Saturday, 17 March 2018

आसमान की सैर -भाग 1



रौशनी, कुसुम और रोहित  शहर से थोड़ी दूर नदी के किनारे फार्म हाउस में रहते थे । शहर की हवेली में उनके बड़े पापा रहते थे । इनके पिताजी को फार्म हाउस और खेत की देखभाल की जिम्मेवारी दी गयी थी इसीलिये । रौशनी सबसे बड़ी 10 वर्ष की थी । कुसुम उससे छोटी वर्ष की थी । रोहित सबसे छोटा वर्ष का था । इनका स्कूल भी नजदीक ही था स्कूल आने-जाने के लिए बस थी । रौशनीकुसुम और रोहित के लिए तो फार्म हाउस स्वर्ग से भी ज्यादा सुन्दर था । खूब सारे फल के पेड़ थे । आम और लीची के पेड़ तो इतने छोटे थे की बच्चे खुद ही चढ़ कर या हाथ बढाकर फल तोड़ लेते । उससे ज्यादा आनंद डॉल-पात खेलने में आता था । फार्म हाउस के उत्तर की तरफ नदी बहती थी । घर से मात्र मील दूर । नदी का रास्ता कच्चा था । दोनों तरफ पेड़ों की भरमार थी । कुछ दूर जाने पर रास्ता बलुआही मिटटी से बहुत मुलायम और गुदगुदी करने वाला हो जाता था । नदी का किनारा पूरा बालुमय था जो धीरे-धीरे नदी के पानी में खो जता था । बरसात को छोड़करनदी का निर्मल पानी बहुत दूर तक बस घुटने भर ही रहता था । पूरी गर्मी-छुट्टी की दोपहर आम के बगीचे में या नदी में मस्ती करते गुजरती थी । पहले तो नदी तक नौकर भी आता था नजर रखने के लिए पर अब पूरी आज़ादी थी । रविवार और दूसरी छुट्टियो में या तो रौशनीकुसुम और रोहित शहर के घर में आ जाते थे अथवा बड़े पापा के बच्चे फार्म हाउस आ जाते थे । बड़े पापा के 3 संतान थी  । दो लड़के और 1 लडकी   नाम था उज्जवल, मोहित और लड़की का नाम था मैना। बताने की आवश्यकता नहीं है की जब 5-6-बच्चे एक जगह हों तब कितना हंगामा होता होगा । दिनभर तरह-तरह के खेल खेले जाते जैसे डॉल-पातइक्कड़-दुक्कड़पिट्टोआस-पास क्रिकेट और अन्ताक्षणी भी । चचेरे भाई-बहनों के साथ रौशनीकुसुम और रोहित भी क्रिकेट खेलना सीख ग । रौशनी तो बड़े होकर देश के लिए क्रिकेट खेलने का सपना भी देखने लग गयी थी ।
एक बार क्रिसमस की छुट्टी में रौशनीकुसुम और रोहित बड़े पापा के घर शहर गए तीन दिन के लिए । वहां तो इस बार बात ही दूसरी थी । ऐसी मजेदार की सबलोग खाना-खेलना भी भूल गए । पोमेरेनियन काजल ने दो बहुत ही सुन्दर बच्चों को जन्म दिया था । मखमली रोयेदार भूरा शरीरचमकती काली-काली आँखेंऔर सबसे सुखद बच्चों जैसा गोद में दुबकना । काजल दूसरे किसी बड़े को बच्चों के पास तक नहीं फटकने देती थी पर रौशनीकुसुम और रोहित के साथ खेलना उसे भी बहुत अच्छा लगता था । उन सात दिनों में काजल के दोनों नन्हे-मुन्नों के लिए रहने-खाने का बढ़िया इंतजाम हो गया । सर्दी न लगे इसलिए दोनों को रोहित का पुराना स्वेटर भी पहना दिया गया । दोनों बच्चों में लड़के का नाम किट्टू रखा गया और लडकी का नाम रेक्सी रखा गया । किट्टू तो कुसुम को एक मिनट भी छोड़ना नहीं चाहता था जबकि रेक्सी ज्यादा अपनी माँ काजल के पास रहना पसंद करती थी । जिस दिन लौटना था उस दिन बच्चे अपनी माँ से मिन्नतें करते रहे । पिताजी के पास जाने की किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी । देखते-देखते लौटने का समय आ गया । माँ-पिताजी कार में बैठे बच्चों का इन्तजार करते थक गए । आखिर माँ को बच्चों के न आने की वजह बतानी पड़ी । गुस्से में लाल-पीले होते पिताजी कार से उतर कर बच्चों को डांट-फटकार लगाने बरामदे तक आ गए । बड़ी माँ शुरू से सभी कुछ देख रही थीं । वे भी चाहती थी की एक बच्चा दे दिया जाये । उनके समझाने पर पिताजी मान गए । बच्चे उछलते-कूदते किट्टू के साथ कार में आकर बैठ गए ।

रौशनी और मोहित दोनों कुसुम को बहुत प्यार करते थे । इसलिए कुसुम ही किट्टू को हरदम अपने पास रखती थीएक खिलोने की तरह या एक बच्चे की तरह । बस माँ ने एक सख्त हिदायत दी थी की किट्टू बिस्तर पर कदापि नहीं चढ़ेगा । इसलिए किट्टू का बिस्तर एक बड़े कार्टन में सजाकर कुसुम के बिस्तर के पास लगा दिया गया ।

सभी बच्चे स्कूल जाने के पहले एक घंटे किट्टू के साथ खेलते ।स्कूल 5 घंटे का होता।  कहना न होगा यह अंतराल बच्चों और किट्टू दोनों के लिए बहुत दुखदायी होता था । रौशनीकुसुम और रोहित को तो स्कूल में बहुत से सहपाठी मिल जाते थे खेलने और मस्ती करने के लिए । किट्टू घर में अकेला रह जाता था । जल्दी ही किट्टू को भी बगीचे के पेड़ पर बैठी मैना मिल गयी खेलने के लिए । मैना जब भी पेड़ से उतर कर घास में छुपे कीड़े और दाने चुगतीकिट्टू उसे दौडाने लगता । मैना भी किट्टू को इधर-उधर बैठकर छकाती रहती । कुछ दिनों के बाद दोनों में अच्छी-खासी दोस्ती हो गयी । मैना किट्टू को मीठे-मीठे गाने सुनाती । दोनों एक दूसरे का नाम भी जान गए थे । कभी किट्टू नहीं दिखता तो उसे आवाज़ देकर बुलाती-किट्टू ! किट्टू ऊ ऊ ऊ !” किट्टू भी जब उसे नहीं खोज पाता तो उसे पुकारता- नैना ! नैना आ ! कित्तौ मैना को मैना नहीं बोल पता था। मैना ऊपर झुरमुट से उतर कर पास की डाल पर आकर बैठ जाती । बच्चों ने मैना का नाम नैना रख दिया था। 
स्कूल से लौट कर तो अँधेरा होने तक किट्टू बच्चों के साथ रहता । शुरू-शुरू में वह दौड़-दौड़ कर बच्चों के पैर के पास आ जाता था । बाद में वह गेंद के साथ खेलने लगा । बहुत जल्द ही उसने दौड़ कर फेंके हुए गेंद को मुंह में पकड़ना सीख लिया । रौशनीकुसुम और रोहित में से जो भी आवाज लगाता उसके पैर के पास लाकर गेंद रख देता और दुबारे गेंद फेंके जाने का इन्तजार करने लगता ।
मजा तो अब आने वाला था । रविवार को शहर से चचेरे भाई-बहन आये । क्रिकेट का खेल शुरू हुआ । किट्टू को मात्र दर्शक बनकर बैठना बहुत ही उबाऊ लगा । एक बार जब गेंद उसकी तरफ आया तो उसने उसे मुंह से झपट लिया और गेंद बॉलर को न दे बैटिंग करती कुसुम के पैरों के पास लाकर रख दिया । अब क्या था, सभी बच्चे किट्टू को फील्डर बनाने में एकजुट हो गए । शाम ढलते-ढलते किट्टू ने विकेट के पीछे थर्डमैन के एरिया की कमान संभाल ली । उधर सबसे ज्यादा गेंद जाती था । वह गेंद मुंह में पकड़ कर बालर के पैरों के पास लाकर रख देता । इस तरह उसने बहुत रन बचाए । पुरस्कार में उसे बच्चे अपने पास की बिस्कुट खाने को देते ।

देखते-देखते महीने बीत गए । बरसात आ गयी । इस बार बरसात भी घनघोर आयी थी । नदी का पानी उफान पर था । बाढ़ का पानी बरामदे के नीचे तक आ गया था । कभी-कभी जोरों का बहाव आ जाता था । बच्चों को सख्त हिदायत थी घर के अन्दर रहने की । दालान से लगा हाल था । वहीं बच्चे कभी लूडो खेलतेकभी कैरम खेलतेकभी कोना-कोनी खेलते तो कभी किट्टू के साथ गेंद खेलते ।

एक दोपहरबाढ़ का पानी बरामदे को भिंगाता हुआ बड़ी जोर से बह रहा था । बच्चे हॉल में चारों कोने पकड़ किट्टू को गेंद से छका रहे थे । बड़ी मुश्किल से गेंद किट्टू के कब्जे में आती । खेल के दौरानएक बार गेंद हॉल से उछल कर तेजी से बरामदे की ओर निकल गयी । किट्टू गेंद के पीछे दौड़ा । गेंद बरामदे से लुढ़क कर बाढ़ के पानी में जा गिरी और तेजी से बहने लगी । किट्टू ने गेंद पकड़ने के लिए बाढ़ के पानी में छलांग लगा दी । किट्टू के पीछे बच्चे भी भागते हुए आये । उन्होंने जो देखा उससे वे पत्थर जैसे खड़े के खड़े रह गए । दूरबहुत दूर किट्टू बहता हुआ जा रहा था । किट्टू देखते-देखते आँखों से ओझल हो गया ।
अभी और है -----



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