था। एक तरफ पंडित नेहरू बड़े-बड़े कल-कारखाने लगवा रहे थे तो दूसरी ओर सुहारवर्दी का पुतला जलाया जाता था। आजाद भारत का पहले छात्र आंदोलन की आग ठंडी पड चुकी थी। उपराष्ट्रपति राधाकृष्णनन राष्ट्रपति पद की दावेदारी ठोकने लगे थे।
रघु घर का क्या पूरे पड़ोस का दुबला-पतला , कमजोर दिखने वाला, सबसे छोटे कद का लड़का था। यही कमजोरी उसकी मजबूती होने वाली थी। उसकी कोशिश रहती की वह खेलकूद में ही नहीं अपितु बदमाशी, मस्ती, लड़ाई-झगड़े यहाँ तक की पढ़ाई-लिखाई में भी सबसे अव्वल रहे। पीटता था पिटाता था परंतु झुकता नहीं था। मजाल है की कोई उसको चोट अथवा हानि पहुंचा दे। कितना भी ताकतवर हो, कितना भी चालाक हो , रघु बदला ले ही लेता था, आज नहीं तो कल, कल नहीं तो बरसों बाद। इसी कारण उसे उसके सहचर कोबरा-करैत की संज्ञा देते ते।
एक बार किसी बात पर उसकी तकरार अपने से बड़े और शक्तिशाली लड़के भोला से हो गई। बात मारा-मारी पर आ गई। उस लड़के ने रघु की जमकर पिटाई की। उस दिन के बाद रघु उसके साथ खेल में तो शामिल होता था पर बातचीत बिलकुल बंद। 6 महीने बाद सब कोई आसपास (लुका-छिपी) खेल रहे थे। रघु ने देख रखा था कि खेल के मैदान के कोने में एक बड़ा गड्ढा था। उसमें एक काला कटखना कुत्ता दोपहरी की गर्मी से बचने के लिए आराम करता था। भोला चोर बना था और बाकी छिपे लड़को को खोज रहा था। सबसे पहले रघु बरामद हुआ। रघु ने गड्ढे के पास जाकर ऐसा दिखाया कि कोई उसमें छिपा हुआ है। भोला ताड़ गया।भोला ने जांच करने के लिए एक कंकड़ फेका। यहीं गलती हो गई। गड्ढे में हरकत हुई। जैसे ही वह धप्पा करने के लिए गड्ढे में झाँका, काला कुत्ता कंकड़ से बौखलाया, उसपर झपट पड़ा । लहू लुहान भोला को रघु और सब खेलेने वालों ने टांग कर घर पहुंचाया। मोटे सूए से 14 इंजेक्शन लगे उसके पेट पर। 15-20 दिन बाद भोला खेल के मैदान पर आया। आते ही रघु की तरफ बढ़ा। सब कोई चौकन्ने हो गए। आश्चर्य कि भोला ने रघु के पैर पकड़ लिए और माफी मांगी।
उस दिन के बाद लोगबाग ज्यादा सचेत हो गए। कोई रघु से पंगा नहीं लेता था। पर दुनिया तो बहुत बड़ी है। एक दिन क्रिकेट खेलते समय गेंद गोपाल के दोमंजिले छत पर जा गिरी। गोपाल के चाचा कॉलेज में पढ़ते थे। बहुत गुस्सैल और तुनक मिजाज थे। एयर गन से चिड़ियों का शिकार करते थे। किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी गेंद लिवा लाने की। जाते भी कैसे। दोपहर को सबकोई घर का दरवाजा बंद करके आराम करते थे। ऐसे भी पड़ोस में बच्चों का शोरगुल किसे अच्छा लगता है। रघु को एक मौका लग गया अपनी बहादुरी दिखाने का। जबतक कोई समझता वह छत से नीचे आते बरसाती ह्यूम पाइप से ऊपर चढ़ता दिखाई दिया जैसे लोग ताड़ के पेड़ पर चढ़ते हैं। छत पर उसे गेंद खोजने में परेशानी हो रही थी। गेंद मिल तो गया पर साथ ही गोपाल के चाचा जग गए। वे चिल्लाये, एयर गन लेकर दौड़े और नीचे उतरते रघु पर छर्रा दाग दिया। छर्रे से रघु की बांह छिल गई। उसके बाद रघु ने गोपाल के व्यसक चाचा को अभिवादन करना छोड़ दिया। जब भी दोनों आमने-सामने होते, रघु की घूरती आंखे उन्हें हिंसक नजरों से पीछा करती।
सब बच्चों ने पैसा जमा कर क्रिकेट के बैट और 4 विकेट बढ़ई से बनवाए थे। उस सड़क के दादा शंकर को बैट-विकेट पसंद आ गए। जब भी इच्छा होती मांगकर अथवा छीन कर ले जाता। एक बार तो हुज्जत कुछ ज्यादा बढ़ गई। शंकर एक तगड़ा घूंसेबाज़ था। रघु के आपत्ति करने पर उसने एक घूंसा उसके मुंह पर जड़ दिया। होंठों से खून छलक उठा। शंकर बैट-विकेट छीन कर अपने घर ले गया। उसने धमकी भी दे डाली। अगर कोई भी हाथ लगाएगा तो बहुत पिटेगा। उसके बाद छोटे बच्चे दीवार पर 3 लकीर खींचकर या एक तिपाई रखकर पुराने टूटे बैट से खेलने लग गए। जब कभी शंकर का मन करता वह बैट-विकेट खेलने अपने कोर्टयार्ड में बुला लेता। शायद अंग्रेजों के शासन में हिंदुस्तानियों को ऐसा ही लगता होगा जैसा इन बच्चों को लगता था।
एक दिन रघु फिर शंकर के हाथों बुरी तरह पीट गया। रघु अपने साथियों के साथ बैट-विकेट वापस हथियाने की बहुतेरी योजना बनाता रहता था। इसकी चुगली रमेश ने शंकर से कर दी। रघु ने मन ही मन फैसला किया। वह अपनी योजना में किसी को शामिल नहीं करेगा। कोई भी चूक बहुत भारी हो सकती थी। इसलिए बचने का रास्ता भी अचूक होना चाहिए।
देखते-देखते एक साल बीत गए। रघु के पिताजी का तबादले का ऑर्डर आ गया। एक महीने के अंदर जाना था। एक-एक करके दिन नजदीक आता जा रहा था। रघु की बैचेनी बढ़ती जा रही थी। घर का समान बड़े-बड़े लकड़ी के बक्से में पैक होता जा रहा था। एक दिन दोपहरी को एक ट्रक घर के सामने आ लगा। कुली तैयार पैकेज लादने लगे। यही एक और आखिरी मौका था।
ढलती दोपहरी को रघु शंकर के घर के सामने था। शंकर का छोटा भाई शुक्ला जो हर वक्त खेलने को तैयार रहता था, दौड़ कर आ गया और मिन्नत करने लगा “आसपास” खेलने को। ऐसा हरदम होता था। यही रघु की योजना की बुनियाद बनी। पहले रघु चोर बना और दिखावटी देर लगाकर शुक्ला को ढूंढा। इसे बीच रघु ने ताड़ लिया की बैट-विकेट घर के पिछले हिस्से में खुले गैरेज की दीवार पास रखा था। गैरेज के बगल से गलियारा पीछे की दीवार तक जाता था। दीवार 10 फीट ऊंची रही होगी। उसके पीछे सर्विस लेन थी जहां अहले सुबह मेहतर आते थे और देर रात कभी-कभी चोर। बच्चे भी आम-अमरूद-ईमली चोरी से तोड़ने उधर जाते थे।
इस बार शुक्ला चोर बना। उसे आँख मूँद कर 100 तक गिनती गिननी थी वह भी मकान की ओट में दूसरी ओर खड़े होकर। 100 तक गिनती गिनने में 7 वर्ष के बच्चे को 3 मिनट तो लगते ही। रघु दौड़ कर छिपने के बजाय गैरेज के अंदर से बैट-विकेट लेकर दौड़ता हुआ एक-एक कर सभी को दीवार के पार सर्विस लेन की तरफ उछाल दिया।
आसपास खेलने के बाद थक कर रघु और शुक्ला गेट के बाहर पुलिया पर सुस्ताने और बतियाने लगे। तभी एक गिरगिट सामने वाले गोपाल के चाचा के मुंडेर पर दिखा और दिखा 6/6 फीट का हरी नक्काशी वाली शीशे की बहुत बड़ी खिड़की। गोपाल का पूरा परिवार पूजा की छुट्टियों में गाँव गया हुआ था। रघु के दिमाग की बत्ती कौंधी। शुक्ल को गिरगिट पर निशाना साधने के लिए उकसाया। भला छोटे से शुक्ला से क्या निशाना सधता। कमान रघु ने संभाली। बड़ा सा पत्थर उठाया। रघु का सोचा समझा निशाना भी भयानक रूप से चूंका। गिरगिट को लगने के बजाय शीशे पर लगा। पूरा भारी-भरकम शीशा आवाज के साथ गिरा। शुक्ला को काटो तो खून नहीं। दोनों में तुरत सहमति हुई- किसी को कुछ नहीं बताएँगे और अपने-अपने घर भाग लिए।
रघु अपने घर से एक बोरा लेकर तेज कदमों से 2 फरलांग दूर सर्विस लेन गया। बैट-विकेट को बोरे में डाला, बोरे का मुंह को रस्सी से कसकर बांधा। तुरत ही वह ट्रक के पास आकर, खलासी से उस बोरे को सहेज कर रखवा दिया।
वर्षा रुक-रुक कर लगातार हो रही थी। शाम का अंधेरा छाने लगा था। ट्रक अब रवाना होने की तैयारी में था। रघु की अगली योजना और भी रोमांचक थी। रघु ने अपना टूटा जूता हाथ में लिया और माँ से पैसे लेकर मरम्मत को निकल गया। सुबह होते ही ट्रेन से रवाना होना था। मोची को जूता देकर 1 घंटे में आने को कह रघु अपने दूसरे मिशन पर निकल पड़ा। उसे मालूम था कि शंकर रात होने पर खेल कर दोस्तो के साथ मस्ती कर घर लौटता है।
रघु पुनः सर्विस लेन में आगे बढ़ रहा था। अंधेरा बढ़ता ही जा रहा था। उसके हाथ में गुलेल और 5 शीशे की गोलियां थीं। शंकर के घर के पिछवाड़े पुरानी दीवार के पास पहुँच उसने 2-3 ईंटें दीवार से निकाले पैर जमाने के लिए। दीवार पर चढ़ रघु अपने शिकार की ताक में जम कर बैठ गया। ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा।
शंकर भींगते ठिठुरते सामने गेट से दाखिल हो आगे बढ्ने लगा। तभी गुलेल की गोले झन्नाटे से उसकी कनपटी पर लगी। वह वहीं अचेत होकर गिर गया।
घर से निकले एक घंटे से ऊपर हो चुका था। रघु मोची की दुकान से जूता लेकर बारिश में भींगते हुए 100 मीटर के धावक की तरह दौड़ते हुए घर की ओर भागा। सामने से रमेश आ रहा था। बिल्ली के भाग से छींका टूटा। रघु ने मुट्ठी बाँधी और बगल से गुजरते हुए उसके पेट पर एक जोरदार मुक्का मारा। एकदम न्यूटन के इम्पल्सिव फोर्स सा मुक्का खाकर रमेश कराहते हुए वही बैठ गया।
सुबह पाँच बजे रघु का पूरा परिवार विक्टोरिया से स्टेशन के लिए रवाना हो गया। ट्रेन तो 9 बजे सुबह थी पर बहुत सारा सामान लगेजवैन में भी चढ़ाना था। ट्रेन छूटने से कुछ पहले रघु के पिताजी के मातहत विदा करने आए। चपरासी माँ की ओर मुखातिब होकर बोला- माताजी ! रघु बाबू बहुत पोपुलर हैं। बहुत से साथी घर पर आए थे । निराश लौट गए।

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