Saturday, 20 June 2020

मैजिस्ट्रेट

यह कहानी तबकी है जब सरसों तेल 6 रुपये किलो और शुद्ध घी 35 रुपये किलो मिलता था। यह उस समय की कहानी है जब 2 किलो चीनी और 1 लिटर किरासन तेल के लिए घंटों राशन दुकान की लाइन में लगना पड़ता था। यह कहानी 1980 के दशक के शुरुआती वर्षों की है जब मध्यम वर्ग के लिए स्कूटर और इंग्लिश मीडियम स्कूल स्टेटस सिम्बल हुआ करता था। यह कहानी रांची कारखाने के टाउनशिप की है जहां 1500 रुपये पाने वाले इंजीनियर को 50 रुपये में 3 रूम का फ्लॅट मिलता था और बिजली का बिल मात्र 10 रुपये आता था। सबसे बढ़िया तो निशुल्क चिकित्सा थी।

मेरे बगलगीर एक बंगाली महाशय थे। रांची शहर में उनका विशाल पुश्तैनी मकान था। इस कारण उनका फ्लॅट हमेशा किराए पर रहता था। फ्लॅट मय बिजली और पानी के मात्र 100 रुपये में। उनकी शर्तें बहुत ही तर्कसंगत थीं। किरायेदार भला मानुस, ट्रांसफरेबल सरकारी नौकरीयाफ़्ता हो। अबतक उनके फ्लॅट में केन्द्रीय स्कूल के शिक्षक ही रहते आए थे । इस बार एक मैजिस्ट्रेट आए। मेरे बगलगीर के पिता भी रिटायर्ड सिविल जज थे – उनकी सिफ़ारिश पर।

सत्यप्रिय और उनका परिवार बहुत ही मिलनसार था। मेरे 3 बच्चे उनके भी। मेरे भी 2 लड़कियां उनकी भी। सोच-विचार, रहन-सहन बहुत कुछ मिलता था- यहाँ तक की वेतन भी। सत्यप्रिय जी को मेरे साथ बैठकी बहुत रास आती थी। उन्हें भी क्लैसिक किताबों, पाश्चात्य संगीत और स्वादिष्ट भोजनों में रुचि थी। फर्क एक अवशय था । कारखाने के इंजीनियर के भ्रष्ट होने की गुंजाईश ना के बराबर थी। सत्यप्रिय जैसे मैजिस्ट्रेट को ईमानदार रहने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ती थी। उससे भी ज्यादा उन्हे ईमानदार दिखाये देने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती थी – अपने मातहतों से, अपनी बीबी-बच्चों से और मौजूदा न्यायायिक प्रणाली से। सबसे तो वे निपट सकते थी पर अपने बीबी-बच्चों से सामजस्य बैठाना बहुत टेढ़ी खीर थी।

टाउनशिप में 2 केन्द्रीय विद्यालय थे। वहाँ सत्यप्रिय के बच्चों का दाखिले आसानी से हो जाता। पर सोसाइटी के सब बच्चे इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ते थे। मेरे बच्चे भी रंग-बिरंगी यूनिफ़ॉर्म पहन कारखाने की बस से स्कूल जाते और बेवजह खेलते समय भी इंग्लिश में बातें करते। 1 महिना तो निर्णय लेने में लग गया। आखिरकार सत्यप्रिय ने अपनी मजबूरी मुझे बताई। वे चाहते थे की उनकी बड़ी बेटी का दाखिला कान्वेंट में हो जाये। इसके लिए वे 15 दिनों से अपनी बेटी से सिर्फ इंग्लिश में ही बातें कर रहे थे।

कान्वेंट का सत्र आरंभ हो चुका था। मैं उन्हे और उनकी बेटी को अपने स्कूटर में बैठाकर कान्वेंट ले गया। 11 किलोमीटर दूर था। बिटिया का इंग्लिश उच्चारण बहुत ही अच्छा था। एड्मिशन हो गया। उस समय केन्द्रीय विद्यालय की फीस मात्र 1 रुपये हुआ करती थी। कान्वेंट की फीस 60 रुपये थी। लौटते समय 2 जोड़ी यूनिफ़ॉर्म और जूते खरीदने में 500 रुपये हलकान हो गए। हमलोगों को प्रति बच्चे बस का मासिक किराया 10 रुपये देना पड़ता था। सत्यप्रिय को कार्पोरेशन की बस की इजाजत तो मिल गई पर वहाँ भी उन्हें 50 रुपये मासिक भाड़ा देना पड़ा। उनके चेहरे पर दर्दीली मुस्कुराहट मुझसे देखी नहीं जाती थी।

उनके घर कोर्ट से दिया एक नौकर 24 घंटे रहता। साथ ही सुबह-सुबह फ़ाइल लेने-लेजाने के लिए साइकल से एक चपरासी आता। सत्यप्रिय ने अपनी छोटी बेटी को पास के मोंटेसरी में दाखिला करवा दिया था। जब सब कोई जा चुके होते तो घर का काम-काज निबटा कर उनकी श्रीमती अपने गोद वाले बच्चे को लेकर मेरे घर आ जाती। कभी नौकर भेजकर मेरी श्रीमती को बुलवा भेजती। जो भी अच्छा बना होता वह एक दूसरे सांझा करते। शाम के समय सत्यप्रिय को मेरे साथ घूमना अच्छा लगता। उस समय हमलोग हर तरह की बातें करते- हर तरह की। हम दोनों को टहलते देख कोई भी समझ लेता की एक सरकारी अधिकारी है तो दूसरा इंजीनियर। सत्यप्रिय अपने पहनावे और रख-रखाव पर लेशमात्र भी कमी नहीं होने देते। बाल सँवरे हुए, फुलशर्ट और फुललपैंट पूरी क्रीज के साथ, जूता चमकता हुआ और आंखे स्थिर, दूर दृष्टि वाली।

कुछ दिनों से वे मेरे स्कूटर को आते-जाते निहारते रहते थे। मैं भाँप गया। पूछने पर मालूम हुआ की वह कचहरी दो किश्तों में आते जाते हैं। टाउनशिप से काली मंदिर, मेन रोड तक बस से तथा स्टेटस की खातिर वहाँ से कचहरी तक रिक्शे से। कुल मिलाकर एक दिन का 5 रुपया और महीने का 130 रुपया खर्च हो जाता है। मैंने उन्हें सुझाव दिया की इतने की EMI में तो स्कूटर आ जाएगा। उन्हें यह बात भा गई। बैंक से लोन लेकर उन्होने एक लेंबबरेटा स्कूटर ले लिया। एक हफ्ते में वे परिवार सहित पूरी रांची घूम आए। अपने सहयोगियों के घर भी हो आए। एक महीना आनन-फानन में बीत गया।

बेटी की पढ़ाई और स्कूटर के पेट्रोल के खर्च से उनका तलवार की धार पर चलने वाला बजट बुरी तरह बिगड़ने लगा। उनकी श्रीमती साहसी और समझदार थीं। वे चपरासी से कचहरी के पास आढ़त से रसद और सब्जी मंगाने लगीं। कहती उधर आधे दाम में मिल जाता था। गाँव से चावल आने लगा। बनिए का उधार होने लगा। मुश्किल तब होती थी जब कोई बाहरी मेहमान आ जाता अथवा गाहे-बगाहे कोई नया खर्च मंडराने लगता – मसलन बीमारी, बेटी के स्कूल का फंकशन और उसके लिए नए लिबास, अथवा कॉलेज में पढ़ते छोटे भाइयों की जरूरतें। कभी-कभी आपतस्थिति में मेरे परिवार से प्रगाढ़ता काम आती। हमलोगों को सत्यप्रिय जैसे ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ सरकारी अधिकारी सहायता करने में बहुत खुशी होती।

एक दिन मैं कचहरी के पास किसी काम से गया। ईच्छा हुई सत्यप्रिय जी का कोर्ट देखा जाए। वकील से मार्गदर्शन लिया। पेशकार सामने के दरवाजे के पास खड़ा था। वह मुझे पहचानता था। मैं चुपके से पिछले दरवाजे से उनके कोर्ट में आकर कोने की एक कुर्सी पर बैठ गया। पेशकार बुरी तरह व्यस्त था। वह वकीलों और दूसरों से कागज लेता, फ़ाइल के अंबार में कुछ खोजता और उसी पुर्जे में शायद तारीख लिख कर दे देता। हाथ मे छिपकर दी गई राशि को देखता और फ़ाइल ऊपर-नीचे कर देता। इससे ज्यादा मुझे कुछ समझ नहीं आया।

मैजिस्ट्रेट सत्यप्रिय बगल के कमरे से दाखिल हुए। सन्नाटा छा गया। 15 मिनटों में उन्होने दो जिरह और कई केस पर अपना निर्णय सुनाया। ज़्यादातर तारीख बढ़ाने का मामला दिखा। जिनकी तारीख बढ़ती वे पेशकार के पास जाते। एक बात तो तय थी। सत्यप्रिय बहुत अच्छी इंग्लिश बोलते थे और कोर्ट में उनका बहुत आदर था।

शाम को मैंने उन्हे बताया। उन्हे अपनी तारीफ बहुत अच्छी लग रही थी। हो भी क्यों न ! एक ईमानदार, जानकार और कर्तव्यनिष्ठ मैजिस्ट्रेट के लिए इससे ज्यादा आकर्षक बोनस और क्या हो सकता था।

देखते-देखते 3 वर्ष बीत गए। उनका तबदला हो गया। जैसा होता है बिछड़ने पर। मर्दों की आँखें गीली हुई। औरतें खूब रोयी। कुछ ऑफिस के फ़र्निचर थे। उसे मेरे पास रखवा, फ्लॅट को ताला लगा, उनका परिवार विदा हो गया।

अगले दिन वही चपरासी आया फ़र्निचर लेने। कायदे से हमलोगों ने उसे चाय व नाश्ता कराया। बातें भी हुई। वह सत्यप्रिय का गुणगान करते नहीं थक रहा था विशेषकर ईमानदारी की बारे में। मैंने चपरासी बाटाया की वह जो सब्जी और राशन लाता था उससे उनको बहुत मदद हो जाती थी। मैंने उससे आढ़त और दुकान का पता पूछा जिससे की मैं भी कभी-कभार व्होलसेल ले सकूँ।

चपरासी थोड़ा उदास हो गया। सब्जी और राशन सस्ता जरूर मिलता था पर उतना भी नहीं। हमलोग कोर्ट के स्टाफ सामान को मालकिन के बजट के लायक सस्ता कर देते थे।

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