आजकल
ट्रेन यात्रा कितनी सुलभ हो गई है। एडवांस मनचाहा टिकट बुक कर लें। निर्धारित समय
पर अपनी कार, या ओला/उबर से स्टेशन पहुँच
जाएँ। ट्रेन यात्रा समाप्त होने पर पुनः मनचाही सवारी से अपने गंतव्य पहुँच जाएँ। गंतव्य
गाँव है तब भी कोई मुश्किल नहीं। गाँव-गाँव तक अच्छी सड़कें बन गई हैं। अब तों
ग्रामवासियों का स्टेटस सिम्बल हाथी/घोड़े के बजाय मोटरकार हो गई है।
एक
जमाना था जब महज एक पोस्टकार्ड ही समाचार जानने का जरिया होता था। शादी का कार्ड
बुकपोस्ट से सफर तय करता था। टेलीफ़ोन दुर्लभ था और ट्रंक
काल पर बातें करना
बात का बतंगड़ हो जाने का शर्तिया अंदेशा।
बात
1976 की है। धीरे-धीरे डीजल इंजिन, स्टीम इंजिन की जगह ले रही थी। यह एमर्जन्सि काल था। यह समय आम नागरिक के
लिए बहुत डरावना था पर चोरी-डकैती और नक्सल इरादे उसी तरह कामयाब थे। लगता था की
जैसे शराब और नशाखोरी सरकार रेविन्यू बटोरने के लिए नहीं रोकती थी वैसे ही
चोरी-डकैती, अपहरण और नक्सलिस्म पुलिस की
मजबूरी थी।
मेरे
मित्र अशोक मिश्रा दोपहर 1 बजे धनबाद से सासाराम स्टेशन पहुंचे।साले की शादी थी।
चलते समय हितेशियों ने खबरदार कर दिया था।
इलाका डकैतों का है। लूटते तो हैं ही, निशानदेही के अंदेशे से जिंदा भी नहीं छोड़ते हैं। 3 बजे तक आसरा देखा।
लगता था चिट्ठी नहीं मिली। गलती अशोक की भी थी। योजना ससुराल पहुँच कर बारात के
साथ विवाह स्थल पहुंचाना था। छुट्टी न मिलने के कारण अशोक सीधे विवाह स्थल ही जा
रहे थे। स्टेशन से बाहर बस पकड़ने निकले।
नोखा
की बस चार बजे आई। छोटी 407 मिनी बस थी । बड़ी मुश्किल से बैठने की जगह मिली। वह भी
इस कारण की पैंट-शर्ट, लाल एक्सक्लूसिव
जूते और हाथ में मोटरी के बजाय बजाब्ता लाल सूटकेस देखकर कंडक्टर सरकारी ऑफिसर या
पोलिसिया समझ बैठा था। बस खचाखच भरी थी। अंदर काफी गर्मी हो गई थी। खिड़की के पास एक रोबदार, गठियाए
पर धूप से
झुलसे वृद्ध बैठे थे। जैसे ही अशोक ने खिड़की खोलने के लिए हाथ बढ़ाया। वृद्ध ने इशारे
से मना कर दिया। बस की छत पर काफी यात्री बैठे थे, खैनी मुंह में दबाये हुए। अगर खिड़की खुली तो पूरा
का पूरा थूक का सैलाब बदन सरोबार कर सकता था।
20
किलोमीटर की दूरी बस ने एक घंटे में पूरी की। अशोक के साथ बगल में बैठे वृद्ध और 4-5
जन भी उतरे। बात करने पर मालूम हुआ की दो जन सीतलपुर में बाराती जा रहे थे, बाकी राजपुर के निवासी थे जिन्हे भी
सीतलपुर होकर जाना था। मालूम हुआ आसपास गाँवों को मिलाकर 4-5 शादी थी। सीतलपुर 5 किलोमीटर पूरब था और वहाँ पैदल ही
जाना था। समय गंवाना बेकार था। सहयात्रियों में कोई भी संदिग्ध नहीं लग रहा था
बल्कि वृद्ध को समुचित आदर दिखते सब संस्कारी लग रहे थे। भगवान का आसरा करते अशोक
जी निकल पड़े।
निगाहें
पूरब की ओर डूबते सूरज पर थी। तभी पीछे से किसी के दौड़ते हुए नजदीक आने की आहट आई।
नंगे बदन गमछा लपेटे कोई श्रमिक लग रहा था। वृद्ध ने हांक लगाते हुए रूकने को कहा।
पूछा – अबे कहाँ जा रहा है? कौन जात है ? उसने झुक कर कहा- मालिक ! कहार हैं। सादी में
कंपनी के लिए बीड़ी-तंबाकू लेने गए थे। । नाच-गाना होवेगा ! बुजुर्ग ने उसे कहा- साहब
का बक्सा ले ले और सीतलपुर मालिक के जिम्मे दे देना। उस श्रमिक ने अशोक का लाल
सूटकेस थामा, सिर पर रखा और दौड़ लिया। इसे
भी अशोक ने भगवान भरोसे छोड़ दिया। कोई चारा भी न था। बुजुर्ग मुस्कुराहट के साथ
बुदबुदाये – लगता है लौंडा नचाएंगे इसीलिए बीड़ी-तंबाकू का इंतजाम हुआ है। रास्ते
भर कोई भी किसी से परिचय नहीं मांग रहा था। बहुत कम देर का साथ था या फिर परिचय
बेतकल्लुफ़ी को सीमा में न बांध दे। अशोक को सिगरेट की लत थी। इस कारण भी वह बुजुर्गवार से दूरी बनाए हुए था।
अभी
आधी ही दूरी तय हुई थी की अंधेरा होने लगा। दूर रोशनी दिखायी देने लगी थी। सड़क
छोडकर दाहिने तरफ नाले को पार करना था। सब लोग धोती समेत कर नाले मे उतर पड़े। अशोक
को पहले जूता-मोजा उतरना पड़ा और उसके बाद पैंट घुटने के ऊपर तक समेटना पड़ा। इस
कारण पीछे पड़ गए। नाले में गलत जगह पैर पड़ गया जहां गड्ढा ज्यादा था। जैसे ही आधा नाला
पार हुआ, सामने दूसरे किनारे पर 5-6
लठैत खड़े दिखे। अशोक क्या सभी जहां के तहां जड़वत हो गए, सिवाय वृद्ध के । शायद लठैत हमारे दिल का
हाल जान गए। वहीं से चिल्लाये – हमलोग के मेहमान आ रहे हैं, उन्ही
को लिवा ले
जाने आयें हैं, डरिए मत पार लग जाइए। जान में
जान आई। उन लठैतों ने वृद्ध का बारी-बारी से पैर छूआ। पीछे अंधेरे में जीप लगी थी।
वृद्ध सज्जन को जीप पर बैठा कर बढ़ गए।
गाँव
के अंधेरीया में जब पेट्रोमैक्स जलता है तो बहुत दूर तक उजाला हो जाता है।
बरातियों की मेहमान-नवाज़ी के लिए स्पेशल रोशनी का इंतजाम था। ठीक बीचोबीच तिपाई पर
पेट्रोमैक्स रखा था। परती खेत पर तारपोलीन बिछाया गया था। एकदम किनारे पुआल के
मुलामियत पर सफ़ेद चादर बिछी थी। मसनद भी था। 100 बरातियों के सोने का इंतजाम था।
दूसरी तरफ सामने की ओर 4-6 चौकियों
को मिलाकर उस पर दरी बिछायी गई थी। इसी मंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रम यानी नाच-गाना
होना था।
अशोक
अपने साले दूल्हे और उनके मित्रो के साथ शामियाने का एक कोना पकड़ लिए। सिगरेट भी
पीना था वह भी बहुत सावधानी के साथ- नीचे पुआल, ऊपर कपड़े का शामियाना और दूसरे कोने पर बराती के
बुजुर्गों की नजर। खैर शामियाना काफी लंबा-चौड़ा था। आते ही खबर का आदान-प्रदान हो
गया था। लगन की भरी तेज़ी के कारण बनारस से बाई का इंतजाम नहीं हो पाया। सासाराम से
बाई की व्यवस्था की गई थी।
8
बजे तक
बरातियों को भोजन करा दिया गया। 9 बजते-बजते पूरा पंडाल शरातियों से भर गया।
बाराती अलग पर सबसे आगे बीच में। बैठकी उम्र के लिहाज से पूरे तमीज़ के साथ लगी थी।
मंच पर ढोलक-हार्मोनिअम की जगह ग्रामोफोन पर फिल्मी गाने की आवाज बड़े-बड़े स्पीकर
से गूंज रही थी। पाकीजा के “चलते-चलते” गाने की शुरुआत के साथ दो बाई मंच पर घूँघट लिए थिरकने लगीं। पहले गाने
की महीनियत तीसरे गाने के बजते ही गायब हो गई। स्पीकर की जोरदार आवाज को दोनों बाई
अपने घुंघरू की आवाज से दबाने की कोशिश में मीना कुमारी से शम्मी कपूर बन गई थीं।
किसी ने बताया की बाई लोग नहीं मिली तो सब्जी बेचने वाली कुंजरिनो को उठा लाये थे।
कुछ देर बाद फरमायीशी नाच-गाना होने लगा। बुजुर्गवार के पास बाई जाकर व्योछावर भी
ले आती थीं। कार्यक्रम 2 बजे रात तक चला। अशोक तो यह सब देखते-सुनते कभी का सो
गया।
सुबह शोर मचे पर अशोक की नींद खुली। पुलिस
की जीप लगी थी। किसी डाकू को खोज रहे थे। पुलिस के जाने के बाद अशोक ने शरातियों ने
पूछा। पुलिस उस इलाके के दुर्दांत डाकू
परमा सिंह की तलाश में आई थी। वही वृद्ध जो बस से साथ उतरा था और जिसे ले जाने घाट के किनारे
जीप सवार इंतजार कर रहे थे।


