Wednesday, 17 April 2013

ये मेरा जंगल ! वो तुम्हारा जंगल ! - १



 वनस्पतियों से भरे-पूरे, जानवरों की विविधता और बहुतायता से महकते और गूंजते वन-प्रांत हमारी प्रकृति की प्राकृतिक देन थी. अब हमलोग मानव सभ्यता से परे इस क्षेत्र को जंगल कहते हैं जिसपर हमलोगों का शासन कम ही चलता है. इस युग के अशांत, असभ्य, शोरगुल और अविश्वास से भरे मानव सभ्यता से ओत-प्रोत गाँवों-कस्बों और शहरों को पथरीले जंगल से कम क्या कहा जा सकता है ? सभ्यता तो उन्ही जंगलों में दिख रही है जिसकी प्राकृतिक सम्पदा आज भी सुरक्षित है. वहां आज भी सबकुछ प्राकृतिक नियमों के अनुसार ही हो रहा है.
ऐसे ही एक प्राकृतिक जंगल में शेर के दो जुडवा बच्चे अपनी माँ शेरनी के साथ रहते थे. पिता शेर कभी-कभी ही मिलने आते थे. चार महीने के ये बच्चे जिनका नाम माँ ने बड़े प्यार से राम और श्याम रखा था, तबतक उधम मचाते रहते थे जबतक नींद न आ जाये. बड़ा शांत और गंभीर था पर छोटा बहुत शरारती. एक बार तो पिता शेर ने उसकी पिटाई भी कर दी थी जब उसने सोते हुए उनकी मूछें खींची थीं.
राम-श्याम को आस-पास खेलना बहुत अच्छा लगता था. एक छिप जाता था तो दूसरा उसे खोज निकालता था. एक दिन दोनों खेलते-खेलते बहुत दूर निकल आये. छोटकू श्याम तो भागते-भागते जंगल को चीरती काली भयावनी पट्टी के पार चालला गया . उस काली पाटती पर गोलनुमा पंजों पर लुढ़कते हाथी और भैंसे जैसी आकृति आ-जा रही थी. माँ ने इस काली पट्टी से दूर रहने को कहा था और ये भी कहा था कि इन जानवारों के अन्दर दुनिया के सबसे बदमाश दो पैरों वाले जानवर छिपे रहते हैं.
श्याम बहुत डरा हुआ था. उसे मालूम ही नहीं पड़ा कि कब वह खेल के जोश में पट्टी के पार आ गया. अब लौटने में बहुत डर लग रहा था. राम भी झुरमुट में छिपा सहमा-सहमा सबकुछ देख रहा था. जब पट्टी पर सन्नाटा चा गया तब राम ने श्याम को इस पार जल्दी से आ जाने को कहा. पर जैसे ही श्याम पट्टी के बीच में आया एक भयंकर मुंह वाला हाथी चिन्घारते हुए सामने आ खड़ा हुआ. जबतक श्याम में भाग जाने की शक्ति आती, उस हाथी में से दो पैर वाला जानवर निकला और उसे गर्दन से पकड़ कर हाथी के अन्दर ले जाकर चेन से बाँध दिया. राम उस घरघराती आवाज करने वाले हाथी में श्याम को जाता देखता रहा.
शेरनी माँ दोनों बच्चों का खाने पर बहुत देर से 
इन्तजार कर रही थी. राम को मुंह लटकाए रोता हुआ देख कर वह बहुत घबडा गयी. राम ने सुबकते हुए सब-कुछ बताया. माँ तो एकदम सन्नाटे में आ गयी. दौड़ती हुई काली पट्टी पर आ गयी. हाथियों के गोल पैरों के निशान का पीछा करते बहुत दूर तक चली गयी. जहां पत्थरों का जंगल शुरू होता था. जिसमे दो पैर वाले बहुत ही हिंसक जानवर रहते थे. पर अपने जंगले में तो एक महक से किसी का भी पता चल जाता था. इस पत्थर के जंगल में जहां तरह-तरह के गोल पैरों वाले जानवर दौड़ा करते थे और भयंकर बदबूदार प्रदूषण फैलाते थे, वहां कोई भी महक पहचानना असंभव था. बहुत दिनों तक कभी अकेले कभी राम के साथ, शाम के धुन्धलानें के बाद घंटो ऊंचाई से उस आग की रौशनी से दमकते पत्थर के जंगल को निहारती रहती थी कि शायद कहीं उसका प्यारा मुन्ना दिख जाये. एक-दो बार तो वह उस भयावह पथरीले जंगल के अन्दर तक खोज आई. पर राम उसके पीछे आ जाता था और वह राम को भी खोना नहीं चाहती थी. हाय रे माँ का दिल ! शायद वह मरते दम तक इस तरह निहारना नहीं छोड़ेगी.   
To be continued…miles to go….

No comments:

Post a Comment