Sunday, 5 July 2020

एक निमंत्रण ऐसा भी


आजकल ट्रेन यात्रा कितनी सुलभ हो गई है। एडवांस मनचाहा टिकट बुक कर लें। निर्धारित समय पर अपनी कार, या ओला/उबर से स्टेशन पहुँच जाएँ। ट्रेन यात्रा समाप्त होने पर पुनः मनचाही सवारी से अपने गंतव्य पहुँच जाएँ। गंतव्य गाँव है तब भी कोई मुश्किल नहीं। गाँव-गाँव तक अच्छी सड़कें बन गई हैं। अब तों ग्रामवासियों का स्टेटस सिम्बल हाथी/घोड़े के बजाय मोटरकार हो गई है।
एक जमाना था जब महज एक पोस्टकार्ड ही समाचार जानने का जरिया होता था। शादी का कार्ड बुकपोस्ट से सफर तय करता था। टेलीफ़ोन दुर्लभ था और ट्रंक काल पर बातें करना बात का बतंगड़ हो जाने का शर्तिया अंदेशा।
बात 1976 की है। धीरे-धीरे डीजल इंजिन, स्टीम इंजिन की जगह ले रही थी। यह एमर्जन्सि काल था। यह समय आम नागरिक के लिए बहुत डरावना था पर चोरी-डकैती और नक्सल इरादे उसी तरह कामयाब थे। लगता था की जैसे शराब और नशाखोरी सरकार रेविन्यू बटोरने के लिए नहीं रोकती थी वैसे ही चोरी-डकैती, अपहरण और नक्सलिस्म पुलिस की मजबूरी थी।
मेरे मित्र अशोक मिश्रा दोपहर 1 बजे धनबाद से सासाराम स्टेशन पहुंचे।साले की शादी थी। चलते समय हितेशियों  ने खबरदार कर दिया था। इलाका डकैतों का है। लूटते तो हैं ही, निशानदेही के अंदेशे से जिंदा भी नहीं छोड़ते हैं। 3 बजे तक आसरा देखा। लगता था चिट्ठी नहीं मिली। गलती अशोक की भी थी। योजना ससुराल पहुँच कर बारात के साथ विवाह स्थल पहुंचाना था। छुट्टी न मिलने के कारण अशोक सीधे विवाह स्थल ही जा रहे थे। स्टेशन से बाहर बस पकड़ने निकले।
नोखा की बस चार बजे आई। छोटी 407 मिनी बस थी । बड़ी मुश्किल से बैठने की जगह मिली। वह भी इस कारण की पैंट-शर्ट, लाल एक्सक्लूसिव जूते और हाथ में मोटरी के बजाय बजाब्ता लाल सूटकेस देखकर कंडक्टर सरकारी ऑफिसर या पोलिसिया समझ बैठा था। बस खचाखच भरी थी। अंदर काफी गर्मी हो गई थी।  खिड़की के पास एक रोबदार, गठियाए पर धूप से झुलसे वृद्ध बैठे थे। जैसे ही अशोक ने खिड़की खोलने के लिए हाथ बढ़ाया। वृद्ध ने इशारे से मना कर दिया। बस की छत पर काफी यात्री बैठे थे, खैनी मुंह में दबाये हुए। अगर खिड़की खुली तो पूरा का पूरा थूक का सैलाब बदन सरोबार कर सकता था।
20 किलोमीटर की दूरी बस ने एक घंटे में पूरी की। अशोक के साथ बगल में बैठे वृद्ध और 4-5 जन भी उतरे। बात करने पर मालूम हुआ की दो जन सीतलपुर में बाराती जा रहे थे, बाकी राजपुर के निवासी थे जिन्हे भी सीतलपुर होकर जाना था। मालूम हुआ आसपास गाँवों को मिलाकर 4-5 शादी थी।  सीतलपुर 5 किलोमीटर पूरब था और वहाँ पैदल ही जाना था। समय गंवाना बेकार था। सहयात्रियों में कोई भी संदिग्ध नहीं लग रहा था बल्कि वृद्ध को समुचित आदर दिखते सब संस्कारी लग रहे थे। भगवान का आसरा करते अशोक जी निकल पड़े।
निगाहें पूरब की ओर डूबते सूरज पर थी। तभी पीछे से किसी के दौड़ते हुए नजदीक आने की आहट आई। नंगे बदन गमछा लपेटे कोई श्रमिक लग रहा था। वृद्ध ने हांक लगाते हुए रूकने को कहा। पूछा – अबे कहाँ जा रहा है? कौन जात है ? उसने झुक कर कहा- मालिक ! कहार हैं। सादी में कंपनी के लिए बीड़ी-तंबाकू लेने गए थे। । नाच-गाना होवेगा ! बुजुर्ग ने उसे कहा- साहब का बक्सा ले ले और सीतलपुर मालिक के जिम्मे दे देना। उस श्रमिक ने अशोक का लाल सूटकेस थामा, सिर पर रखा और दौड़ लिया। इसे भी अशोक ने भगवान भरोसे छोड़ दिया। कोई चारा भी न था। बुजुर्ग मुस्कुराहट के साथ बुदबुदाये – लगता है लौंडा नचाएंगे इसीलिए बीड़ी-तंबाकू का इंतजाम हुआ है। रास्ते भर कोई भी किसी से परिचय नहीं मांग रहा था। बहुत कम देर का साथ था या फिर परिचय बेतकल्लुफ़ी को सीमा में न बांध दे। अशोक को सिगरेट की लत थी। इस कारण भी वह बुजुर्गवार से दूरी बनाए हुए था।  
अभी आधी ही दूरी तय हुई थी की अंधेरा होने लगा। दूर रोशनी दिखायी देने लगी थी। सड़क छोडकर दाहिने तरफ नाले को पार करना था। सब लोग धोती समेत कर नाले मे उतर पड़े। अशोक को पहले जूता-मोजा उतरना पड़ा और उसके बाद पैंट घुटने के ऊपर तक समेटना पड़ा। इस कारण पीछे पड़ गए। नाले में गलत जगह पैर पड़ गया जहां गड्ढा ज्यादा था। जैसे ही आधा नाला पार हुआ, सामने दूसरे किनारे पर 5-6 लठैत खड़े दिखे। अशोक क्या सभी जहां के तहां जड़वत हो गए, सिवाय वृद्ध के । शायद लठैत हमारे दिल का हाल जान गए। वहीं से चिल्लाये – हमलोग के मेहमान आ रहे हैं, उन्ही को लिवा ले जाने आयें हैं, डरिए मत पार लग जाइए। जान में जान आई। उन लठैतों ने वृद्ध का बारी-बारी से पैर छूआ। पीछे अंधेरे में जीप लगी थी। वृद्ध सज्जन को जीप पर बैठा कर बढ़ गए।  
गाँव के अंधेरीया में जब पेट्रोमैक्स जलता है तो बहुत दूर तक उजाला हो जाता है। बरातियों की मेहमान-नवाज़ी के लिए स्पेशल रोशनी का इंतजाम था। ठीक बीचोबीच तिपाई पर पेट्रोमैक्स रखा था। परती खेत पर तारपोलीन बिछाया गया था। एकदम किनारे पुआल के मुलामियत पर सफ़ेद चादर बिछी थी। मसनद भी था। 100 बरातियों के सोने का इंतजाम था। दूसरी तरफ सामने की ओर 4-6 चौकियों को मिलाकर उस पर दरी बिछायी गई थी। इसी मंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रम यानी नाच-गाना होना था।
अशोक अपने साले दूल्हे और उनके मित्रो के साथ शामियाने का एक कोना पकड़ लिए। सिगरेट भी पीना था वह भी बहुत सावधानी के साथ- नीचे पुआल, ऊपर कपड़े का शामियाना और दूसरे कोने पर बराती के बुजुर्गों की नजर। खैर शामियाना काफी लंबा-चौड़ा था। आते ही खबर का आदान-प्रदान हो गया था। लगन की भरी तेज़ी के कारण बनारस से बाई का इंतजाम नहीं हो पाया। सासाराम से बाई की व्यवस्था की गई थी।
8 बजे तक बरातियों को भोजन करा दिया गया। 9 बजते-बजते पूरा पंडाल शरातियों से भर गया। बाराती अलग पर सबसे आगे बीच में। बैठकी उम्र के लिहाज से पूरे तमीज़ के साथ लगी थी। मंच पर ढोलक-हार्मोनिअम की जगह ग्रामोफोन पर फिल्मी गाने की आवाज बड़े-बड़े स्पीकर से गूंज रही थी। पाकीजा के चलते-चलते गाने की शुरुआत के साथ दो बाई मंच पर घूँघट लिए थिरकने लगीं। पहले गाने की महीनियत तीसरे गाने के बजते ही गायब हो गई। स्पीकर की जोरदार आवाज को दोनों बाई अपने घुंघरू की आवाज से दबाने की कोशिश में मीना कुमारी से शम्मी कपूर बन गई थीं। किसी ने बताया की बाई लोग नहीं मिली तो सब्जी बेचने वाली कुंजरिनो को उठा लाये थे। कुछ देर बाद फरमायीशी नाच-गाना होने लगा। बुजुर्गवार के पास बाई जाकर व्योछावर भी ले आती थीं। कार्यक्रम 2 बजे रात तक चला। अशोक तो यह सब देखते-सुनते कभी का सो गया।
सुबह शोर मचे पर अशोक की नींद खुली। पुलिस की जीप लगी थी। किसी डाकू को खोज रहे थे। पुलिस के जाने के बाद अशोक ने शरातियों ने पूछा। पुलिस उस इलाके के दुर्दांत डाकू परमा सिंह की तलाश में आई थी। वही वृद्ध जो बस से साथ उतरा था और जिसे ले जाने घाट के किनारे जीप सवार इंतजार कर रहे थे।  


ये तो होना ही था

रघुराज हमेशा की तरह दोपहरी की तपिश कम होते ही अपने नाती को लेकर पार्क में आए। वे अपनी पसंदीदा बेंच पर बैठ गए। बेंच के बाई तरफ बच्चों के खेलने का प्ले स्टेशन था और दायी तरफ छोटा सा तालाब जिसमें इस बेला में 10-15 बत्तकें तैरती मिलती थीं। 5 वर्ष का अर्जुन दौड़ता हुआ प्ले स्टेशन की ओर चला गया। रघुराज ने जैसे ही अपने पॉकेट में हाथ डाला, बत्तकें एक कतार बना उनकी ओर आने लगीं। रघुराज बिस्कुट और ब्रेड का टुकड़ा बिखेर देते थे। कोई-कोई बत्तक तो उनके हाथ से भी टुकड़े चुग लेती थी। पार्क की दूर तक फैली हरियाली, क्यारिओं में तरह-तरह के फूल, जॉगिंग और कसरत करते युवा, सैर करते वरिष्ठ, मखमली घास पर दौड़ते-खेलते बच्चे, तालाब और उनपर मस्ती करतीं बत्तकें, किसी का भी मन मोह लेता। शाम का ये दो घंटा दिनभर का सबसे आह्लादित करने वाला समय था। वे हर दिन इस समय का इंतजार करते थे।

अर्जुन कभी-कभी पास आकर बॉटल से पानी पी लेता और खेलते समय होने वाली एक-दो घटनाएँ उखड़ती साँसों के साथ बताकर फिर खेलने भाग जाता। घटनाएँ मसलन- आज मैंने उसे स्लाइडिंग में हरा दिया, आज हाइड अँड सीक में मैं एक बार भी चोर नहीं बना, अनन्या मुझसे ज्यादा बड़ी पेंगें लगती है झूले पर वगैरह। इधर दो-तीन दिनों से उसकी सारी बातें अनन्या पर केन्द्रित होती। एक बार अर्जुन-अनन्या दोनों पानी पीने भागे-भागे आए। रघुराज ने देखा की अनन्या शायद वहाँ खलेने आते बच्चों में सबसे सुंदर और आकर्षक थी। रघुराज ने प्रशंसा की और कहा – बहुत प्यारी हो।“ अर्जुन कुछ सोच में पड़ गया। दोनों दौड़ कर लौटने लगे तो अर्जुन लौट कर मेरे पास आया और बोला –“नानू ! अनन्या अच्छी है ना । वह कहती है की मैं उसे बहुत अच्छा लगता हूँ “ मैंने मुस्कुराकर सिर हिला दिया। जिस दिन अनन्या वापस अपने शहर लौट गई उस दिन अर्जुन बहुत उदास था। उस दिन पार्क में वह रघुराज की गोद में सिर रख सो गया, खेलने नहीं गया। रघुराज अर्जुन का सिर सहलाते सोच रहा था कि क्या इतनी छोटी उम्र में भी.... ? उन्हें अपना बचपन याद आ गया।

रीना रघु से दो साल बड़ी रही होगी। उनकी दोस्ती घर के बाड़े के पास लगे आम के पेड़ के चलते हुई। पेड़ रघु के बाड़े में था। ज़्यादातर कच्चे-पके आम रीना के हाते में गिर जाते थे। रघु जब भी आम चुनने जाता दोनों में लड़ाई हो जाती। दोस्ती तब हुई जब आम गिरने पर रीना ने आवाज लगाकर बुलाया और सब आम रघु को दे दिया। रघु शरमाकर आधे से ज्यादा आम रीना को लौटा दिये।

रीना जब भी कच्चे आमों का चटकारा बनती नमक-मिर्च के साथ तो रघु को जरूर बुलाती। पड़ोसियों के बीच बहुत अच्छी आवाजाही होती थी। कोई खबर होती, कोई फिल्म लगती, कोई व्यंजन बनता तो सबका आदान-प्रदान होता। जिस दिन रीना के स्कूल में छुट्टी होती, रीना और रघु टिफिन में कुछ भी डालकर लाते और आम के पेड़ की छाया में बैठकर सांझा करते।पूछने पर कहते की हमलोग पिकनिक कर रहे हैं ।
रीना की बड़ी बहन की शादी होने वाली थी। रीना की दीदी जब कभी किसी गाने का रिहर्सल करती तो रीना और रघु जज बनते। तय यह होता कि दीदी को भी रीना-रघु का गीत सुनना पड़ेगा। एक दिन टिफिन सांझा करने के बाद दोनों कोई गीत गुनगुना रहे थे। आसपास की कोई खबर ही नहीं रही। जब सिर उठाया तो देखा की सबकोई शांत खड़े मुस्कुरा रहे थे ।

बड़े लोग इन दोनों की प्रगाढ़ मित्रतता पर चुटकियाँ लेने से बाज नहीं आते। एक दोपहरी रघु और रीना बैर की तलाश में जंगल की ओर ज्यादा गहरे चले गए । रास्ता भूल गए । किसी तरह पूछते टोह लगते ये दोनों बहुत देर बाद घर लौटे । घर के बरामदे में तो भीड़ लगी थी । दोनों दिखे तब जान में जान आयी। पर किसी ने मजाक कर ही दिया - हमलोग तो सोचे कि दोनों भाग लिए.। सबलोग खिलखिला के हंस पड़े। कुछ अच्छा भी  होता रहा । अगर रघु सुबह तैयार होने  या पढ़ने में आनाकानी करता तो खबरदार कर दिया जाता - रीना से शिकायत कर देंगे। इसी तरह अगर रीना घर के काम में हाथ बंटाने में आलस दिखाती तब रघु को आवाज लगा दी जाती ।

जीवन की गाड़ी कई मौसम झेलते, कई पड़ाव बदलते एक नए शहर पहुंची। रघु कभी भी जीवन के उन जीवंत क्षणों को नहीं भूला। अब वह एक शांत, शर्मीला, कम बोलने वाला किशोर हो गया था ।

रघु स्कूल की परीक्षा पास कर कॉलेज में एड्मिशन की तैयारी कर रहा था। एक शाम जब वह अपने कमरे में पढ़ाई में व्यस्त था तभी छोटा भाई बुलाने आया – देखो ! कोई मिलने आया है। बैठके में आने पर एक पूरा परिवार दिखाई पड़ा। वह किसी को पहचान नहीं पाया। तभी एक मोटी-ताजी,युवा लड़की ने मुस्कुराकर कहा-“ “नहीं पहचाना ! मैं रीना हूँ । अरे ! रघु तो शरमा रहा है।“वह मेडिकल में दाखिले के लिए आई हुई थी। वह तरह-तरह के संस्मरण सुना रही थी। रघु जड़वत खड़ा सुनता रहा। उसकी यादाश्त में तो वही छुई-मूयी नन्ही सी रीना बसी हुई थी।








Saturday, 27 June 2020

कोबरा

मैंने गौडफादर पर बनी मूवी पहले देखी और बाद मे उपन्यास। मूवी का सबसे रोमांचक क्षण तब आता है जब अपने पाँचों माफिया दावेदारों से रंजिश भुलाकर माईकल से मिलने का दिन तय होता है। माईकल के दिमाग में एक निर्मम योजना थी। तय दिन सुबह माईकल चर्च में अपने बड़े भाई के बच्चे का बपतिस्मा करा रहा होता है, चर्च की घंटियाँ बज रही होती हैं और उसी समय पाँचों दुश्मनों को मौत के घाट उतारा जा रहा होता है। मुझे अपने मोहल्ले के १२ वर्षीय रघुराज की याद आ गयी ।  उसने भी उस कच्ची उम्र में अपने तीन दुश्मनों से  एक झटके में इंतकाम लिया था ।

वह समय आजाद भारत के अंगड़ाई लेकर जागने का था। एक तरफ पंडित नेहरू बड़े-बड़े कल-कारखाने लगवा रहे थे तो दूसरी ओर सुहारवर्दी का पुतला जलाया जाता था। आजाद भारत का पहले छात्र आंदोलन की आग ठंडी पड चुकी थी। उपराष्ट्रपति राधाकृष्णनन राष्ट्रपति पद की दावेदारी ठोकने लगे थे।

रघु घर का क्या पूरे पड़ोस का दुबला-पतला , कमजोर दिखने वाला, सबसे छोटे कद का लड़का था। यही कमजोरी उसकी मजबूती होने वाली थी। उसकी कोशिश रहती की वह खेलकूद में ही नहीं अपितु बदमाशी, मस्ती, लड़ाई-झगड़े यहाँ तक की पढ़ाई-लिखाई में भी सबसे अव्वल रहे। पीटता था पिटाता था परंतु झुकता नहीं था। मजाल है की कोई उसको चोट अथवा हानि पहुंचा दे। कितना भी ताकतवर हो, कितना भी चालाक हो , रघु बदला ले ही लेता था, आज नहीं तो कल, कल नहीं तो बरसों बाद। इसी कारण उसे उसके सहचर कोबरा-करैत की संज्ञा देते ते।

एक बार किसी बात पर उसकी तकरार अपने से बड़े और शक्तिशाली लड़के भोला  से हो गई। बात मारा-मारी पर आ गई। उस लड़के ने रघु की जमकर पिटाई की। उस दिन के बाद रघु उसके साथ खेल में तो शामिल होता था पर बातचीत बिलकुल बंद। 6 महीने बाद सब कोई आसपास (लुका-छिपी) खेल रहे थे। रघु ने देख रखा था कि खेल के मैदान के कोने में एक बड़ा गड्ढा था। उसमें एक काला कटखना कुत्ता दोपहरी की गर्मी से बचने के लिए आराम करता था। भोला  चोर बना था और बाकी छिपे लड़को को खोज रहा था। सबसे पहले रघु बरामद हुआ। रघु ने गड्ढे के पास जाकर ऐसा दिखाया कि कोई उसमें छिपा हुआ है। भोला  ताड़ गया।भोला  ने जांच करने के लिए एक कंकड़ फेका। यहीं गलती हो गई। गड्ढे में हरकत हुई।  जैसे ही वह धप्पा करने के लिए गड्ढे में झाँका, काला कुत्ता कंकड़ से बौखलाया, उसपर झपट पड़ा । लहू लुहान भोला  को रघु और सब खेलेने वालों ने टांग कर घर पहुंचाया। मोटे सूए से 14 इंजेक्शन लगे उसके पेट पर। 15-20 दिन बाद भोला  खेल के मैदान पर आया। आते ही रघु की तरफ बढ़ा। सब कोई चौकन्ने हो गए। आश्चर्य कि भोला  ने रघु के पैर पकड़ लिए और माफी मांगी।

उस दिन के बाद लोगबाग ज्यादा सचेत हो गए। कोई रघु से पंगा नहीं लेता था। पर दुनिया तो बहुत बड़ी है। एक दिन क्रिकेट खेलते समय गेंद गोपाल के दोमंजिले छत पर जा गिरी। गोपाल के चाचा कॉलेज में पढ़ते थे। बहुत गुस्सैल और तुनक मिजाज थे। एयर गन से चिड़ियों का शिकार करते थे। किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी गेंद लिवा लाने की। जाते भी कैसे। दोपहर को सबकोई घर का दरवाजा बंद करके आराम करते थे। ऐसे भी पड़ोस में बच्चों का शोरगुल किसे अच्छा लगता है। रघु को एक मौका लग गया अपनी बहादुरी दिखाने का। जबतक कोई समझता वह छत से नीचे आते बरसाती ह्यूम पाइप से ऊपर चढ़ता दिखाई दिया जैसे लोग ताड़ के पेड़ पर चढ़ते हैं। छत पर उसे गेंद खोजने में परेशानी हो रही थी। गेंद मिल तो गया पर साथ ही गोपाल के चाचा जग गए। वे चिल्लाये, एयर गन लेकर दौड़े और नीचे उतरते रघु पर छर्रा दाग दिया। छर्रे से रघु की बांह छिल गई। उसके बाद रघु ने गोपाल के व्यसक चाचा को अभिवादन करना छोड़ दिया। जब भी दोनों आमने-सामने होते, रघु की घूरती आंखे उन्हें हिंसक नजरों से पीछा करती।

सब बच्चों ने पैसा जमा कर क्रिकेट के बैट और 4 विकेट बढ़ई से बनवाए थे। उस सड़क के दादा शंकर को बैट-विकेट पसंद आ गए। जब भी इच्छा होती मांगकर अथवा छीन कर ले जाता। एक बार तो हुज्जत कुछ ज्यादा बढ़ गई। शंकर एक तगड़ा घूंसेबाज़ था। रघु के आपत्ति करने पर उसने एक घूंसा उसके मुंह पर जड़ दिया। होंठों से खून छलक उठा। शंकर बैट-विकेट छीन कर अपने घर ले गया। उसने धमकी भी दे डाली। अगर कोई भी हाथ लगाएगा तो बहुत पिटेगा। उसके बाद छोटे बच्चे दीवार पर 3 लकीर खींचकर या एक तिपाई रखकर पुराने टूटे बैट से खेलने लग गए। जब कभी शंकर का मन करता वह बैट-विकेट खेलने अपने कोर्टयार्ड में बुला लेता। शायद अंग्रेजों के शासन में हिंदुस्तानियों को ऐसा ही लगता होगा जैसा इन बच्चों को लगता था।

एक दिन रघु फिर शंकर के हाथों बुरी तरह पीट गया। रघु अपने साथियों के साथ बैट-विकेट वापस हथियाने की बहुतेरी योजना बनाता रहता था। इसकी चुगली रमेश ने शंकर से कर दी। रघु ने मन ही मन फैसला किया। वह अपनी योजना में किसी को शामिल नहीं करेगा। कोई भी चूक बहुत भारी हो सकती थी। इसलिए बचने का रास्ता भी अचूक होना चाहिए।

देखते-देखते एक साल बीत गए। रघु के पिताजी का तबादले का ऑर्डर आ गया। एक महीने के अंदर जाना था। एक-एक करके दिन नजदीक आता जा रहा था। रघु की बैचेनी बढ़ती जा रही थी। घर का समान बड़े-बड़े लकड़ी के बक्से में पैक होता जा रहा था। एक दिन दोपहरी को एक ट्रक घर के सामने आ लगा। कुली तैयार पैकेज लादने लगे। यही एक और आखिरी मौका था।

ढलती दोपहरी को रघु शंकर के घर के सामने था। शंकर का छोटा भाई शुक्ला जो हर वक्त खेलने को तैयार रहता था, दौड़ कर आ गया और मिन्नत करने लगा “आसपास” खेलने को। ऐसा हरदम होता था। यही रघु की योजना की बुनियाद बनी। पहले रघु चोर बना और दिखावटी देर लगाकर शुक्ला को ढूंढा। इसे बीच रघु ने ताड़ लिया की बैट-विकेट घर के पिछले हिस्से में खुले गैरेज की दीवार पास रखा था। गैरेज के बगल से गलियारा पीछे की दीवार तक जाता था। दीवार 10 फीट ऊंची रही होगी। उसके पीछे सर्विस लेन थी जहां अहले सुबह मेहतर आते थे और देर रात कभी-कभी चोर। बच्चे भी आम-अमरूद-ईमली चोरी से तोड़ने उधर जाते थे।

इस बार शुक्ला चोर बना। उसे आँख मूँद कर 100 तक गिनती गिननी थी वह भी मकान की ओट में दूसरी ओर खड़े होकर। 100 तक गिनती गिनने में 7 वर्ष के बच्चे को 3 मिनट तो लगते ही। रघु दौड़ कर छिपने के बजाय गैरेज के अंदर से  बैट-विकेट लेकर दौड़ता  हुआ एक-एक कर सभी को दीवार के पार सर्विस लेन की तरफ उछाल दिया।

आसपास खेलने के बाद थक कर रघु और शुक्ला गेट के बाहर पुलिया पर सुस्ताने और बतियाने लगे। तभी एक गिरगिट सामने वाले गोपाल के चाचा के मुंडेर पर दिखा और दिखा 6/6 फीट का हरी नक्काशी वाली शीशे की बहुत बड़ी खिड़की। गोपाल का पूरा परिवार पूजा की छुट्टियों में गाँव गया हुआ था। रघु के दिमाग की बत्ती कौंधी। शुक्ल को गिरगिट पर निशाना साधने के लिए उकसाया। भला छोटे से शुक्ला से क्या निशाना सधता। कमान रघु ने संभाली। बड़ा सा पत्थर उठाया। रघु का सोचा समझा  निशाना भी भयानक रूप से चूंका। गिरगिट को लगने के बजाय शीशे पर लगा। पूरा भारी-भरकम शीशा आवाज के साथ गिरा। शुक्ला को काटो तो खून नहीं। दोनों में तुरत सहमति हुई- किसी को कुछ नहीं बताएँगे और अपने-अपने घर भाग लिए।

रघु अपने घर से एक बोरा लेकर तेज कदमों से 2 फरलांग दूर सर्विस लेन गया। बैट-विकेट को बोरे में डाला, बोरे का मुंह को रस्सी से कसकर बांधा। तुरत ही वह ट्रक के पास आकर, खलासी से उस बोरे को सहेज कर रखवा दिया।

वर्षा रुक-रुक कर लगातार हो रही थी। शाम का अंधेरा छाने लगा था। ट्रक अब रवाना होने की तैयारी में था। रघु की अगली योजना और भी रोमांचक थी। रघु ने अपना टूटा जूता हाथ में लिया और माँ से पैसे लेकर मरम्मत को निकल गया। सुबह होते ही ट्रेन से रवाना होना था। मोची को जूता देकर 1 घंटे में आने को कह रघु अपने दूसरे मिशन पर निकल पड़ा। उसे मालूम था कि शंकर रात होने पर खेल कर दोस्तो के साथ मस्ती कर घर लौटता है।

रघु पुनः सर्विस लेन में आगे बढ़ रहा था। अंधेरा बढ़ता ही जा रहा था। उसके हाथ में गुलेल और 5 शीशे की गोलियां थीं। शंकर के घर के पिछवाड़े पुरानी दीवार के पास पहुँच उसने 2-3 ईंटें दीवार से निकाले पैर जमाने के लिए। दीवार पर चढ़ रघु अपने शिकार की ताक में जम कर बैठ गया। ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा।

शंकर भींगते ठिठुरते सामने गेट से दाखिल हो आगे बढ्ने लगा। तभी गुलेल की गोले झन्नाटे से उसकी कनपटी पर लगी। वह वहीं अचेत होकर गिर गया।

घर से निकले एक घंटे से ऊपर हो चुका था। रघु मोची की दुकान से जूता लेकर बारिश में भींगते हुए 100 मीटर के धावक की तरह दौड़ते हुए घर की ओर भागा। सामने से रमेश आ रहा था। बिल्ली के भाग से छींका टूटा। रघु ने मुट्ठी बाँधी और बगल से गुजरते हुए उसके पेट पर एक जोरदार मुक्का मारा। एकदम न्यूटन के इम्पल्सिव फोर्स सा मुक्का खाकर रमेश कराहते हुए वही बैठ गया।

सुबह पाँच बजे रघु का पूरा परिवार विक्टोरिया से स्टेशन के लिए रवाना हो गया। ट्रेन तो 9 बजे सुबह थी पर बहुत सारा सामान लगेजवैन में भी चढ़ाना था। ट्रेन छूटने से कुछ पहले रघु के पिताजी के मातहत विदा करने आए। चपरासी माँ की ओर मुखातिब होकर बोला- माताजी ! रघु बाबू बहुत पोपुलर हैं। बहुत से साथी घर पर आए थे । निराश लौट गए।

Saturday, 20 June 2020

मैजिस्ट्रेट

यह कहानी तबकी है जब सरसों तेल 6 रुपये किलो और शुद्ध घी 35 रुपये किलो मिलता था। यह उस समय की कहानी है जब 2 किलो चीनी और 1 लिटर किरासन तेल के लिए घंटों राशन दुकान की लाइन में लगना पड़ता था। यह कहानी 1980 के दशक के शुरुआती वर्षों की है जब मध्यम वर्ग के लिए स्कूटर और इंग्लिश मीडियम स्कूल स्टेटस सिम्बल हुआ करता था। यह कहानी रांची कारखाने के टाउनशिप की है जहां 1500 रुपये पाने वाले इंजीनियर को 50 रुपये में 3 रूम का फ्लॅट मिलता था और बिजली का बिल मात्र 10 रुपये आता था। सबसे बढ़िया तो निशुल्क चिकित्सा थी।

मेरे बगलगीर एक बंगाली महाशय थे। रांची शहर में उनका विशाल पुश्तैनी मकान था। इस कारण उनका फ्लॅट हमेशा किराए पर रहता था। फ्लॅट मय बिजली और पानी के मात्र 100 रुपये में। उनकी शर्तें बहुत ही तर्कसंगत थीं। किरायेदार भला मानुस, ट्रांसफरेबल सरकारी नौकरीयाफ़्ता हो। अबतक उनके फ्लॅट में केन्द्रीय स्कूल के शिक्षक ही रहते आए थे । इस बार एक मैजिस्ट्रेट आए। मेरे बगलगीर के पिता भी रिटायर्ड सिविल जज थे – उनकी सिफ़ारिश पर।

सत्यप्रिय और उनका परिवार बहुत ही मिलनसार था। मेरे 3 बच्चे उनके भी। मेरे भी 2 लड़कियां उनकी भी। सोच-विचार, रहन-सहन बहुत कुछ मिलता था- यहाँ तक की वेतन भी। सत्यप्रिय जी को मेरे साथ बैठकी बहुत रास आती थी। उन्हें भी क्लैसिक किताबों, पाश्चात्य संगीत और स्वादिष्ट भोजनों में रुचि थी। फर्क एक अवशय था । कारखाने के इंजीनियर के भ्रष्ट होने की गुंजाईश ना के बराबर थी। सत्यप्रिय जैसे मैजिस्ट्रेट को ईमानदार रहने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ती थी। उससे भी ज्यादा उन्हे ईमानदार दिखाये देने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती थी – अपने मातहतों से, अपनी बीबी-बच्चों से और मौजूदा न्यायायिक प्रणाली से। सबसे तो वे निपट सकते थी पर अपने बीबी-बच्चों से सामजस्य बैठाना बहुत टेढ़ी खीर थी।

टाउनशिप में 2 केन्द्रीय विद्यालय थे। वहाँ सत्यप्रिय के बच्चों का दाखिले आसानी से हो जाता। पर सोसाइटी के सब बच्चे इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ते थे। मेरे बच्चे भी रंग-बिरंगी यूनिफ़ॉर्म पहन कारखाने की बस से स्कूल जाते और बेवजह खेलते समय भी इंग्लिश में बातें करते। 1 महिना तो निर्णय लेने में लग गया। आखिरकार सत्यप्रिय ने अपनी मजबूरी मुझे बताई। वे चाहते थे की उनकी बड़ी बेटी का दाखिला कान्वेंट में हो जाये। इसके लिए वे 15 दिनों से अपनी बेटी से सिर्फ इंग्लिश में ही बातें कर रहे थे।

कान्वेंट का सत्र आरंभ हो चुका था। मैं उन्हे और उनकी बेटी को अपने स्कूटर में बैठाकर कान्वेंट ले गया। 11 किलोमीटर दूर था। बिटिया का इंग्लिश उच्चारण बहुत ही अच्छा था। एड्मिशन हो गया। उस समय केन्द्रीय विद्यालय की फीस मात्र 1 रुपये हुआ करती थी। कान्वेंट की फीस 60 रुपये थी। लौटते समय 2 जोड़ी यूनिफ़ॉर्म और जूते खरीदने में 500 रुपये हलकान हो गए। हमलोगों को प्रति बच्चे बस का मासिक किराया 10 रुपये देना पड़ता था। सत्यप्रिय को कार्पोरेशन की बस की इजाजत तो मिल गई पर वहाँ भी उन्हें 50 रुपये मासिक भाड़ा देना पड़ा। उनके चेहरे पर दर्दीली मुस्कुराहट मुझसे देखी नहीं जाती थी।

उनके घर कोर्ट से दिया एक नौकर 24 घंटे रहता। साथ ही सुबह-सुबह फ़ाइल लेने-लेजाने के लिए साइकल से एक चपरासी आता। सत्यप्रिय ने अपनी छोटी बेटी को पास के मोंटेसरी में दाखिला करवा दिया था। जब सब कोई जा चुके होते तो घर का काम-काज निबटा कर उनकी श्रीमती अपने गोद वाले बच्चे को लेकर मेरे घर आ जाती। कभी नौकर भेजकर मेरी श्रीमती को बुलवा भेजती। जो भी अच्छा बना होता वह एक दूसरे सांझा करते। शाम के समय सत्यप्रिय को मेरे साथ घूमना अच्छा लगता। उस समय हमलोग हर तरह की बातें करते- हर तरह की। हम दोनों को टहलते देख कोई भी समझ लेता की एक सरकारी अधिकारी है तो दूसरा इंजीनियर। सत्यप्रिय अपने पहनावे और रख-रखाव पर लेशमात्र भी कमी नहीं होने देते। बाल सँवरे हुए, फुलशर्ट और फुललपैंट पूरी क्रीज के साथ, जूता चमकता हुआ और आंखे स्थिर, दूर दृष्टि वाली।

कुछ दिनों से वे मेरे स्कूटर को आते-जाते निहारते रहते थे। मैं भाँप गया। पूछने पर मालूम हुआ की वह कचहरी दो किश्तों में आते जाते हैं। टाउनशिप से काली मंदिर, मेन रोड तक बस से तथा स्टेटस की खातिर वहाँ से कचहरी तक रिक्शे से। कुल मिलाकर एक दिन का 5 रुपया और महीने का 130 रुपया खर्च हो जाता है। मैंने उन्हें सुझाव दिया की इतने की EMI में तो स्कूटर आ जाएगा। उन्हें यह बात भा गई। बैंक से लोन लेकर उन्होने एक लेंबबरेटा स्कूटर ले लिया। एक हफ्ते में वे परिवार सहित पूरी रांची घूम आए। अपने सहयोगियों के घर भी हो आए। एक महीना आनन-फानन में बीत गया।

बेटी की पढ़ाई और स्कूटर के पेट्रोल के खर्च से उनका तलवार की धार पर चलने वाला बजट बुरी तरह बिगड़ने लगा। उनकी श्रीमती साहसी और समझदार थीं। वे चपरासी से कचहरी के पास आढ़त से रसद और सब्जी मंगाने लगीं। कहती उधर आधे दाम में मिल जाता था। गाँव से चावल आने लगा। बनिए का उधार होने लगा। मुश्किल तब होती थी जब कोई बाहरी मेहमान आ जाता अथवा गाहे-बगाहे कोई नया खर्च मंडराने लगता – मसलन बीमारी, बेटी के स्कूल का फंकशन और उसके लिए नए लिबास, अथवा कॉलेज में पढ़ते छोटे भाइयों की जरूरतें। कभी-कभी आपतस्थिति में मेरे परिवार से प्रगाढ़ता काम आती। हमलोगों को सत्यप्रिय जैसे ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ सरकारी अधिकारी सहायता करने में बहुत खुशी होती।

एक दिन मैं कचहरी के पास किसी काम से गया। ईच्छा हुई सत्यप्रिय जी का कोर्ट देखा जाए। वकील से मार्गदर्शन लिया। पेशकार सामने के दरवाजे के पास खड़ा था। वह मुझे पहचानता था। मैं चुपके से पिछले दरवाजे से उनके कोर्ट में आकर कोने की एक कुर्सी पर बैठ गया। पेशकार बुरी तरह व्यस्त था। वह वकीलों और दूसरों से कागज लेता, फ़ाइल के अंबार में कुछ खोजता और उसी पुर्जे में शायद तारीख लिख कर दे देता। हाथ मे छिपकर दी गई राशि को देखता और फ़ाइल ऊपर-नीचे कर देता। इससे ज्यादा मुझे कुछ समझ नहीं आया।

मैजिस्ट्रेट सत्यप्रिय बगल के कमरे से दाखिल हुए। सन्नाटा छा गया। 15 मिनटों में उन्होने दो जिरह और कई केस पर अपना निर्णय सुनाया। ज़्यादातर तारीख बढ़ाने का मामला दिखा। जिनकी तारीख बढ़ती वे पेशकार के पास जाते। एक बात तो तय थी। सत्यप्रिय बहुत अच्छी इंग्लिश बोलते थे और कोर्ट में उनका बहुत आदर था।

शाम को मैंने उन्हे बताया। उन्हे अपनी तारीफ बहुत अच्छी लग रही थी। हो भी क्यों न ! एक ईमानदार, जानकार और कर्तव्यनिष्ठ मैजिस्ट्रेट के लिए इससे ज्यादा आकर्षक बोनस और क्या हो सकता था।

देखते-देखते 3 वर्ष बीत गए। उनका तबदला हो गया। जैसा होता है बिछड़ने पर। मर्दों की आँखें गीली हुई। औरतें खूब रोयी। कुछ ऑफिस के फ़र्निचर थे। उसे मेरे पास रखवा, फ्लॅट को ताला लगा, उनका परिवार विदा हो गया।

अगले दिन वही चपरासी आया फ़र्निचर लेने। कायदे से हमलोगों ने उसे चाय व नाश्ता कराया। बातें भी हुई। वह सत्यप्रिय का गुणगान करते नहीं थक रहा था विशेषकर ईमानदारी की बारे में। मैंने चपरासी बाटाया की वह जो सब्जी और राशन लाता था उससे उनको बहुत मदद हो जाती थी। मैंने उससे आढ़त और दुकान का पता पूछा जिससे की मैं भी कभी-कभार व्होलसेल ले सकूँ।

चपरासी थोड़ा उदास हो गया। सब्जी और राशन सस्ता जरूर मिलता था पर उतना भी नहीं। हमलोग कोर्ट के स्टाफ सामान को मालकिन के बजट के लायक सस्ता कर देते थे।

Thursday, 26 March 2020

आसमान की सैर - भाग 2


अब आगे की कहानी ----

रौशनी, कुसुम और रोहित को मानो काठ मार गया हो । न जाने कितनी देर उधर ही एकटक देखते रहे जिधर किट्टू बह कर गया था । तन्द्रा तब टूटी जब मोहित ने पूछा – “दीदी ! किट्टू डूब गया ? किट्टू मर जाएगा ?” । उसके बाद दोनों बहने चिल्ला-चिल्ला कर रोने लगी । रोहित भी रोने लगा । अन्दर से माँ दौड़ते हुए आयी और रोने का कारण पूछा । किसी तरह रौशनी ने बताया । उस दिन तीनो रोते-सुबकते सो गए । मोहित को तो लगता था की किट्टू बचकर आ जाएगा । वह तो एक-दो बार बाहर झाँक भी आया । तीनों बिना खाए-पिए सो गए ।

बच्चों को हरदम ऐसा लगता की किट्टू बचकर आ जायेगा किसी भी क्षण । माँ-पिताजी ने कई बार उन्हें समझाने का प्रयत्न किया । उन्हें किट्टू की बहन रेक्सी भी लिवा लाने का सुझाव दिया । परन्तु उन्हें तो किट्टू चाहिए था, सिर्फ और सिर्फ किट्टू । इसी तरह उदास रहते और इन्तजार करते महीना बीत गया । हर रोज सुबह, आँख खुलते ही, बच्चे बरामदे पर आ जाते, किट्टू की आस में ।

किट्टू डूबा नहीं था । एक तो वह बिलकुल हल्का था और दूसरे उसे डूबते को तिनके का सहारा मिल गया था । उसे एक पेड़ की मोटी डाल मिल गयी थी । पानी का बहाव इतना तेज था कि वह थोड़े ही समय में मीलों दूर निकल गया । वह डूबते-उतराते मालूम नहीं कब सो गया या बेहोश हो गया उसे पता नहीं । सुबह उसने अपने को नदी के किनारे हंसों के झुण्ड के बीच पाया । हंस उस समय पानी में चोंच डुबाकर मछलियाँ पकड़ रहे थे । वे उन मछलियों को चोंच में दबाकर लाते और झुरमुट में पल रहे अपने बच्चों को निवाला बनाकर खिलाते । किट्टू को यह सब देखकर जोरों की भूख लग आयी । वह हिम्मत कर हंसों के झुण्ड के काफी नजदीक आ गया । किट्टू इतना छोटा था की हंसों को एकदम डर नहीं लगा । हंसों को मामला समझते देर नहीं लगी । वे सब किट्टू को भी खाने के लिए मछलियाँ परोसने लगे ।

किट्टू से एक बड़े हंस ने इशारे से पूछा की वह यहाँ आबादी से इतनी दूर कैसे आया । किट्टू ने भी इशारे-इशारे में लगभग सभी कुछ बता दिया । हंसों ने किट्टू को उनके पीछे-पीछे चलने को कहा । उनलोगों ने अपने घोसले के पास चट्टानों के बीच एक कन्दरा में छुपकर रहने को कहा । शाम ढलते जंगली सियार और कभी-कभी शेर-बाघ भी पानी पीने आते थे । सियार तो हंसों के अंडे-बच्चे खाने का भी इरादा रखते थे । हंसों का झुण्ड एकजुट होकर अपनी और अपने अंडे-बच्चों की रखवाली करते थे ।

शाम ढलते सभी हंस आपस में सलाह करने लगे कि किट्टू को उसके घर कैसे पहुंचाया जाये । उन्हें घर का पता भी नहीं मालूम था और ये भी नहीं की वह कितनी दूर है । बस उन्हें इतना मालूम था की किट्टू पश्चिम से पूरब की तरफ बह कर आया था । पश्चिम का सबसे नजदीकी गाँव 10 मील दूर था । हकीकत में किट्टू का घर उससे भी दूर शहर से सटे हुए गाँव में था । हंसों को कोई ऐसी तरकीब नजर नहीं आ रही थी जिससे किट्टू को सकुशल गाँव तक पहुँचाया जा सके । किट्टू को पैदल जाना पड़ता और हंस उड़ते हुए उसकी रखवाली करते । उसपर घर तलाश करना जोखिम से भरपूर था । पूरा रास्ता कम से कम एक-दो दिन में पूरा होता इसमें हादसा होने की बहुत गुंजाईश थी । जानवरों और पक्षियों से तो बचाया जा सकता था । मनुष्यों से बचाना बहुत मुश्किल था । शरारती बच्चों को कुत्तों पर पत्थर मारना अच्चा लगता था । कुछ मनुष्य तो कुत्ते को भी मार कर खा लेते थे । बहुत रात ढले ये निर्णय लिया गया की हंसों के मुखिया बुजुर्ग राजू काका से अगली सुबह सलाह ली जाए । वे नदी के उस पार रहते थे । उनके पास बहुत अनुभव था । वे कभी किसी को निराश नहीं करते थे ।

अगली सुबह सब बातें सुनने के बाद राजू काका ने बहुत सोच कर बताया । बहुत वर्ष पहले उनलोगों ने भी एक कछुए को सूखे तालाब से दूर नदी में बसने के लिए एक तरकीब लगाई थी । दो हंसों ने एक मजबूत डंडी का दोनों किनारा चोंच में पकड़ लिया था । कछुए ने डंडी को बीचो-बीच मुंह से पकड़ लिया था । कछुए को सख्त हिदायत दी गयी थी । वह उड़ते वक्त अपना मुंह कदापि नहीं खोलेगा । ऐसा करने से वह बहुत ऊचाई से नीचे गिर कर मर जाएगा । राहगीरों ने आकाश में डंडी से झूलते कछुए को देखा तो वह तरह-तरह के मजाक करने लगे । कछुए से रहा न गया । उसने मुंह खोल ही दिया । कछुए की दर्दनाक मौत हो गयी । राजू काका ने सोच-समझ कर ऐसी योजना बनायी जिसमें हादसा होने की कोई गुंजाईश नहीं थी । किट्टू को नदी किनारे बहते पॉलिथीन के थैले में रखा जय और उसका हत्था डंडी में फंसा दिया जाए । हंस डंडी का दोनों किनारा चोंच में दबाकर उड़ेंगे ।

इसी दौरान एक बहुत सुखद घटना हुई । नैना-मैना किट्टू को खोजते हंसो के झुरमुट के पास पहुँच गयी । सुबह के समय हंस मछली पकड़ रहे थे । किट्टू भी उनके साथ जलपान कर रहा था । मैना किट्टू को देखते ही चिल्लाई-“किट्टू ! किट्टू ऊ ऊ ऊ !” कित्तौ चिल्लाया-"नैना !" उस के बाद किट्टू और हंसों का नाचना और झूमना देखने लायक था । मैना ने किट्टू को घर का सभी हाल बताया । किट्टू के आँखों से आंसूं निकल आये । अब किट्टू किसी भी तरह अपने गाम जल्द से जल्द पहुँचना चाहता था ।

सभी कुछ योजनाबद्ध सुरक्षित तरीके से हुआ । सुबह की रात का समय चुना गया। मैना आगे, उसके पीछे किट्टू का यान , उसके पीछे तीर की शक्ल में 15 हंस । ठीक सुबह चार बजे किट्टू को फार्म के बगीचे में उतारा गया । पूरा इलाका सो रहा था । किसी मनुष्य ने यह उड़ान ना तो देखी और न उन्हें हल्ला करने का मौक़ा मिला । किट्टू उतरते ही कभी दौड़कर घर के दरवाजे तक जाता और कभी धन्यवाद देने हंसों के पास आता । हंसों ने किट्टू को मुंह में दबाई हुई मछली और कमल के फूल दिए । उनलोगों ने हमेशा मिलते रहने का वादा किया । पलक झपकते हंसों का काफिला रात के अन्धकार में आकाश में खो गया ।

सबसे पहले रौशनी को किट्टू के भूँकने और दरवाजा खरोचने की आवाज सुनायी दी । उसे लगा वह फिर रोहित की तरह सपना देख रही है । तभी बॉबी मैना ने कुहुंक लगाई- “देखो देखो किट्टू आया है ।” इसे तीनो बच्चों ने सुना और माँ-पिताजी ने भी । सभी दरवाजा खोलने दौड़ पड़े । पिताजी ने दरवाजा खोला । किसी को विश्वास नहीं हो रहा था । उस सुबह माँ-पिताजी ने बच्चों को बिस्तर पर किट्टू के बैठने और लाड-प्यार पर कोई ऐतराज नहीं किया ।

सुबह बच्चे स्कूल नहीं गए । बगीचे में किट्टू को तरह-तरह के स्नैक्स खिलाते रहे और खेलते रहे । किट्टू बार-बार उन्हें वह डंडी और और उससे बंधे थैले के पास ले जाता और आकाश की ओर दिखाता । नैना मैना भी टूटी-फूटी पर बहुत ही मधुर आवाज में कुछ बोलती । जो हुआ वह बिलकुल अकल्पनीय और अविश्वनीय था । कोई कैसे समझता ।

दूसरी सुबह अखबारों में यह प्रकाशित हुआ । 6 माह का पोमेरेनियन किट्टू कैसे बाढ़ की उफनती नदी में बहता हुआ दूर तक निकल गया और मीलों का सफ़र एक महीने में पूरा कर रौशनी, कुसुम और रोहित की महक पकड़ता हुआ घर तक पहुँच गया । किट्टू की बच्चों के साथ तस्वीर भी छपी थी । बहुत दिनों तक लोग किट्टू को देखने आते रहते थे ।

इस घटना को पांच वर्ष गुजर गए । आजकल किट्टू क्रिकेट में अंपायरिंग भी करने लगा है । काला हैट और हरा चश्मा लगाकर बिकुल ललनटॉप लगता है ।