रौशनी, कुसुम और
रोहित शहर से थोड़ी दूर नदी के
किनारे फार्म हाउस में रहते थे । शहर की हवेली में उनके बड़े पापा रहते थे । इनके
पिताजी को फार्म हाउस और खेत की देखभाल की जिम्मेवारी दी गयी थी इसीलिये । रौशनी
सबसे बड़ी 10 वर्ष की थी । कुसुम उससे
छोटी 7 वर्ष की थी । रोहित सबसे
छोटा 4 वर्ष का था । इनका स्कूल
भी नजदीक ही था स्कूल आने-जाने के लिए बस थी । रौशनी, कुसुम और
रोहित के लिए तो फार्म हाउस
स्वर्ग से भी ज्यादा सुन्दर था । खूब सारे फल के पेड़ थे । आम और लीची के पेड़ तो
इतने छोटे थे की बच्चे खुद ही चढ़ कर या हाथ बढाकर फल तोड़ लेते । उससे ज्यादा आनंद
डॉल-पात खेलने में आता था । फार्म हाउस के उत्तर की तरफ नदी बहती थी । घर से मात्र 1 मील
दूर । नदी का रास्ता कच्चा था । दोनों तरफ पेड़ों की भरमार थी । कुछ दूर जाने पर
रास्ता बलुआही मिटटी से बहुत मुलायम और गुदगुदी करने वाला हो जाता था । नदी का
किनारा पूरा बालुमय था जो धीरे-धीरे नदी के पानी में खो जता था । बरसात को छोड़कर, नदी का
निर्मल पानी बहुत दूर तक बस घुटने भर ही रहता था । पूरी गर्मी-छुट्टी की दोपहर आम
के बगीचे में या नदी में मस्ती करते गुजरती थी । पहले तो नदी तक नौकर भी आता था
नजर रखने के लिए पर अब पूरी आज़ादी थी । रविवार और दूसरी छुट्टियो में या तो रौशनी, कुसुम और
रोहित शहर के घर में आ जाते थे
अथवा बड़े पापा के बच्चे फार्म हाउस आ जाते थे । बड़े पापा के 3 संतान थी । दो
लड़के और 1 लडकी । नाम था उज्जवल, मोहित और लड़की का नाम था मैना। बताने
की आवश्यकता नहीं है की जब 5-6-बच्चे
एक जगह हों तब कितना हंगामा होता होगा । दिनभर तरह-तरह के खेल खेले जाते जैसे
डॉल-पात, इक्कड़-दुक्कड़, पिट्टो, आस-पास
क्रिकेट और अन्ताक्षणी भी । चचेरे भाई-बहनों के साथ रौशनी, कुसुम और
रोहित भी क्रिकेट खेलना सीख गए । रौशनी तो बड़े होकर देश के लिए क्रिकेट खेलने का सपना भी देखने लग गयी थी ।
एक बार क्रिसमस की छुट्टी
में रौशनी, कुसुम और
रोहित बड़े
पापा के घर शहर गए तीन दिन के लिए । वहां तो इस बार बात ही दूसरी थी । ऐसी मजेदार
की सबलोग खाना-खेलना भी भूल गए । पोमेरेनियन काजल ने दो बहुत ही सुन्दर बच्चों को
जन्म दिया था । मखमली रोयेदार भूरा शरीर, चमकती काली-काली आँखें, और
सबसे सुखद बच्चों जैसा गोद में दुबकना । काजल दूसरे किसी बड़े को बच्चों के
पास तक नहीं फटकने देती थी पर रौशनी, कुसुम और रोहित के साथ
खेलना उसे भी बहुत अच्छा लगता था । उन सात दिनों में काजल के दोनों नन्हे-मुन्नों
के लिए रहने-खाने का बढ़िया इंतजाम हो गया । सर्दी न लगे इसलिए दोनों को रोहित का
पुराना स्वेटर भी पहना दिया गया । दोनों बच्चों में लड़के का नाम किट्टू रखा गया और
लडकी का नाम रेक्सी रखा गया । किट्टू तो कुसुम को एक मिनट भी छोड़ना नहीं चाहता था
जबकि रेक्सी ज्यादा अपनी माँ काजल के पास रहना पसंद करती थी । जिस दिन लौटना था उस
दिन बच्चे अपनी माँ से मिन्नतें करते रहे । पिताजी के पास जाने की किसी की हिम्मत
नहीं हो रही थी । देखते-देखते लौटने का समय आ गया । माँ-पिताजी कार में बैठे
बच्चों का इन्तजार करते थक गए । आखिर माँ को बच्चों के न आने की वजह बतानी पड़ी ।
गुस्से में लाल-पीले होते पिताजी कार से उतर कर बच्चों को डांट-फटकार लगाने बरामदे
तक आ गए । बड़ी माँ शुरू से सभी कुछ देख रही थीं । वे भी चाहती थी की एक बच्चा दे
दिया जाये । उनके समझाने पर पिताजी मान गए । बच्चे उछलते-कूदते किट्टू के साथ कार
में आकर बैठ गए ।
रौशनी और मोहित दोनों कुसुम को बहुत प्यार करते थे । इसलिए कुसुम ही किट्टू को हरदम अपने पास रखती थी, एक
खिलोने की तरह या एक बच्चे की तरह । बस माँ ने एक सख्त हिदायत दी थी की किट्टू
बिस्तर पर कदापि नहीं चढ़ेगा । इसलिए किट्टू का बिस्तर एक बड़े कार्टन में सजाकर कुसुम के बिस्तर के पास लगा दिया गया ।
सभी बच्चे स्कूल जाने के
पहले एक घंटे किट्टू के साथ खेलते ।स्कूल 5 घंटे का होता। कहना न होगा यह अंतराल बच्चों और किट्टू दोनों
के लिए बहुत दुखदायी होता था । रौशनी, कुसुम और रोहित को तो स्कूल
में बहुत से सहपाठी मिल जाते थे खेलने और मस्ती करने के लिए । किट्टू घर में अकेला
रह जाता था । जल्दी ही किट्टू को भी बगीचे के पेड़ पर बैठी मैना मिल गयी खेलने के
लिए । मैना जब भी पेड़ से उतर कर घास में छुपे कीड़े और दाने चुगती, किट्टू
उसे दौडाने लगता । मैना भी किट्टू को इधर-उधर बैठकर छकाती रहती । कुछ दिनों के बाद
दोनों में अच्छी-खासी दोस्ती हो गयी । मैना किट्टू को मीठे-मीठे गाने सुनाती ।
दोनों एक दूसरे का नाम भी जान गए थे । कभी किट्टू नहीं दिखता तो उसे आवाज़ देकर
बुलाती-“किट्टू
! किट्टू ऊ ऊ ऊ !” किट्टू
भी जब उसे नहीं खोज पाता तो उसे पुकारता- नैना ! नैना आ ! कित्तौ मैना को मैना नहीं बोल पता था। मैना ऊपर झुरमुट से उतर
कर पास की डाल पर आकर बैठ जाती । बच्चों ने मैना का नाम नैना रख दिया था।
स्कूल
से लौट कर तो अँधेरा होने तक किट्टू बच्चों के साथ रहता । शुरू-शुरू में वह
दौड़-दौड़ कर बच्चों के पैर के पास आ जाता था । बाद में वह गेंद के साथ खेलने लगा ।
बहुत जल्द ही उसने दौड़ कर फेंके हुए गेंद को मुंह में पकड़ना सीख लिया । रौशनी, कुसुम और
रोहित में से जो भी आवाज लगाता उसके पैर के पास लाकर गेंद रख देता और दुबारे गेंद
फेंके जाने का इन्तजार करने लगता ।
देखते-देखते 6 महीने
बीत गए । बरसात आ गयी । इस बार बरसात भी घनघोर आयी थी । नदी का पानी उफान पर था ।
बाढ़ का पानी बरामदे के नीचे तक आ गया था । कभी-कभी जोरों का बहाव आ जाता था ।
बच्चों को सख्त हिदायत थी घर के अन्दर रहने की । दालान से लगा हाल था । वहीं बच्चे
कभी लूडो खेलते, कभी
कैरम खेलते, कभी
कोना-कोनी खेलते तो कभी किट्टू के साथ गेंद खेलते ।
एक दोपहर, बाढ़ का
पानी बरामदे को भिंगाता हुआ बड़ी जोर से बह रहा था । बच्चे हॉल में चारों कोने पकड़
किट्टू को गेंद से छका रहे थे । बड़ी मुश्किल से गेंद किट्टू के कब्जे में आती ।
खेल के दौरान, एक बार
गेंद हॉल से उछल कर तेजी से बरामदे की ओर निकल गयी । किट्टू गेंद के पीछे दौड़ा ।
गेंद बरामदे से लुढ़क कर बाढ़ के पानी में जा गिरी और तेजी से बहने लगी । किट्टू ने
गेंद पकड़ने के लिए बाढ़ के पानी में छलांग लगा दी । किट्टू के पीछे बच्चे भी भागते
हुए आये । उन्होंने जो देखा उससे वे पत्थर जैसे खड़े के खड़े रह गए । दूर, बहुत
दूर किट्टू बहता हुआ जा रहा था । किट्टू देखते-देखते आँखों से ओझल हो गया ।
अभी और है -----
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