Thursday, 26 March 2020

आसमान की सैर - भाग 2


अब आगे की कहानी ----

रौशनी, कुसुम और रोहित को मानो काठ मार गया हो । न जाने कितनी देर उधर ही एकटक देखते रहे जिधर किट्टू बह कर गया था । तन्द्रा तब टूटी जब मोहित ने पूछा – “दीदी ! किट्टू डूब गया ? किट्टू मर जाएगा ?” । उसके बाद दोनों बहने चिल्ला-चिल्ला कर रोने लगी । रोहित भी रोने लगा । अन्दर से माँ दौड़ते हुए आयी और रोने का कारण पूछा । किसी तरह रौशनी ने बताया । उस दिन तीनो रोते-सुबकते सो गए । मोहित को तो लगता था की किट्टू बचकर आ जाएगा । वह तो एक-दो बार बाहर झाँक भी आया । तीनों बिना खाए-पिए सो गए ।

बच्चों को हरदम ऐसा लगता की किट्टू बचकर आ जायेगा किसी भी क्षण । माँ-पिताजी ने कई बार उन्हें समझाने का प्रयत्न किया । उन्हें किट्टू की बहन रेक्सी भी लिवा लाने का सुझाव दिया । परन्तु उन्हें तो किट्टू चाहिए था, सिर्फ और सिर्फ किट्टू । इसी तरह उदास रहते और इन्तजार करते महीना बीत गया । हर रोज सुबह, आँख खुलते ही, बच्चे बरामदे पर आ जाते, किट्टू की आस में ।

किट्टू डूबा नहीं था । एक तो वह बिलकुल हल्का था और दूसरे उसे डूबते को तिनके का सहारा मिल गया था । उसे एक पेड़ की मोटी डाल मिल गयी थी । पानी का बहाव इतना तेज था कि वह थोड़े ही समय में मीलों दूर निकल गया । वह डूबते-उतराते मालूम नहीं कब सो गया या बेहोश हो गया उसे पता नहीं । सुबह उसने अपने को नदी के किनारे हंसों के झुण्ड के बीच पाया । हंस उस समय पानी में चोंच डुबाकर मछलियाँ पकड़ रहे थे । वे उन मछलियों को चोंच में दबाकर लाते और झुरमुट में पल रहे अपने बच्चों को निवाला बनाकर खिलाते । किट्टू को यह सब देखकर जोरों की भूख लग आयी । वह हिम्मत कर हंसों के झुण्ड के काफी नजदीक आ गया । किट्टू इतना छोटा था की हंसों को एकदम डर नहीं लगा । हंसों को मामला समझते देर नहीं लगी । वे सब किट्टू को भी खाने के लिए मछलियाँ परोसने लगे ।

किट्टू से एक बड़े हंस ने इशारे से पूछा की वह यहाँ आबादी से इतनी दूर कैसे आया । किट्टू ने भी इशारे-इशारे में लगभग सभी कुछ बता दिया । हंसों ने किट्टू को उनके पीछे-पीछे चलने को कहा । उनलोगों ने अपने घोसले के पास चट्टानों के बीच एक कन्दरा में छुपकर रहने को कहा । शाम ढलते जंगली सियार और कभी-कभी शेर-बाघ भी पानी पीने आते थे । सियार तो हंसों के अंडे-बच्चे खाने का भी इरादा रखते थे । हंसों का झुण्ड एकजुट होकर अपनी और अपने अंडे-बच्चों की रखवाली करते थे ।

शाम ढलते सभी हंस आपस में सलाह करने लगे कि किट्टू को उसके घर कैसे पहुंचाया जाये । उन्हें घर का पता भी नहीं मालूम था और ये भी नहीं की वह कितनी दूर है । बस उन्हें इतना मालूम था की किट्टू पश्चिम से पूरब की तरफ बह कर आया था । पश्चिम का सबसे नजदीकी गाँव 10 मील दूर था । हकीकत में किट्टू का घर उससे भी दूर शहर से सटे हुए गाँव में था । हंसों को कोई ऐसी तरकीब नजर नहीं आ रही थी जिससे किट्टू को सकुशल गाँव तक पहुँचाया जा सके । किट्टू को पैदल जाना पड़ता और हंस उड़ते हुए उसकी रखवाली करते । उसपर घर तलाश करना जोखिम से भरपूर था । पूरा रास्ता कम से कम एक-दो दिन में पूरा होता इसमें हादसा होने की बहुत गुंजाईश थी । जानवरों और पक्षियों से तो बचाया जा सकता था । मनुष्यों से बचाना बहुत मुश्किल था । शरारती बच्चों को कुत्तों पर पत्थर मारना अच्चा लगता था । कुछ मनुष्य तो कुत्ते को भी मार कर खा लेते थे । बहुत रात ढले ये निर्णय लिया गया की हंसों के मुखिया बुजुर्ग राजू काका से अगली सुबह सलाह ली जाए । वे नदी के उस पार रहते थे । उनके पास बहुत अनुभव था । वे कभी किसी को निराश नहीं करते थे ।

अगली सुबह सब बातें सुनने के बाद राजू काका ने बहुत सोच कर बताया । बहुत वर्ष पहले उनलोगों ने भी एक कछुए को सूखे तालाब से दूर नदी में बसने के लिए एक तरकीब लगाई थी । दो हंसों ने एक मजबूत डंडी का दोनों किनारा चोंच में पकड़ लिया था । कछुए ने डंडी को बीचो-बीच मुंह से पकड़ लिया था । कछुए को सख्त हिदायत दी गयी थी । वह उड़ते वक्त अपना मुंह कदापि नहीं खोलेगा । ऐसा करने से वह बहुत ऊचाई से नीचे गिर कर मर जाएगा । राहगीरों ने आकाश में डंडी से झूलते कछुए को देखा तो वह तरह-तरह के मजाक करने लगे । कछुए से रहा न गया । उसने मुंह खोल ही दिया । कछुए की दर्दनाक मौत हो गयी । राजू काका ने सोच-समझ कर ऐसी योजना बनायी जिसमें हादसा होने की कोई गुंजाईश नहीं थी । किट्टू को नदी किनारे बहते पॉलिथीन के थैले में रखा जय और उसका हत्था डंडी में फंसा दिया जाए । हंस डंडी का दोनों किनारा चोंच में दबाकर उड़ेंगे ।

इसी दौरान एक बहुत सुखद घटना हुई । नैना-मैना किट्टू को खोजते हंसो के झुरमुट के पास पहुँच गयी । सुबह के समय हंस मछली पकड़ रहे थे । किट्टू भी उनके साथ जलपान कर रहा था । मैना किट्टू को देखते ही चिल्लाई-“किट्टू ! किट्टू ऊ ऊ ऊ !” कित्तौ चिल्लाया-"नैना !" उस के बाद किट्टू और हंसों का नाचना और झूमना देखने लायक था । मैना ने किट्टू को घर का सभी हाल बताया । किट्टू के आँखों से आंसूं निकल आये । अब किट्टू किसी भी तरह अपने गाम जल्द से जल्द पहुँचना चाहता था ।

सभी कुछ योजनाबद्ध सुरक्षित तरीके से हुआ । सुबह की रात का समय चुना गया। मैना आगे, उसके पीछे किट्टू का यान , उसके पीछे तीर की शक्ल में 15 हंस । ठीक सुबह चार बजे किट्टू को फार्म के बगीचे में उतारा गया । पूरा इलाका सो रहा था । किसी मनुष्य ने यह उड़ान ना तो देखी और न उन्हें हल्ला करने का मौक़ा मिला । किट्टू उतरते ही कभी दौड़कर घर के दरवाजे तक जाता और कभी धन्यवाद देने हंसों के पास आता । हंसों ने किट्टू को मुंह में दबाई हुई मछली और कमल के फूल दिए । उनलोगों ने हमेशा मिलते रहने का वादा किया । पलक झपकते हंसों का काफिला रात के अन्धकार में आकाश में खो गया ।

सबसे पहले रौशनी को किट्टू के भूँकने और दरवाजा खरोचने की आवाज सुनायी दी । उसे लगा वह फिर रोहित की तरह सपना देख रही है । तभी बॉबी मैना ने कुहुंक लगाई- “देखो देखो किट्टू आया है ।” इसे तीनो बच्चों ने सुना और माँ-पिताजी ने भी । सभी दरवाजा खोलने दौड़ पड़े । पिताजी ने दरवाजा खोला । किसी को विश्वास नहीं हो रहा था । उस सुबह माँ-पिताजी ने बच्चों को बिस्तर पर किट्टू के बैठने और लाड-प्यार पर कोई ऐतराज नहीं किया ।

सुबह बच्चे स्कूल नहीं गए । बगीचे में किट्टू को तरह-तरह के स्नैक्स खिलाते रहे और खेलते रहे । किट्टू बार-बार उन्हें वह डंडी और और उससे बंधे थैले के पास ले जाता और आकाश की ओर दिखाता । नैना मैना भी टूटी-फूटी पर बहुत ही मधुर आवाज में कुछ बोलती । जो हुआ वह बिलकुल अकल्पनीय और अविश्वनीय था । कोई कैसे समझता ।

दूसरी सुबह अखबारों में यह प्रकाशित हुआ । 6 माह का पोमेरेनियन किट्टू कैसे बाढ़ की उफनती नदी में बहता हुआ दूर तक निकल गया और मीलों का सफ़र एक महीने में पूरा कर रौशनी, कुसुम और रोहित की महक पकड़ता हुआ घर तक पहुँच गया । किट्टू की बच्चों के साथ तस्वीर भी छपी थी । बहुत दिनों तक लोग किट्टू को देखने आते रहते थे ।

इस घटना को पांच वर्ष गुजर गए । आजकल किट्टू क्रिकेट में अंपायरिंग भी करने लगा है । काला हैट और हरा चश्मा लगाकर बिकुल ललनटॉप लगता है ।