Sunday, 5 July 2020

एक निमंत्रण ऐसा भी


आजकल ट्रेन यात्रा कितनी सुलभ हो गई है। एडवांस मनचाहा टिकट बुक कर लें। निर्धारित समय पर अपनी कार, या ओला/उबर से स्टेशन पहुँच जाएँ। ट्रेन यात्रा समाप्त होने पर पुनः मनचाही सवारी से अपने गंतव्य पहुँच जाएँ। गंतव्य गाँव है तब भी कोई मुश्किल नहीं। गाँव-गाँव तक अच्छी सड़कें बन गई हैं। अब तों ग्रामवासियों का स्टेटस सिम्बल हाथी/घोड़े के बजाय मोटरकार हो गई है।
एक जमाना था जब महज एक पोस्टकार्ड ही समाचार जानने का जरिया होता था। शादी का कार्ड बुकपोस्ट से सफर तय करता था। टेलीफ़ोन दुर्लभ था और ट्रंक काल पर बातें करना बात का बतंगड़ हो जाने का शर्तिया अंदेशा।
बात 1976 की है। धीरे-धीरे डीजल इंजिन, स्टीम इंजिन की जगह ले रही थी। यह एमर्जन्सि काल था। यह समय आम नागरिक के लिए बहुत डरावना था पर चोरी-डकैती और नक्सल इरादे उसी तरह कामयाब थे। लगता था की जैसे शराब और नशाखोरी सरकार रेविन्यू बटोरने के लिए नहीं रोकती थी वैसे ही चोरी-डकैती, अपहरण और नक्सलिस्म पुलिस की मजबूरी थी।
मेरे मित्र अशोक मिश्रा दोपहर 1 बजे धनबाद से सासाराम स्टेशन पहुंचे।साले की शादी थी। चलते समय हितेशियों  ने खबरदार कर दिया था। इलाका डकैतों का है। लूटते तो हैं ही, निशानदेही के अंदेशे से जिंदा भी नहीं छोड़ते हैं। 3 बजे तक आसरा देखा। लगता था चिट्ठी नहीं मिली। गलती अशोक की भी थी। योजना ससुराल पहुँच कर बारात के साथ विवाह स्थल पहुंचाना था। छुट्टी न मिलने के कारण अशोक सीधे विवाह स्थल ही जा रहे थे। स्टेशन से बाहर बस पकड़ने निकले।
नोखा की बस चार बजे आई। छोटी 407 मिनी बस थी । बड़ी मुश्किल से बैठने की जगह मिली। वह भी इस कारण की पैंट-शर्ट, लाल एक्सक्लूसिव जूते और हाथ में मोटरी के बजाय बजाब्ता लाल सूटकेस देखकर कंडक्टर सरकारी ऑफिसर या पोलिसिया समझ बैठा था। बस खचाखच भरी थी। अंदर काफी गर्मी हो गई थी।  खिड़की के पास एक रोबदार, गठियाए पर धूप से झुलसे वृद्ध बैठे थे। जैसे ही अशोक ने खिड़की खोलने के लिए हाथ बढ़ाया। वृद्ध ने इशारे से मना कर दिया। बस की छत पर काफी यात्री बैठे थे, खैनी मुंह में दबाये हुए। अगर खिड़की खुली तो पूरा का पूरा थूक का सैलाब बदन सरोबार कर सकता था।
20 किलोमीटर की दूरी बस ने एक घंटे में पूरी की। अशोक के साथ बगल में बैठे वृद्ध और 4-5 जन भी उतरे। बात करने पर मालूम हुआ की दो जन सीतलपुर में बाराती जा रहे थे, बाकी राजपुर के निवासी थे जिन्हे भी सीतलपुर होकर जाना था। मालूम हुआ आसपास गाँवों को मिलाकर 4-5 शादी थी।  सीतलपुर 5 किलोमीटर पूरब था और वहाँ पैदल ही जाना था। समय गंवाना बेकार था। सहयात्रियों में कोई भी संदिग्ध नहीं लग रहा था बल्कि वृद्ध को समुचित आदर दिखते सब संस्कारी लग रहे थे। भगवान का आसरा करते अशोक जी निकल पड़े।
निगाहें पूरब की ओर डूबते सूरज पर थी। तभी पीछे से किसी के दौड़ते हुए नजदीक आने की आहट आई। नंगे बदन गमछा लपेटे कोई श्रमिक लग रहा था। वृद्ध ने हांक लगाते हुए रूकने को कहा। पूछा – अबे कहाँ जा रहा है? कौन जात है ? उसने झुक कर कहा- मालिक ! कहार हैं। सादी में कंपनी के लिए बीड़ी-तंबाकू लेने गए थे। । नाच-गाना होवेगा ! बुजुर्ग ने उसे कहा- साहब का बक्सा ले ले और सीतलपुर मालिक के जिम्मे दे देना। उस श्रमिक ने अशोक का लाल सूटकेस थामा, सिर पर रखा और दौड़ लिया। इसे भी अशोक ने भगवान भरोसे छोड़ दिया। कोई चारा भी न था। बुजुर्ग मुस्कुराहट के साथ बुदबुदाये – लगता है लौंडा नचाएंगे इसीलिए बीड़ी-तंबाकू का इंतजाम हुआ है। रास्ते भर कोई भी किसी से परिचय नहीं मांग रहा था। बहुत कम देर का साथ था या फिर परिचय बेतकल्लुफ़ी को सीमा में न बांध दे। अशोक को सिगरेट की लत थी। इस कारण भी वह बुजुर्गवार से दूरी बनाए हुए था।  
अभी आधी ही दूरी तय हुई थी की अंधेरा होने लगा। दूर रोशनी दिखायी देने लगी थी। सड़क छोडकर दाहिने तरफ नाले को पार करना था। सब लोग धोती समेत कर नाले मे उतर पड़े। अशोक को पहले जूता-मोजा उतरना पड़ा और उसके बाद पैंट घुटने के ऊपर तक समेटना पड़ा। इस कारण पीछे पड़ गए। नाले में गलत जगह पैर पड़ गया जहां गड्ढा ज्यादा था। जैसे ही आधा नाला पार हुआ, सामने दूसरे किनारे पर 5-6 लठैत खड़े दिखे। अशोक क्या सभी जहां के तहां जड़वत हो गए, सिवाय वृद्ध के । शायद लठैत हमारे दिल का हाल जान गए। वहीं से चिल्लाये – हमलोग के मेहमान आ रहे हैं, उन्ही को लिवा ले जाने आयें हैं, डरिए मत पार लग जाइए। जान में जान आई। उन लठैतों ने वृद्ध का बारी-बारी से पैर छूआ। पीछे अंधेरे में जीप लगी थी। वृद्ध सज्जन को जीप पर बैठा कर बढ़ गए।  
गाँव के अंधेरीया में जब पेट्रोमैक्स जलता है तो बहुत दूर तक उजाला हो जाता है। बरातियों की मेहमान-नवाज़ी के लिए स्पेशल रोशनी का इंतजाम था। ठीक बीचोबीच तिपाई पर पेट्रोमैक्स रखा था। परती खेत पर तारपोलीन बिछाया गया था। एकदम किनारे पुआल के मुलामियत पर सफ़ेद चादर बिछी थी। मसनद भी था। 100 बरातियों के सोने का इंतजाम था। दूसरी तरफ सामने की ओर 4-6 चौकियों को मिलाकर उस पर दरी बिछायी गई थी। इसी मंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रम यानी नाच-गाना होना था।
अशोक अपने साले दूल्हे और उनके मित्रो के साथ शामियाने का एक कोना पकड़ लिए। सिगरेट भी पीना था वह भी बहुत सावधानी के साथ- नीचे पुआल, ऊपर कपड़े का शामियाना और दूसरे कोने पर बराती के बुजुर्गों की नजर। खैर शामियाना काफी लंबा-चौड़ा था। आते ही खबर का आदान-प्रदान हो गया था। लगन की भरी तेज़ी के कारण बनारस से बाई का इंतजाम नहीं हो पाया। सासाराम से बाई की व्यवस्था की गई थी।
8 बजे तक बरातियों को भोजन करा दिया गया। 9 बजते-बजते पूरा पंडाल शरातियों से भर गया। बाराती अलग पर सबसे आगे बीच में। बैठकी उम्र के लिहाज से पूरे तमीज़ के साथ लगी थी। मंच पर ढोलक-हार्मोनिअम की जगह ग्रामोफोन पर फिल्मी गाने की आवाज बड़े-बड़े स्पीकर से गूंज रही थी। पाकीजा के चलते-चलते गाने की शुरुआत के साथ दो बाई मंच पर घूँघट लिए थिरकने लगीं। पहले गाने की महीनियत तीसरे गाने के बजते ही गायब हो गई। स्पीकर की जोरदार आवाज को दोनों बाई अपने घुंघरू की आवाज से दबाने की कोशिश में मीना कुमारी से शम्मी कपूर बन गई थीं। किसी ने बताया की बाई लोग नहीं मिली तो सब्जी बेचने वाली कुंजरिनो को उठा लाये थे। कुछ देर बाद फरमायीशी नाच-गाना होने लगा। बुजुर्गवार के पास बाई जाकर व्योछावर भी ले आती थीं। कार्यक्रम 2 बजे रात तक चला। अशोक तो यह सब देखते-सुनते कभी का सो गया।
सुबह शोर मचे पर अशोक की नींद खुली। पुलिस की जीप लगी थी। किसी डाकू को खोज रहे थे। पुलिस के जाने के बाद अशोक ने शरातियों ने पूछा। पुलिस उस इलाके के दुर्दांत डाकू परमा सिंह की तलाश में आई थी। वही वृद्ध जो बस से साथ उतरा था और जिसे ले जाने घाट के किनारे जीप सवार इंतजार कर रहे थे।  


ये तो होना ही था

रघुराज हमेशा की तरह दोपहरी की तपिश कम होते ही अपने नाती को लेकर पार्क में आए। वे अपनी पसंदीदा बेंच पर बैठ गए। बेंच के बाई तरफ बच्चों के खेलने का प्ले स्टेशन था और दायी तरफ छोटा सा तालाब जिसमें इस बेला में 10-15 बत्तकें तैरती मिलती थीं। 5 वर्ष का अर्जुन दौड़ता हुआ प्ले स्टेशन की ओर चला गया। रघुराज ने जैसे ही अपने पॉकेट में हाथ डाला, बत्तकें एक कतार बना उनकी ओर आने लगीं। रघुराज बिस्कुट और ब्रेड का टुकड़ा बिखेर देते थे। कोई-कोई बत्तक तो उनके हाथ से भी टुकड़े चुग लेती थी। पार्क की दूर तक फैली हरियाली, क्यारिओं में तरह-तरह के फूल, जॉगिंग और कसरत करते युवा, सैर करते वरिष्ठ, मखमली घास पर दौड़ते-खेलते बच्चे, तालाब और उनपर मस्ती करतीं बत्तकें, किसी का भी मन मोह लेता। शाम का ये दो घंटा दिनभर का सबसे आह्लादित करने वाला समय था। वे हर दिन इस समय का इंतजार करते थे।

अर्जुन कभी-कभी पास आकर बॉटल से पानी पी लेता और खेलते समय होने वाली एक-दो घटनाएँ उखड़ती साँसों के साथ बताकर फिर खेलने भाग जाता। घटनाएँ मसलन- आज मैंने उसे स्लाइडिंग में हरा दिया, आज हाइड अँड सीक में मैं एक बार भी चोर नहीं बना, अनन्या मुझसे ज्यादा बड़ी पेंगें लगती है झूले पर वगैरह। इधर दो-तीन दिनों से उसकी सारी बातें अनन्या पर केन्द्रित होती। एक बार अर्जुन-अनन्या दोनों पानी पीने भागे-भागे आए। रघुराज ने देखा की अनन्या शायद वहाँ खलेने आते बच्चों में सबसे सुंदर और आकर्षक थी। रघुराज ने प्रशंसा की और कहा – बहुत प्यारी हो।“ अर्जुन कुछ सोच में पड़ गया। दोनों दौड़ कर लौटने लगे तो अर्जुन लौट कर मेरे पास आया और बोला –“नानू ! अनन्या अच्छी है ना । वह कहती है की मैं उसे बहुत अच्छा लगता हूँ “ मैंने मुस्कुराकर सिर हिला दिया। जिस दिन अनन्या वापस अपने शहर लौट गई उस दिन अर्जुन बहुत उदास था। उस दिन पार्क में वह रघुराज की गोद में सिर रख सो गया, खेलने नहीं गया। रघुराज अर्जुन का सिर सहलाते सोच रहा था कि क्या इतनी छोटी उम्र में भी.... ? उन्हें अपना बचपन याद आ गया।

रीना रघु से दो साल बड़ी रही होगी। उनकी दोस्ती घर के बाड़े के पास लगे आम के पेड़ के चलते हुई। पेड़ रघु के बाड़े में था। ज़्यादातर कच्चे-पके आम रीना के हाते में गिर जाते थे। रघु जब भी आम चुनने जाता दोनों में लड़ाई हो जाती। दोस्ती तब हुई जब आम गिरने पर रीना ने आवाज लगाकर बुलाया और सब आम रघु को दे दिया। रघु शरमाकर आधे से ज्यादा आम रीना को लौटा दिये।

रीना जब भी कच्चे आमों का चटकारा बनती नमक-मिर्च के साथ तो रघु को जरूर बुलाती। पड़ोसियों के बीच बहुत अच्छी आवाजाही होती थी। कोई खबर होती, कोई फिल्म लगती, कोई व्यंजन बनता तो सबका आदान-प्रदान होता। जिस दिन रीना के स्कूल में छुट्टी होती, रीना और रघु टिफिन में कुछ भी डालकर लाते और आम के पेड़ की छाया में बैठकर सांझा करते।पूछने पर कहते की हमलोग पिकनिक कर रहे हैं ।
रीना की बड़ी बहन की शादी होने वाली थी। रीना की दीदी जब कभी किसी गाने का रिहर्सल करती तो रीना और रघु जज बनते। तय यह होता कि दीदी को भी रीना-रघु का गीत सुनना पड़ेगा। एक दिन टिफिन सांझा करने के बाद दोनों कोई गीत गुनगुना रहे थे। आसपास की कोई खबर ही नहीं रही। जब सिर उठाया तो देखा की सबकोई शांत खड़े मुस्कुरा रहे थे ।

बड़े लोग इन दोनों की प्रगाढ़ मित्रतता पर चुटकियाँ लेने से बाज नहीं आते। एक दोपहरी रघु और रीना बैर की तलाश में जंगल की ओर ज्यादा गहरे चले गए । रास्ता भूल गए । किसी तरह पूछते टोह लगते ये दोनों बहुत देर बाद घर लौटे । घर के बरामदे में तो भीड़ लगी थी । दोनों दिखे तब जान में जान आयी। पर किसी ने मजाक कर ही दिया - हमलोग तो सोचे कि दोनों भाग लिए.। सबलोग खिलखिला के हंस पड़े। कुछ अच्छा भी  होता रहा । अगर रघु सुबह तैयार होने  या पढ़ने में आनाकानी करता तो खबरदार कर दिया जाता - रीना से शिकायत कर देंगे। इसी तरह अगर रीना घर के काम में हाथ बंटाने में आलस दिखाती तब रघु को आवाज लगा दी जाती ।

जीवन की गाड़ी कई मौसम झेलते, कई पड़ाव बदलते एक नए शहर पहुंची। रघु कभी भी जीवन के उन जीवंत क्षणों को नहीं भूला। अब वह एक शांत, शर्मीला, कम बोलने वाला किशोर हो गया था ।

रघु स्कूल की परीक्षा पास कर कॉलेज में एड्मिशन की तैयारी कर रहा था। एक शाम जब वह अपने कमरे में पढ़ाई में व्यस्त था तभी छोटा भाई बुलाने आया – देखो ! कोई मिलने आया है। बैठके में आने पर एक पूरा परिवार दिखाई पड़ा। वह किसी को पहचान नहीं पाया। तभी एक मोटी-ताजी,युवा लड़की ने मुस्कुराकर कहा-“ “नहीं पहचाना ! मैं रीना हूँ । अरे ! रघु तो शरमा रहा है।“वह मेडिकल में दाखिले के लिए आई हुई थी। वह तरह-तरह के संस्मरण सुना रही थी। रघु जड़वत खड़ा सुनता रहा। उसकी यादाश्त में तो वही छुई-मूयी नन्ही सी रीना बसी हुई थी।








Saturday, 27 June 2020

कोबरा

मैंने गौडफादर पर बनी मूवी पहले देखी और बाद मे उपन्यास। मूवी का सबसे रोमांचक क्षण तब आता है जब अपने पाँचों माफिया दावेदारों से रंजिश भुलाकर माईकल से मिलने का दिन तय होता है। माईकल के दिमाग में एक निर्मम योजना थी। तय दिन सुबह माईकल चर्च में अपने बड़े भाई के बच्चे का बपतिस्मा करा रहा होता है, चर्च की घंटियाँ बज रही होती हैं और उसी समय पाँचों दुश्मनों को मौत के घाट उतारा जा रहा होता है। मुझे अपने मोहल्ले के १२ वर्षीय रघुराज की याद आ गयी ।  उसने भी उस कच्ची उम्र में अपने तीन दुश्मनों से  एक झटके में इंतकाम लिया था ।

वह समय आजाद भारत के अंगड़ाई लेकर जागने का था। एक तरफ पंडित नेहरू बड़े-बड़े कल-कारखाने लगवा रहे थे तो दूसरी ओर सुहारवर्दी का पुतला जलाया जाता था। आजाद भारत का पहले छात्र आंदोलन की आग ठंडी पड चुकी थी। उपराष्ट्रपति राधाकृष्णनन राष्ट्रपति पद की दावेदारी ठोकने लगे थे।

रघु घर का क्या पूरे पड़ोस का दुबला-पतला , कमजोर दिखने वाला, सबसे छोटे कद का लड़का था। यही कमजोरी उसकी मजबूती होने वाली थी। उसकी कोशिश रहती की वह खेलकूद में ही नहीं अपितु बदमाशी, मस्ती, लड़ाई-झगड़े यहाँ तक की पढ़ाई-लिखाई में भी सबसे अव्वल रहे। पीटता था पिटाता था परंतु झुकता नहीं था। मजाल है की कोई उसको चोट अथवा हानि पहुंचा दे। कितना भी ताकतवर हो, कितना भी चालाक हो , रघु बदला ले ही लेता था, आज नहीं तो कल, कल नहीं तो बरसों बाद। इसी कारण उसे उसके सहचर कोबरा-करैत की संज्ञा देते ते।

एक बार किसी बात पर उसकी तकरार अपने से बड़े और शक्तिशाली लड़के भोला  से हो गई। बात मारा-मारी पर आ गई। उस लड़के ने रघु की जमकर पिटाई की। उस दिन के बाद रघु उसके साथ खेल में तो शामिल होता था पर बातचीत बिलकुल बंद। 6 महीने बाद सब कोई आसपास (लुका-छिपी) खेल रहे थे। रघु ने देख रखा था कि खेल के मैदान के कोने में एक बड़ा गड्ढा था। उसमें एक काला कटखना कुत्ता दोपहरी की गर्मी से बचने के लिए आराम करता था। भोला  चोर बना था और बाकी छिपे लड़को को खोज रहा था। सबसे पहले रघु बरामद हुआ। रघु ने गड्ढे के पास जाकर ऐसा दिखाया कि कोई उसमें छिपा हुआ है। भोला  ताड़ गया।भोला  ने जांच करने के लिए एक कंकड़ फेका। यहीं गलती हो गई। गड्ढे में हरकत हुई।  जैसे ही वह धप्पा करने के लिए गड्ढे में झाँका, काला कुत्ता कंकड़ से बौखलाया, उसपर झपट पड़ा । लहू लुहान भोला  को रघु और सब खेलेने वालों ने टांग कर घर पहुंचाया। मोटे सूए से 14 इंजेक्शन लगे उसके पेट पर। 15-20 दिन बाद भोला  खेल के मैदान पर आया। आते ही रघु की तरफ बढ़ा। सब कोई चौकन्ने हो गए। आश्चर्य कि भोला  ने रघु के पैर पकड़ लिए और माफी मांगी।

उस दिन के बाद लोगबाग ज्यादा सचेत हो गए। कोई रघु से पंगा नहीं लेता था। पर दुनिया तो बहुत बड़ी है। एक दिन क्रिकेट खेलते समय गेंद गोपाल के दोमंजिले छत पर जा गिरी। गोपाल के चाचा कॉलेज में पढ़ते थे। बहुत गुस्सैल और तुनक मिजाज थे। एयर गन से चिड़ियों का शिकार करते थे। किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी गेंद लिवा लाने की। जाते भी कैसे। दोपहर को सबकोई घर का दरवाजा बंद करके आराम करते थे। ऐसे भी पड़ोस में बच्चों का शोरगुल किसे अच्छा लगता है। रघु को एक मौका लग गया अपनी बहादुरी दिखाने का। जबतक कोई समझता वह छत से नीचे आते बरसाती ह्यूम पाइप से ऊपर चढ़ता दिखाई दिया जैसे लोग ताड़ के पेड़ पर चढ़ते हैं। छत पर उसे गेंद खोजने में परेशानी हो रही थी। गेंद मिल तो गया पर साथ ही गोपाल के चाचा जग गए। वे चिल्लाये, एयर गन लेकर दौड़े और नीचे उतरते रघु पर छर्रा दाग दिया। छर्रे से रघु की बांह छिल गई। उसके बाद रघु ने गोपाल के व्यसक चाचा को अभिवादन करना छोड़ दिया। जब भी दोनों आमने-सामने होते, रघु की घूरती आंखे उन्हें हिंसक नजरों से पीछा करती।

सब बच्चों ने पैसा जमा कर क्रिकेट के बैट और 4 विकेट बढ़ई से बनवाए थे। उस सड़क के दादा शंकर को बैट-विकेट पसंद आ गए। जब भी इच्छा होती मांगकर अथवा छीन कर ले जाता। एक बार तो हुज्जत कुछ ज्यादा बढ़ गई। शंकर एक तगड़ा घूंसेबाज़ था। रघु के आपत्ति करने पर उसने एक घूंसा उसके मुंह पर जड़ दिया। होंठों से खून छलक उठा। शंकर बैट-विकेट छीन कर अपने घर ले गया। उसने धमकी भी दे डाली। अगर कोई भी हाथ लगाएगा तो बहुत पिटेगा। उसके बाद छोटे बच्चे दीवार पर 3 लकीर खींचकर या एक तिपाई रखकर पुराने टूटे बैट से खेलने लग गए। जब कभी शंकर का मन करता वह बैट-विकेट खेलने अपने कोर्टयार्ड में बुला लेता। शायद अंग्रेजों के शासन में हिंदुस्तानियों को ऐसा ही लगता होगा जैसा इन बच्चों को लगता था।

एक दिन रघु फिर शंकर के हाथों बुरी तरह पीट गया। रघु अपने साथियों के साथ बैट-विकेट वापस हथियाने की बहुतेरी योजना बनाता रहता था। इसकी चुगली रमेश ने शंकर से कर दी। रघु ने मन ही मन फैसला किया। वह अपनी योजना में किसी को शामिल नहीं करेगा। कोई भी चूक बहुत भारी हो सकती थी। इसलिए बचने का रास्ता भी अचूक होना चाहिए।

देखते-देखते एक साल बीत गए। रघु के पिताजी का तबादले का ऑर्डर आ गया। एक महीने के अंदर जाना था। एक-एक करके दिन नजदीक आता जा रहा था। रघु की बैचेनी बढ़ती जा रही थी। घर का समान बड़े-बड़े लकड़ी के बक्से में पैक होता जा रहा था। एक दिन दोपहरी को एक ट्रक घर के सामने आ लगा। कुली तैयार पैकेज लादने लगे। यही एक और आखिरी मौका था।

ढलती दोपहरी को रघु शंकर के घर के सामने था। शंकर का छोटा भाई शुक्ला जो हर वक्त खेलने को तैयार रहता था, दौड़ कर आ गया और मिन्नत करने लगा “आसपास” खेलने को। ऐसा हरदम होता था। यही रघु की योजना की बुनियाद बनी। पहले रघु चोर बना और दिखावटी देर लगाकर शुक्ला को ढूंढा। इसे बीच रघु ने ताड़ लिया की बैट-विकेट घर के पिछले हिस्से में खुले गैरेज की दीवार पास रखा था। गैरेज के बगल से गलियारा पीछे की दीवार तक जाता था। दीवार 10 फीट ऊंची रही होगी। उसके पीछे सर्विस लेन थी जहां अहले सुबह मेहतर आते थे और देर रात कभी-कभी चोर। बच्चे भी आम-अमरूद-ईमली चोरी से तोड़ने उधर जाते थे।

इस बार शुक्ला चोर बना। उसे आँख मूँद कर 100 तक गिनती गिननी थी वह भी मकान की ओट में दूसरी ओर खड़े होकर। 100 तक गिनती गिनने में 7 वर्ष के बच्चे को 3 मिनट तो लगते ही। रघु दौड़ कर छिपने के बजाय गैरेज के अंदर से  बैट-विकेट लेकर दौड़ता  हुआ एक-एक कर सभी को दीवार के पार सर्विस लेन की तरफ उछाल दिया।

आसपास खेलने के बाद थक कर रघु और शुक्ला गेट के बाहर पुलिया पर सुस्ताने और बतियाने लगे। तभी एक गिरगिट सामने वाले गोपाल के चाचा के मुंडेर पर दिखा और दिखा 6/6 फीट का हरी नक्काशी वाली शीशे की बहुत बड़ी खिड़की। गोपाल का पूरा परिवार पूजा की छुट्टियों में गाँव गया हुआ था। रघु के दिमाग की बत्ती कौंधी। शुक्ल को गिरगिट पर निशाना साधने के लिए उकसाया। भला छोटे से शुक्ला से क्या निशाना सधता। कमान रघु ने संभाली। बड़ा सा पत्थर उठाया। रघु का सोचा समझा  निशाना भी भयानक रूप से चूंका। गिरगिट को लगने के बजाय शीशे पर लगा। पूरा भारी-भरकम शीशा आवाज के साथ गिरा। शुक्ला को काटो तो खून नहीं। दोनों में तुरत सहमति हुई- किसी को कुछ नहीं बताएँगे और अपने-अपने घर भाग लिए।

रघु अपने घर से एक बोरा लेकर तेज कदमों से 2 फरलांग दूर सर्विस लेन गया। बैट-विकेट को बोरे में डाला, बोरे का मुंह को रस्सी से कसकर बांधा। तुरत ही वह ट्रक के पास आकर, खलासी से उस बोरे को सहेज कर रखवा दिया।

वर्षा रुक-रुक कर लगातार हो रही थी। शाम का अंधेरा छाने लगा था। ट्रक अब रवाना होने की तैयारी में था। रघु की अगली योजना और भी रोमांचक थी। रघु ने अपना टूटा जूता हाथ में लिया और माँ से पैसे लेकर मरम्मत को निकल गया। सुबह होते ही ट्रेन से रवाना होना था। मोची को जूता देकर 1 घंटे में आने को कह रघु अपने दूसरे मिशन पर निकल पड़ा। उसे मालूम था कि शंकर रात होने पर खेल कर दोस्तो के साथ मस्ती कर घर लौटता है।

रघु पुनः सर्विस लेन में आगे बढ़ रहा था। अंधेरा बढ़ता ही जा रहा था। उसके हाथ में गुलेल और 5 शीशे की गोलियां थीं। शंकर के घर के पिछवाड़े पुरानी दीवार के पास पहुँच उसने 2-3 ईंटें दीवार से निकाले पैर जमाने के लिए। दीवार पर चढ़ रघु अपने शिकार की ताक में जम कर बैठ गया। ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा।

शंकर भींगते ठिठुरते सामने गेट से दाखिल हो आगे बढ्ने लगा। तभी गुलेल की गोले झन्नाटे से उसकी कनपटी पर लगी। वह वहीं अचेत होकर गिर गया।

घर से निकले एक घंटे से ऊपर हो चुका था। रघु मोची की दुकान से जूता लेकर बारिश में भींगते हुए 100 मीटर के धावक की तरह दौड़ते हुए घर की ओर भागा। सामने से रमेश आ रहा था। बिल्ली के भाग से छींका टूटा। रघु ने मुट्ठी बाँधी और बगल से गुजरते हुए उसके पेट पर एक जोरदार मुक्का मारा। एकदम न्यूटन के इम्पल्सिव फोर्स सा मुक्का खाकर रमेश कराहते हुए वही बैठ गया।

सुबह पाँच बजे रघु का पूरा परिवार विक्टोरिया से स्टेशन के लिए रवाना हो गया। ट्रेन तो 9 बजे सुबह थी पर बहुत सारा सामान लगेजवैन में भी चढ़ाना था। ट्रेन छूटने से कुछ पहले रघु के पिताजी के मातहत विदा करने आए। चपरासी माँ की ओर मुखातिब होकर बोला- माताजी ! रघु बाबू बहुत पोपुलर हैं। बहुत से साथी घर पर आए थे । निराश लौट गए।

Saturday, 20 June 2020

मैजिस्ट्रेट

यह कहानी तबकी है जब सरसों तेल 6 रुपये किलो और शुद्ध घी 35 रुपये किलो मिलता था। यह उस समय की कहानी है जब 2 किलो चीनी और 1 लिटर किरासन तेल के लिए घंटों राशन दुकान की लाइन में लगना पड़ता था। यह कहानी 1980 के दशक के शुरुआती वर्षों की है जब मध्यम वर्ग के लिए स्कूटर और इंग्लिश मीडियम स्कूल स्टेटस सिम्बल हुआ करता था। यह कहानी रांची कारखाने के टाउनशिप की है जहां 1500 रुपये पाने वाले इंजीनियर को 50 रुपये में 3 रूम का फ्लॅट मिलता था और बिजली का बिल मात्र 10 रुपये आता था। सबसे बढ़िया तो निशुल्क चिकित्सा थी।

मेरे बगलगीर एक बंगाली महाशय थे। रांची शहर में उनका विशाल पुश्तैनी मकान था। इस कारण उनका फ्लॅट हमेशा किराए पर रहता था। फ्लॅट मय बिजली और पानी के मात्र 100 रुपये में। उनकी शर्तें बहुत ही तर्कसंगत थीं। किरायेदार भला मानुस, ट्रांसफरेबल सरकारी नौकरीयाफ़्ता हो। अबतक उनके फ्लॅट में केन्द्रीय स्कूल के शिक्षक ही रहते आए थे । इस बार एक मैजिस्ट्रेट आए। मेरे बगलगीर के पिता भी रिटायर्ड सिविल जज थे – उनकी सिफ़ारिश पर।

सत्यप्रिय और उनका परिवार बहुत ही मिलनसार था। मेरे 3 बच्चे उनके भी। मेरे भी 2 लड़कियां उनकी भी। सोच-विचार, रहन-सहन बहुत कुछ मिलता था- यहाँ तक की वेतन भी। सत्यप्रिय जी को मेरे साथ बैठकी बहुत रास आती थी। उन्हें भी क्लैसिक किताबों, पाश्चात्य संगीत और स्वादिष्ट भोजनों में रुचि थी। फर्क एक अवशय था । कारखाने के इंजीनियर के भ्रष्ट होने की गुंजाईश ना के बराबर थी। सत्यप्रिय जैसे मैजिस्ट्रेट को ईमानदार रहने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ती थी। उससे भी ज्यादा उन्हे ईमानदार दिखाये देने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती थी – अपने मातहतों से, अपनी बीबी-बच्चों से और मौजूदा न्यायायिक प्रणाली से। सबसे तो वे निपट सकते थी पर अपने बीबी-बच्चों से सामजस्य बैठाना बहुत टेढ़ी खीर थी।

टाउनशिप में 2 केन्द्रीय विद्यालय थे। वहाँ सत्यप्रिय के बच्चों का दाखिले आसानी से हो जाता। पर सोसाइटी के सब बच्चे इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ते थे। मेरे बच्चे भी रंग-बिरंगी यूनिफ़ॉर्म पहन कारखाने की बस से स्कूल जाते और बेवजह खेलते समय भी इंग्लिश में बातें करते। 1 महिना तो निर्णय लेने में लग गया। आखिरकार सत्यप्रिय ने अपनी मजबूरी मुझे बताई। वे चाहते थे की उनकी बड़ी बेटी का दाखिला कान्वेंट में हो जाये। इसके लिए वे 15 दिनों से अपनी बेटी से सिर्फ इंग्लिश में ही बातें कर रहे थे।

कान्वेंट का सत्र आरंभ हो चुका था। मैं उन्हे और उनकी बेटी को अपने स्कूटर में बैठाकर कान्वेंट ले गया। 11 किलोमीटर दूर था। बिटिया का इंग्लिश उच्चारण बहुत ही अच्छा था। एड्मिशन हो गया। उस समय केन्द्रीय विद्यालय की फीस मात्र 1 रुपये हुआ करती थी। कान्वेंट की फीस 60 रुपये थी। लौटते समय 2 जोड़ी यूनिफ़ॉर्म और जूते खरीदने में 500 रुपये हलकान हो गए। हमलोगों को प्रति बच्चे बस का मासिक किराया 10 रुपये देना पड़ता था। सत्यप्रिय को कार्पोरेशन की बस की इजाजत तो मिल गई पर वहाँ भी उन्हें 50 रुपये मासिक भाड़ा देना पड़ा। उनके चेहरे पर दर्दीली मुस्कुराहट मुझसे देखी नहीं जाती थी।

उनके घर कोर्ट से दिया एक नौकर 24 घंटे रहता। साथ ही सुबह-सुबह फ़ाइल लेने-लेजाने के लिए साइकल से एक चपरासी आता। सत्यप्रिय ने अपनी छोटी बेटी को पास के मोंटेसरी में दाखिला करवा दिया था। जब सब कोई जा चुके होते तो घर का काम-काज निबटा कर उनकी श्रीमती अपने गोद वाले बच्चे को लेकर मेरे घर आ जाती। कभी नौकर भेजकर मेरी श्रीमती को बुलवा भेजती। जो भी अच्छा बना होता वह एक दूसरे सांझा करते। शाम के समय सत्यप्रिय को मेरे साथ घूमना अच्छा लगता। उस समय हमलोग हर तरह की बातें करते- हर तरह की। हम दोनों को टहलते देख कोई भी समझ लेता की एक सरकारी अधिकारी है तो दूसरा इंजीनियर। सत्यप्रिय अपने पहनावे और रख-रखाव पर लेशमात्र भी कमी नहीं होने देते। बाल सँवरे हुए, फुलशर्ट और फुललपैंट पूरी क्रीज के साथ, जूता चमकता हुआ और आंखे स्थिर, दूर दृष्टि वाली।

कुछ दिनों से वे मेरे स्कूटर को आते-जाते निहारते रहते थे। मैं भाँप गया। पूछने पर मालूम हुआ की वह कचहरी दो किश्तों में आते जाते हैं। टाउनशिप से काली मंदिर, मेन रोड तक बस से तथा स्टेटस की खातिर वहाँ से कचहरी तक रिक्शे से। कुल मिलाकर एक दिन का 5 रुपया और महीने का 130 रुपया खर्च हो जाता है। मैंने उन्हें सुझाव दिया की इतने की EMI में तो स्कूटर आ जाएगा। उन्हें यह बात भा गई। बैंक से लोन लेकर उन्होने एक लेंबबरेटा स्कूटर ले लिया। एक हफ्ते में वे परिवार सहित पूरी रांची घूम आए। अपने सहयोगियों के घर भी हो आए। एक महीना आनन-फानन में बीत गया।

बेटी की पढ़ाई और स्कूटर के पेट्रोल के खर्च से उनका तलवार की धार पर चलने वाला बजट बुरी तरह बिगड़ने लगा। उनकी श्रीमती साहसी और समझदार थीं। वे चपरासी से कचहरी के पास आढ़त से रसद और सब्जी मंगाने लगीं। कहती उधर आधे दाम में मिल जाता था। गाँव से चावल आने लगा। बनिए का उधार होने लगा। मुश्किल तब होती थी जब कोई बाहरी मेहमान आ जाता अथवा गाहे-बगाहे कोई नया खर्च मंडराने लगता – मसलन बीमारी, बेटी के स्कूल का फंकशन और उसके लिए नए लिबास, अथवा कॉलेज में पढ़ते छोटे भाइयों की जरूरतें। कभी-कभी आपतस्थिति में मेरे परिवार से प्रगाढ़ता काम आती। हमलोगों को सत्यप्रिय जैसे ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ सरकारी अधिकारी सहायता करने में बहुत खुशी होती।

एक दिन मैं कचहरी के पास किसी काम से गया। ईच्छा हुई सत्यप्रिय जी का कोर्ट देखा जाए। वकील से मार्गदर्शन लिया। पेशकार सामने के दरवाजे के पास खड़ा था। वह मुझे पहचानता था। मैं चुपके से पिछले दरवाजे से उनके कोर्ट में आकर कोने की एक कुर्सी पर बैठ गया। पेशकार बुरी तरह व्यस्त था। वह वकीलों और दूसरों से कागज लेता, फ़ाइल के अंबार में कुछ खोजता और उसी पुर्जे में शायद तारीख लिख कर दे देता। हाथ मे छिपकर दी गई राशि को देखता और फ़ाइल ऊपर-नीचे कर देता। इससे ज्यादा मुझे कुछ समझ नहीं आया।

मैजिस्ट्रेट सत्यप्रिय बगल के कमरे से दाखिल हुए। सन्नाटा छा गया। 15 मिनटों में उन्होने दो जिरह और कई केस पर अपना निर्णय सुनाया। ज़्यादातर तारीख बढ़ाने का मामला दिखा। जिनकी तारीख बढ़ती वे पेशकार के पास जाते। एक बात तो तय थी। सत्यप्रिय बहुत अच्छी इंग्लिश बोलते थे और कोर्ट में उनका बहुत आदर था।

शाम को मैंने उन्हे बताया। उन्हे अपनी तारीफ बहुत अच्छी लग रही थी। हो भी क्यों न ! एक ईमानदार, जानकार और कर्तव्यनिष्ठ मैजिस्ट्रेट के लिए इससे ज्यादा आकर्षक बोनस और क्या हो सकता था।

देखते-देखते 3 वर्ष बीत गए। उनका तबदला हो गया। जैसा होता है बिछड़ने पर। मर्दों की आँखें गीली हुई। औरतें खूब रोयी। कुछ ऑफिस के फ़र्निचर थे। उसे मेरे पास रखवा, फ्लॅट को ताला लगा, उनका परिवार विदा हो गया।

अगले दिन वही चपरासी आया फ़र्निचर लेने। कायदे से हमलोगों ने उसे चाय व नाश्ता कराया। बातें भी हुई। वह सत्यप्रिय का गुणगान करते नहीं थक रहा था विशेषकर ईमानदारी की बारे में। मैंने चपरासी बाटाया की वह जो सब्जी और राशन लाता था उससे उनको बहुत मदद हो जाती थी। मैंने उससे आढ़त और दुकान का पता पूछा जिससे की मैं भी कभी-कभार व्होलसेल ले सकूँ।

चपरासी थोड़ा उदास हो गया। सब्जी और राशन सस्ता जरूर मिलता था पर उतना भी नहीं। हमलोग कोर्ट के स्टाफ सामान को मालकिन के बजट के लायक सस्ता कर देते थे।

Thursday, 26 March 2020

आसमान की सैर - भाग 2


अब आगे की कहानी ----

रौशनी, कुसुम और रोहित को मानो काठ मार गया हो । न जाने कितनी देर उधर ही एकटक देखते रहे जिधर किट्टू बह कर गया था । तन्द्रा तब टूटी जब मोहित ने पूछा – “दीदी ! किट्टू डूब गया ? किट्टू मर जाएगा ?” । उसके बाद दोनों बहने चिल्ला-चिल्ला कर रोने लगी । रोहित भी रोने लगा । अन्दर से माँ दौड़ते हुए आयी और रोने का कारण पूछा । किसी तरह रौशनी ने बताया । उस दिन तीनो रोते-सुबकते सो गए । मोहित को तो लगता था की किट्टू बचकर आ जाएगा । वह तो एक-दो बार बाहर झाँक भी आया । तीनों बिना खाए-पिए सो गए ।

बच्चों को हरदम ऐसा लगता की किट्टू बचकर आ जायेगा किसी भी क्षण । माँ-पिताजी ने कई बार उन्हें समझाने का प्रयत्न किया । उन्हें किट्टू की बहन रेक्सी भी लिवा लाने का सुझाव दिया । परन्तु उन्हें तो किट्टू चाहिए था, सिर्फ और सिर्फ किट्टू । इसी तरह उदास रहते और इन्तजार करते महीना बीत गया । हर रोज सुबह, आँख खुलते ही, बच्चे बरामदे पर आ जाते, किट्टू की आस में ।

किट्टू डूबा नहीं था । एक तो वह बिलकुल हल्का था और दूसरे उसे डूबते को तिनके का सहारा मिल गया था । उसे एक पेड़ की मोटी डाल मिल गयी थी । पानी का बहाव इतना तेज था कि वह थोड़े ही समय में मीलों दूर निकल गया । वह डूबते-उतराते मालूम नहीं कब सो गया या बेहोश हो गया उसे पता नहीं । सुबह उसने अपने को नदी के किनारे हंसों के झुण्ड के बीच पाया । हंस उस समय पानी में चोंच डुबाकर मछलियाँ पकड़ रहे थे । वे उन मछलियों को चोंच में दबाकर लाते और झुरमुट में पल रहे अपने बच्चों को निवाला बनाकर खिलाते । किट्टू को यह सब देखकर जोरों की भूख लग आयी । वह हिम्मत कर हंसों के झुण्ड के काफी नजदीक आ गया । किट्टू इतना छोटा था की हंसों को एकदम डर नहीं लगा । हंसों को मामला समझते देर नहीं लगी । वे सब किट्टू को भी खाने के लिए मछलियाँ परोसने लगे ।

किट्टू से एक बड़े हंस ने इशारे से पूछा की वह यहाँ आबादी से इतनी दूर कैसे आया । किट्टू ने भी इशारे-इशारे में लगभग सभी कुछ बता दिया । हंसों ने किट्टू को उनके पीछे-पीछे चलने को कहा । उनलोगों ने अपने घोसले के पास चट्टानों के बीच एक कन्दरा में छुपकर रहने को कहा । शाम ढलते जंगली सियार और कभी-कभी शेर-बाघ भी पानी पीने आते थे । सियार तो हंसों के अंडे-बच्चे खाने का भी इरादा रखते थे । हंसों का झुण्ड एकजुट होकर अपनी और अपने अंडे-बच्चों की रखवाली करते थे ।

शाम ढलते सभी हंस आपस में सलाह करने लगे कि किट्टू को उसके घर कैसे पहुंचाया जाये । उन्हें घर का पता भी नहीं मालूम था और ये भी नहीं की वह कितनी दूर है । बस उन्हें इतना मालूम था की किट्टू पश्चिम से पूरब की तरफ बह कर आया था । पश्चिम का सबसे नजदीकी गाँव 10 मील दूर था । हकीकत में किट्टू का घर उससे भी दूर शहर से सटे हुए गाँव में था । हंसों को कोई ऐसी तरकीब नजर नहीं आ रही थी जिससे किट्टू को सकुशल गाँव तक पहुँचाया जा सके । किट्टू को पैदल जाना पड़ता और हंस उड़ते हुए उसकी रखवाली करते । उसपर घर तलाश करना जोखिम से भरपूर था । पूरा रास्ता कम से कम एक-दो दिन में पूरा होता इसमें हादसा होने की बहुत गुंजाईश थी । जानवरों और पक्षियों से तो बचाया जा सकता था । मनुष्यों से बचाना बहुत मुश्किल था । शरारती बच्चों को कुत्तों पर पत्थर मारना अच्चा लगता था । कुछ मनुष्य तो कुत्ते को भी मार कर खा लेते थे । बहुत रात ढले ये निर्णय लिया गया की हंसों के मुखिया बुजुर्ग राजू काका से अगली सुबह सलाह ली जाए । वे नदी के उस पार रहते थे । उनके पास बहुत अनुभव था । वे कभी किसी को निराश नहीं करते थे ।

अगली सुबह सब बातें सुनने के बाद राजू काका ने बहुत सोच कर बताया । बहुत वर्ष पहले उनलोगों ने भी एक कछुए को सूखे तालाब से दूर नदी में बसने के लिए एक तरकीब लगाई थी । दो हंसों ने एक मजबूत डंडी का दोनों किनारा चोंच में पकड़ लिया था । कछुए ने डंडी को बीचो-बीच मुंह से पकड़ लिया था । कछुए को सख्त हिदायत दी गयी थी । वह उड़ते वक्त अपना मुंह कदापि नहीं खोलेगा । ऐसा करने से वह बहुत ऊचाई से नीचे गिर कर मर जाएगा । राहगीरों ने आकाश में डंडी से झूलते कछुए को देखा तो वह तरह-तरह के मजाक करने लगे । कछुए से रहा न गया । उसने मुंह खोल ही दिया । कछुए की दर्दनाक मौत हो गयी । राजू काका ने सोच-समझ कर ऐसी योजना बनायी जिसमें हादसा होने की कोई गुंजाईश नहीं थी । किट्टू को नदी किनारे बहते पॉलिथीन के थैले में रखा जय और उसका हत्था डंडी में फंसा दिया जाए । हंस डंडी का दोनों किनारा चोंच में दबाकर उड़ेंगे ।

इसी दौरान एक बहुत सुखद घटना हुई । नैना-मैना किट्टू को खोजते हंसो के झुरमुट के पास पहुँच गयी । सुबह के समय हंस मछली पकड़ रहे थे । किट्टू भी उनके साथ जलपान कर रहा था । मैना किट्टू को देखते ही चिल्लाई-“किट्टू ! किट्टू ऊ ऊ ऊ !” कित्तौ चिल्लाया-"नैना !" उस के बाद किट्टू और हंसों का नाचना और झूमना देखने लायक था । मैना ने किट्टू को घर का सभी हाल बताया । किट्टू के आँखों से आंसूं निकल आये । अब किट्टू किसी भी तरह अपने गाम जल्द से जल्द पहुँचना चाहता था ।

सभी कुछ योजनाबद्ध सुरक्षित तरीके से हुआ । सुबह की रात का समय चुना गया। मैना आगे, उसके पीछे किट्टू का यान , उसके पीछे तीर की शक्ल में 15 हंस । ठीक सुबह चार बजे किट्टू को फार्म के बगीचे में उतारा गया । पूरा इलाका सो रहा था । किसी मनुष्य ने यह उड़ान ना तो देखी और न उन्हें हल्ला करने का मौक़ा मिला । किट्टू उतरते ही कभी दौड़कर घर के दरवाजे तक जाता और कभी धन्यवाद देने हंसों के पास आता । हंसों ने किट्टू को मुंह में दबाई हुई मछली और कमल के फूल दिए । उनलोगों ने हमेशा मिलते रहने का वादा किया । पलक झपकते हंसों का काफिला रात के अन्धकार में आकाश में खो गया ।

सबसे पहले रौशनी को किट्टू के भूँकने और दरवाजा खरोचने की आवाज सुनायी दी । उसे लगा वह फिर रोहित की तरह सपना देख रही है । तभी बॉबी मैना ने कुहुंक लगाई- “देखो देखो किट्टू आया है ।” इसे तीनो बच्चों ने सुना और माँ-पिताजी ने भी । सभी दरवाजा खोलने दौड़ पड़े । पिताजी ने दरवाजा खोला । किसी को विश्वास नहीं हो रहा था । उस सुबह माँ-पिताजी ने बच्चों को बिस्तर पर किट्टू के बैठने और लाड-प्यार पर कोई ऐतराज नहीं किया ।

सुबह बच्चे स्कूल नहीं गए । बगीचे में किट्टू को तरह-तरह के स्नैक्स खिलाते रहे और खेलते रहे । किट्टू बार-बार उन्हें वह डंडी और और उससे बंधे थैले के पास ले जाता और आकाश की ओर दिखाता । नैना मैना भी टूटी-फूटी पर बहुत ही मधुर आवाज में कुछ बोलती । जो हुआ वह बिलकुल अकल्पनीय और अविश्वनीय था । कोई कैसे समझता ।

दूसरी सुबह अखबारों में यह प्रकाशित हुआ । 6 माह का पोमेरेनियन किट्टू कैसे बाढ़ की उफनती नदी में बहता हुआ दूर तक निकल गया और मीलों का सफ़र एक महीने में पूरा कर रौशनी, कुसुम और रोहित की महक पकड़ता हुआ घर तक पहुँच गया । किट्टू की बच्चों के साथ तस्वीर भी छपी थी । बहुत दिनों तक लोग किट्टू को देखने आते रहते थे ।

इस घटना को पांच वर्ष गुजर गए । आजकल किट्टू क्रिकेट में अंपायरिंग भी करने लगा है । काला हैट और हरा चश्मा लगाकर बिकुल ललनटॉप लगता है ।








Wednesday, 25 December 2019

The Garden of Uncle Ghosh



Today, after a long interval, Ghosh aunty came to our house. In white saree, she looked more serene and divine. After the demise of Ghosh uncle, she mostly, kept herself closed in-house. She told my mother- Today is Babu’s anniversary. I have arranged a small “puja” and “havan”. Please do come.” While returning, she handed over a paper bag full of guavas and said – “After Babu left us, children have stopped altogether coming to play on guava trees.”  Ghosh aunty was carrying several paper bags full of guavas.
House of Ghosh family was third to our left. His only son came once or twice in a year. He was employed somewhere else. Ghosh uncle was expert in playing Bridge. As such he was anxiously awaited by my father and his colleagues in the evening. He must be over 70 years but for his companionship with father, we used to call him uncle. He was very fond of gardening. People from distant places came to his house to see variety of high quality roses. The fragrance of roses used to permeate entire locality. However, the star attraction of neighborhood children was 4 guava trees that bore fruits all through the year. These trees became highly benevolent during the summer season. Laden with fruits and bent with the load, it seemed as if they were tempting, bewitching and inviting the children.
With the advent of summer, we had morning schools. We came back by 1 in the afternoon. At the height of summer, schools had summer holidays for around 45 days. When elders chose to have a siesta in the hot summer afternoon, we children had a field day. We used to gather preferably at a deserted house. There was no dearth of games to play – pitto, hide and seek, lattu, daal-paat were a few to name. On getting tired, there was “antakshni”. When we became hungry, there were guava tress but with a tag – the terror of Ghosh uncle.
Ghosh uncle was tall, heavily built and ivory black. Anybody would get terrorized if he suddenly came across in the darkness of night. The worst part for the children was that he was a retired headmaster. His one stare was enough to frighten and dumb-found children. He had a loud and commanding voice. When he used to call his servant; the voice was heard at the distant roundabout. Therefore, before attempting a conquest, it was imperative to be totally sure that Ghosh uncle was absent or was in deep slumber. Ghosh uncle, himself used to make such announcement through his loud snoring. 3 PM in the afternoon was the best time for invasion.
A minor problem was opening of the Iron Gate. Without oiling for long, the hinges made warning screeching noise. It was easier and noiseless to cross over the 5 feet tall boundary wall. But, here again, a slight miscalculation incurred bruises on the thighs and elbows. Most of the times, there used to be a gang of 5 or more children- a mixture of boys, girls and one or two preschooler of 5-6 years. Generally, girls used to peep from their windows and wait to be included for the invasion. Girls are very fond of unripe guavas. Very stealthily, we used to cross over the walls and climb the trees. We stuffed our pockets and thereafter made bags of the hanging portion of respective shirts or frocks. Finally, we used to sit comfortably on the branches and eat to our tummy full. Here a little complacence coupled with slight mistake, such as gossiping, a quarrel or a slip and fall from the branches triggered awakening of Ghosh uncle.

First reaction of Ghosh uncle was to shout before arising from the bed. His big body, loose dhoti and bolts on the door used to give us ample time to disappear with the bounty. Once, it so happened that the loud yelling of Ghosh uncle made 5 years old Rohit immobile. He remained glued to one of the top branches in the crown. He was a new entrant in the gang.  It was a miracle that he was missed by the line of sight of Ghosh uncle as he was targeting the gate and the road to identify the fleeing miscreants. When, after about half an hour, everything became quiet, we helped Rohit to cross over the wall.
Once, we made a great mistake. Only respite was that we were only two kids atop the guava trees munching and pocketing fruits. Suddenly, we heard the screeching opening sound of the gate. We held our breath and movement. Ghosh uncle closed the gate, folded his umbrella, dropped down his cigarette, crushed the same beneath his feet, looked around the campus and proceeded towards the few stairs leading to the verandah and the door.
God only knows, he never complained about us even when sitting for hours together on the Bridge table with our parents. God must be knowing that after his demise why we never tried to steal guavas even though they kept ripening and dropping to the ground. May be we felt his presence – presence of his soul with big red-shot eyes guarding the garden or else thrill and adventure were missing.
I accompanied Ghosh aunty to the gate and repented to her – “Aunty! We were irritating and annoying uncle very much.” Ghosh aunty took me to her arms and said smiling with moistened eyes – “No son! Rather he used to take immense pleasure. He knew all of you by names and gait. He used to wait for kids. What do you think? For whom, he had planted 4 guava trees?”


Friday, 22 March 2019

शेरु मेरु की शानदार कहानी !


सूरजवन दो बड़े शहरों के बीच एक खूब घना जंगल था । उत्तर के तरफ पहाड़ों की लंबी तराई और दक्षिण मे नदी सूरजवन की रक्षा करती थी । आज सूरजवन मे बहुत चहल-पहल थी। कारण था शेरनी रानी ने महीने पहले दो खूबसूरत शावकों को जन्म दिया था। आज दोनों शावकों का नामकरण होना था । शेर राजा ने पूरे जंगल को दावत दे डाली थी। सेनापति हाथी राठौर के लिए पड़ोस के जंगल से सिंगापूरी केलों का 10 हौद मंगाया गया था। भालू मंत्री के लिए श्हद से भरा दो घड़ा आया था। सभी के पसंद के मुताबिक भोज मे इंतजाम था।
जश्न के बीच, बंदर पंडित के सामने दोनों शावकों को लाया गया। दोनों बहुत खूबसूरत, पर एकदम एक जैसी शक्ल-सूरत। कभी-कभी तो उनकी माँ भी धोखा खा जाती थी। एक का नाम शेरु रखा गया क्योंकि वह मिजाज से बहुत निडर और तेज-तर्रार था। दूसरे का नाम मेरु रखा गया । मेरु बहुत शरारती और खिलाड़ी स्वभाव का था। दोनों बहुत तेज थे। दो दिन मे उन्हे अपने नाम का ज्ञान हो गया। दोनों बहुत तरह के खेल खेला करते। जब लौटने का समय होता तो दोनों एक दूसरे को आवाज लगते। आवाज भी एक खास किस्म की – याहू ! याहू ! दोनों संग-संग घर लौटते।
शेरु और मेरु को माँ के साथ खेलना बहुत अच्छा लगता था। पिता से उन्हे डर लगता था। कभी-कभी खेलते-खेलते वे सड़क की ओर निकल जाया करते थे। इस बात से माँ बहुत डरती थी। एक दिन माँ उन दोनों को लेकर सड़क के पास के झुरमुठ मे छिपकर बैठ गई। सड़क पर छोटी-बड़ी सभी तरह की गाड़िया दौड़ रही थी। माँ ने सबकी पहचान कराई। पहले तो शेरु-मेरु गाड़ियों को भी किसी तरह का भयानक जानवर समझ बैठे थे। माँ ने बताया की इनमे दुनिया का सबसे भयानक जानवर सवारी करता है जिसे इंसान कहते हैं। तभी एक मोटर कार रुकी ।  उसमें से एक आदमी निकला। कार का मुंह खोलकर उसे पानी पिलाया। कार के जाने के बाद शेरु-मेरु हंसने लगे। इतना छोटा जानवर जिसके न लंबे दाँत हैं और न नुकीले नाखून। दो पैरों से चलने वाला क्या खतरनाक भी हो सकता है। लौटते  समय माँ ने इंसान के बारे मे बहुत कुछ बताया। खासकर उसकी बंदूक और भाले  के बारे मे बताया। यह भी बताया की उनके चाचा को इन्सानों ने कैसे घेरकर बंदूक का निशाना बनाया था।
बहुत दिनों तक शेरु-मेरु सड़क की तरफ नहीं गए। पर होनी को कोई कैसे टाल सकता है। एक शाम दोनों आस-पास खेल रहे थे। मालूम नहीं शेरु कहाँ छिप गया था। खोजते-खोजते मेरु सड़क की तरफ निकल आया। अंधेरा होने को आ रहा था। पूरी सड़क वीरान थी। अचानक मेरु को लगा की सड़क के उस पर झड़ियों मे कोई छिपा है। शेरु को पकड़ने के रोमांच मे वह सड़क पार करने लगा। तभी सड़क पर एक मोटर कार आने लगी। कार की दोनों आंखे भयंकर चमक रही थी। मेरु की आंखे चौधियाँ गई। वह अंधा सा हो गया और सड़क पर बैठ गया । मोटर कार ठीक उसके सामने चिंघारते हुए रूकी। उसमें से एक आदमी निकला। उसने मेरु के ऊपर एक भारी कपड़ा डाल दिया । मेरु को उस कपड़े मे लपेट कर कार की डिक्की खोल उसमें बंद कर दिया। देखते-देखते कार आँखों से ओझल हो गई। शेरु अबतक छिपा हुआ सबकुछ देख रहा था। वह कार के पीछे दौड़ा भी । कार की रफ्तार को वह पकड़ नहीं पाया।
शेरु हाफ़ता हुआ माँ के पास गुफा मे पहुंचा। माँ तो ऐसे ही अंधेरा हो जाने के कारण व्याकुल इंतजार कर रही थी।मेरु को न देख व्हा बहुत घबरा गई। शेरु ने सब बात बताई। यह भी बताया की कैसे मेरु को गाड़ी के मुंह मे डाला गया था। शेर राजा और शेरनी रानी रात भर सड़क के किनारे बैठे मेरु की बाट जोहते रहे। अंत मे  सबेरा होने पर हाथी सेनापति और भालू मंत्री उन्हे बीहड़ मे लौटा लाये। सभी पक्षियों को चारों दिशाओं मे मेरु का पता लगाने के लिए भेजा गया। स्वयम बंदर पंडित अपने शिष्यों के साथ छिपते-छिपाते उस शहर गए जिधर कार गई थी। इतने बड़े शहर मे मेरु को खोज निकालना सूई के समान था। शेरनी माँ हर सुबह सड़क के किनारे आ बैठती। अंधेरा होने पर लौटती। दोनों माँ-बाप खाना-पीना भूल गए थे। उनके दुख को कोई भी कम नहीं कर पाता था । मेरु के दुख मे दोनों बीमार रहने लगे। वर्ष भर के अंदर दोनों की मृत्यु हो गई।
मेरु कार की डिक्की के अंधेरे मे बहुत देर पड़ा रहा। कार के हिचकोलो से उसे नींद आ गई। जब आँख खुली तो उस्न अपने को एक बड़ी गुफा मे पाया। वह गुफा नहीं थी । वह कार का गैरेज था। उसका पैर एक खूँटे से चैन कर दिया गया था। उसके सामने दूध से भरा कटोरा रख दिया गया था। पहले तो वह बहुत चीखा-चिल्लाया-गुर्राया पर अंत मे थक-हार कर शांत होकर बैठ गया। उसका गला सूख गया था। उसे बड़े ज़ोरों की भूख लग गई थी। बहुत सहमते उसने दूध के कटोरे मे मुंह लगाया। दूध अच्छा था। उसने एक सांस मे कटोरा खाली कर दिया। देखते-देखते, सप्ताह बीत गया। अब उसे मांस के टुकड़े भी खाने को मिलते थे। शाम के समय गैरेज का दरवाजा खोल दिया जाता था। भीड़ उमड़ पड़ती थी उसे देखने के लिए। बच्चे बड़े बूढ़े सभी आते थे। खूब फोटो खींची जाती थी। शुरू मे मेरु चमकारे से डरता  था। बाद मे उसे आदत हो गई।
एक दिन गैरेज के पास एक वैन आकर खड़ी हुई। वैन मे आए अजनबी उसके पास आने की कोशिश करने लगे। मेरु गुर्रा कर और पंजे दिखाकर उन्हे पास आने से रोकता रहा। तभी उसके गले मे कुछ चुभता हुआ सा लगा। मेरु को डार्ट से बेहोश कर दिया गया था। इस बार जब वह नींद से जागा तो उसने अपने को तरह-तरह के जानवरों के बीच पाया। कोई पेड़ नहीं, कोई झाड़ी नहीं, कोई जंगल नहीं। हाथी और ऊंट को छोड़कर सभी जानवर पिंजरे मे बंद थे। 10 से ज्यादा तो बड़े-बड़े शेर रहे होंगे। भालू भी था, बंदर भी थे और एक भयंकर बनमानुस भी था। तोता-मैना अपनी भाषा कम आदमी की भाषा ज्यादा बोलते थे। उसे देश के एक बड़े सर्कस कंपनी मे लाया गया था।
बहुत दिनों तक तो उसे पिंजरे मे रख सर्कस मे होती ट्रेनिंग दिखते रहे। एक महीने बाद उसे भी सर्कस के रिहर्सल मे रखा जाने लगा। उसे भी उठना –बैठना , आने-जाने-खाने –पीने की ट्रेनिंग दी जाने लगी। उसे की-वर्ड याद कराया जाने लगा। एक महीने बाद ट्रेनिंग कठिन होने लगी। कुर्सी पर बैठना, रिंग के अंदर से छ्लंग लगाना, और ऊंचे बार पर चलना सिखया जाने लगा। उसे ये सब ट्रेनिंग बहुत अच्छी लगती थी। मेरु कुछ ही दिन मे सबकुछ ठीक से कर रिंग मास्टर को खुश कर देता था।
एक सुबह, रिंग मास्टर उसके पास आकर बहुत प्यार करने लगा । उसे खाने के लिए स्वादिष्ट हड्डी भी मिली। उसके बाद रिंग मास्टर मेरु को प्रैक्टिस के लिए अखाड़े के अंदर ले गया। बीचोबीच 4 फूट की ऊंचाई पर रिंग लटकाई गई। उसके बाद उस रिंग पर रस्सी लपेटी गई। मेरु को कई बार उसके अंदर से छलांग लगाने का इशारा किया गया। एक बार भी गलती नहीं हुई। सभी लोग ताली बजाने लगे। उसके बाद वह हुआ जो उसने कभी न सुना था और न देखा था। पर देखते ही एक शेर होने के बावजूद वह बहुत भयभीत हो गया। रिंग से आग की लपट निकल रही थी। जानवर , खासकर रोये वाले जानवर जन्मजात सबसे ज्यादा आग से भयभीत होते हैं। उस दिन उसे दो बार करेंट वाले कोड़े से मारा गया। सभी जानवर अपने पिंजरे से यह सब देख रहे थे। कोड़े की आवाज सुनकर बंदर चीखने लगे, शेर गुर्राने लगे , बनमानुस और भालू अपना सीना पीटने लगे। एक शेर के बच्चे को कोड़े से मारना उन्हे बहुत बुरा लगा था।
मेरु को कैद मे रखा गया। उसे भूखा रखा गया। उसे डराया गया। उसे मारा गया। उसे दुलार भी किया गया। आखिरकार, मेरु ने एक दिन आग की लपटों से घिरे रिंग के बीच से छलांग लगा ही दी। उस दिन रिंग मास्टर से लेकर, सर्कस के सभी खिलाड़ी, यहाँ तक की पिंजरे मे बंद जानवरों मे खुशी की लहर दौड़ गई। सभी को उनके लायक भोज सामग्री दी गई।
देखते-देखते ३ वर्ष बीत गए। मेरु अब एक सजीला जवान हो गया था। उसके करतब, खासकर, जलते रिंग की छलांग और लंबी ऊंची रस्सी पर चलना  देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती थी। मेरु का खेल सर्कस का शो-स्टोपर हुआ करता था दो जलती रिंग के अंदर से छलांग लगाना।। मेरु अपने भाई और माता-पिता को एक क्षण के लिए भी नहीं भूला था। जब कभी वह बहुत उदास हो जाता तो उसे भालू अपने से सटाकर बैठा लेता। मेरु कितनी बार नींद मे सपने से चौक उठता था। उसे बस यही सपना आता था की शेरु उसकी तेज रफ्तार कार के पीछे दौड़ता हुआ ओझल होता जा रहा है। उसे हमेशा सूरजवन की याद आती रहती थी। है। उसे हमेशा माता-पिता की याद आती रहती थी। बस उसे यह समझ मे नहीं आ रहा था कि किस तरह पिंजरे और सर्कस से आजादी मिले और वह भाग कर अपने माता-पिता और भाई शेरु के पास पहुँच जाये।
३ वर्षों मे शेरु बहुत सजीला, गठीला और फुरतीला पर खूंखार शेर बन चुका था । खूंखार बनाने के बहुत कारण थे। मेरु का लापता होना सभी के लिए बहुत दुखदायी था ।शेरु-मेरु की मान तो मेरु के इंतजार मे रोते-रोते मर गई। उनके पिता जो सुबह-शाम मेरु को खोजने काली सड़क के तरफ जाते थे, एक दिन गोली के शिकार हो गए। शेरु स्वयम बिना भाई के अकेला रहने से चिड़चिड़ा हो गया। माँ-बाप की अकाल मृत्यु और मेरु से बिछड़ना , शेरु को खूंखार बनाते चल गए।
शेरु को सूरजवन का राजा बनाया गया । उसे क्रोध बहुत जल्द आता था। इस कार्न, सभी जानवर उससे दूरी बनाए रखते थे। अब महीने मे एक-आध बार ही सूरजवन मे सभा हुआ करती थी। जानवर मात्र समाचार का आदान-प्रदान करते थे। कोई शिकवा-शिकायत नहीं। उन्हे पता था की इंसाफ मे किसी न किसी को मृत्यु दंड अवश्य मिलेगा। शेरु शिकार करने और भोजन करने अपने माँ-बाप की तरह दूसरे जंगल जाया करता था। वह भी अपने वन के जानवरों को अपने परिवार का सदस्य मानता था। पर क्रोध में वह दोषी को अपने हाथों से मृत्यु दंड देता था।
शेरु अभी भी सड़क की तरफ जाता था। वह घंटों सड़क के किनारे झाड़ियों मे छिपकर बैठा रहता। उसे उम्मीद थी की एक दिन मेरु अवश्य वापिस आएगा। वह एक बार सड़क के किनारे-किनारे उस तरफ बहुत दूर तक चलाया गया था जिधर गाड़ीवाले उसे उठाकर ले गए थे।
मेरु सर्कस के कारवां के साथ शहर- शहर जाता रहा। जब कभी कारवां किसी जंगल के बीच से गुजरता रहता मेरु आवाजें सुनने-समझने और महक पहचानने की भरसक कोशिश करता।
एक वर्ष बहुत बारिश हुई। एक तरफ नदी का चढ़ता पानी और दूसरी तरफ पहाड़ियों से गिरता पानी शहर में बहुत भयानक बाढ़ ले आया। लोग-बाग सामान-असबाब लेकर ऊंची जगहों पर जाने लगे। मवेशी और अन्य जानवर भी अपनी जान बचाने की भरसक कोशिश कर रहे थे। कुछ तो द्दोब गए और कुछ पहाड़ियों पर सुरक्शित जगहों पर चले गए। उसी समय सर्कस कंपनी भी उसी शहर में तम्बू गाड़े खेल दिखा रही थी। वे ऐसी भंयकर बाढ़ में भरी-भरकम लश्कर और जानवरों के साथ भागे तो कहाँ भांगे । बढ़वासी में उन्होने जो कुछ बन्न्ध पाये उसे लेकर पहाड़ियों पर भाग गए। जानवरों को मजबूरन पिजरे से खोलना पड़ा। क्या नजारा था ? हाथी और ऊंट के ऊपर सवारी करते भालू, बंदर और शेर। सभी बहते-बचते पहाड़ी की ओर निकल पड़े।
तभी मेरु को अपने जंगल की गंध आई। वह व्याकुल हो गया। वह एक हाथी के ऊपर बैठा हुआ बाढ़ को पार कर रहा था। उससे रहा न गया। उसने बेतहाशा  एक पेड़ की टहनी पकड़ पेड़ पर चढ़ गया। पेड़ की फुनगी पर बैठ वह भूखे-प्यासे दिन-रात बाढ़ के पानी के उतरने का इंतजार करने लगा। ४ दिनों बाद बाढ़ के पानी का बहाव कम हुआ और कहीं-कहीं जमीन भी दिखने लगी। मेरु पेड़ से उतर कर जंगल मे घुस गया।
शेरु को भी मेरु की गंध मिलने लगी थी जबकी वे एक-दूसरे से मिलों दूर थे। शेरु धीरे-धीरे गंध की ओर बढ्ने लगा। ऐसे बाढ़ के चलते जंगल में पहले से बसी गंध मे बहुत कमी आ आ गई थी। हवा विपरीत होने पर गंध भी मिलना बंद हो जाती थी। रात गहराती चली जाती थी। एक समय ऐसा आया की शेरु-मेरु को एक दूसरे की जोरदार खुशबू मिलने लगी। दोनों अनायास चिल्लाने लगे । शेरु-शेरु, मेरु-मेरु।
उनका मिलाप भारत मिलाप जैसा ही प्यारा और द्रवित करने वाला था। जंगल के सभी जानवरों की अंखे गीली थीं। शेरु-मेरु तो एक दूसरे को छोडते ही नहीं थे। कभे गले मिलना, कभी चाटना, कभी सूंघना और कभे पंजों से एक दूसे के शरीर को सहलाना। यह मंजर रात भर चला। सुबह-सबेरे, भेड़ियों के जमात बहुत सारा स्वादिष्ट भोजन लेकर पहुंचे। मेरु तो कई दिनों से भूखा था।  
कुछ  दिनों बाद जंगल के राजा शेरु ने आम सभा बुलाई। सभी जानवर डरते-सहमते सभा मंच के चारो तरफ जमा होने लगे। पर यह क्या। उस चट्टान जैसे मंच पर जो राजा का सिंहासन हुआ करता था। उसपर तरह-तरह के सवाड़ीस्घ्त भोजन रखे हुए थे। पेड़ की डालोंपर तरह-तरह के पक्षी समूह बैठे हुए थे। कभी मैं समूह राग भैरवी पर कोई गीत गाता तो कभी तोते राग मालकौस छेड़ते। जब गधे और घोड़े अपनी तान छेड़ते तो वातावरण हंसी से गूंज उठता । सभी ने मोर का नृत्य और भालू का पाश्चात्य डांस बहुत पसंद किया। जब शेरु राजा मेरु के साथ मंच पर सज-धज कर आए तो यह पता पाना असंभव सा था की कौन शेरु है और और कौन मेरु। जब हाथी ने जय-जयकार की ध्वनि ले साथ सर्वप्रथम शेरु को माला पहनाई तब सभी को मालूम हुआ।

आज बहुत ही महत्वपूर्ण 

 “The air was full of all the night noises that, taken together, make one big silence...” 
Keep peace withe Lords of the Jungle — the Tiger, the Panther, and Bear.
And trouble not Hathi the Silent, and mock not the Boar in his lair.
“One of the beauties of Jungle Law is that punishment settles all scores. There is no nagging afterward.”