Saturday, 22 September 2018

तुम्हारा खून खून है, हमारा खून पानी

बैजू बावरा और तानसेन की यह कहानी इतिहास के पन्नों में हूबहू तो नहीं मिलतीपर उत्तरभारत की किंवदंतियों में यह क़िस्सा बड़ा ही मशहूर है. कैसे सर्वश्रेष्ठ गायक होने के अकबर के नौरत्नों में से एक तानसेन के घमंड को बैजू बावरा नामक एक नवयुवक ने चूर-चूर कर दिया था. कहानियों  के माध्यम से नैतिक शिक्षा देने के लिए मशहूर  लेखक सुदर्शन ने बैजू के तानसेन से बदला लेने की इस कहानी को अपने ही अनूठे अंदाज़ में लिखी है.

“आदर्श बदला” नामक कहानी हमलोगों के नवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में थी   इस कहानी का मेरे चरित्र निर्माण पर अच्छा-खासा असर पडा  कहानी कुछ इस प्रकार याद आ रही है 

शहंशाह अकबर का राज्य था  उनके नवरत्नों में से एक संगीत सम्राट तानसेन थे  उन्हें अपने संगीत के ज्ञान और अनुभव पर घमंड हो गया था  उसपर, चाटुकारों ने इस घमंड से उन्हें अँधा सा बना दिया था  उन्होंने घोषणा कर रखी थी कि शहर में कोई भी नहीं गायेगा  नियम तोड़ने पर उसे तानसेन से संगीत का मुकाबला करना होगा  जो भी जीतेगा उसे नवरत्न का ओहदा मिलेगा । जो भी हारेगा उसे मृत्यु दंड झेलना पड़ेगा  शहंशाह अकबर मियाँ तानसेन का बहुत आदर-सम्मान करते थे  उन्हें इस परवान पर ऐतराज नहीं हुआ पर चिंतित अवश्य हुए  शहर में कोई चोरी-छिपे भी गाना गाने की हिम्मत नहीं करता था  अब न कहीं मजलिसें जमती थी, न मंदिरों में भजन-कीर्तन हुआ करते थे और न नातिया कव्वाली ही सुनने को मिलती थी 
एक सुबह, शहर के एक कोने से भजन-कीर्तन की आवाज आती सुनी गयी  यह संगीत धीमे-धीमे महल की ओर बढ़ रहा था लोगों ने देखा एक बूढ़े साधू के साथ एक 10 वर्ष का बालक भजन गाते बढ़ रहे थे  बाबा बहुत ही मधुर स्वर में ढोलक की ताल पर राग भैरवी पर कृष्ण का भजन गा रहे थे  बालक झाल बजाते हुए उस गीत में साधू बाबा का साथ दे रहा था  जबतक लोग उन्हें मना कर पाते, नगर के सिपाही बाबा और बालक को पकड़ कर संगीत सम्राट तानसेन की हवेली ले गए 
तानसेन के दरबार में साधु की पेशी हुई  उन्हें गीत व् भजन गाने के सम्बन्ध में बना कानून सुनाया गया  साधु को तानसेन के साथ संगीत मुकाबले के लिए बार-बार ललकारा गया  साधु बाबा तो भगवान् के लिए भजन गाते थे  उन्हें इन प्रतिस्पर्धाओं से कोई लेना-देना नहीं था । कानून के मुताबिक साधु बाबा को फांसी दे दी गयी ।  उनके साथ का बालक अनाथ हो गया. वह रोते- रोते  जगल में अपनी कुटिया  चला गया  तानसेन के भय से किसी ने भी उस बालक की सहायता नहीं की  लोग साधु बाबा और उस अनाथ बालक को  बरसों भूल  नहीं  पाए . 
तानसेन का कानून बरकरार रहा  शहंशाह  अकबर  को तानसेन का संगीत सुनने के बाद ही नींद आती थी  इस कारण यह जानते हुए भी तानसेन ठीक नहीं कर रहे हैं वे कुछ भी नहीं बोलते थे शहर में कोई भी निवासी गाना नहीं गाता था, उत्सव और त्योहारों में भी नहीं  
देखते-देखते १५ वर्ष बीत गए  शहर के निवासी संगीत और नाच-गाना बिलकुल भूल चुके थे  जब कभी वे शहर से बाहर जाते तभी संगीत सुनते अथवा गाते  
एक दिन सुबह गजब हो गया  शहर के निवासियों को लगा कि वे कोई सपना देख रहे हैं  कुछ ही देर में उनका सत्य से सामना हो गया  एक बहुत  सुन्दर युवक करताल की ताल पर बहुत ही सुरीला और शास्त्रीय गीत गाता हुआ महल की और बढ़ रहा था घर से बाहर लोग निकलते  उसके महल की ओर उठते कदम को रोकना चाहते  परन्तु, उस युवक में गीत में जादू था  लोग मदहोश हो उसके संगीत का आनंद लेने लगते । वे ठगे से खड़े के खड़े रह जाते  वह युवक गाते-गाते ठीक महल के द्वार पर आकर खड़ा हो गया  तानसेन उस समय सूर्योदय का आनंद ले रहे थे संगीत की तान ने उन्हें भौचक कर दिया  कंगूरे से नीचे देखा ।  द्वार-रक्षक एक युवक को रस्से से बाँध कर कैदखाने की तरफ ले जा रहे थे  युवक तब भी अपने संगीत में मस्त था  
तानसेन ने नींद की तान सुनाकर उस रात अकबर को तो सुला दिया पर उसे खुद रात भर  नींद नहीं आयी  उस युवक का  संगीत कहीं से भी बेसुरा नहीं था  अगर वह युवक इसी तरह रियाज करता रहा तो एक दिन वह नवरत्नों में होगा  उसे संगीत में पराजित करना बहुत जरूरी था  उसे जिन्दगी से नेस्तनाबूद करना उससे भी ज्यादा जरूरी  
दूसरे दिन तानसेन का दरबार लगा  सबसे पहले उस युवक को मुश्क में बाँध कर दरबार में हाजिर किया गया  वह अब भी प्रसन्न लग रहा था  होठों में मुस्कराहट के साथ कोई गीत गुनगुना रहा था  वह भरे-पूरे दरबार को इस तरह देख रहा था जैसे किसी मेले में आया हो ।  
युवक को फरमान सुनाया गया । उससे पूछा गया कि क्या वह संगीत स्पर्धा के लिए तैयार है  संगीत सम्राट तानसेन ने युवक की कमसिन उम्र को देखकर थोड़ी रहम दिखाई । उन्होंने कहा कि अगर युवक अपनी गलती स्वीकार कर ले और संगीत से पूरी तरह नाता तोड़ ले तो उसकी जान बख्श दी जायेगी  युवक ने प्रसन्न-वदन कहा की वह प्रतिस्पर्धा के लिए ही १५ वर्ष से तपस्या कर रहा था  वह संगीत सम्राट तानसेन से मुकाबले  लिए तैयार है युवक का एक ही आग्रह था कि स्वयं शहंशाह इस स्पर्धा के निर्णायक हों  बरसों से कोई संगीत सम्मलेन नहीं हुआ था शहंशाह सहर्ष तैयार हो गए. मुकाबले की तारीख और जगह नियत की गयी. पूरे चाँद के दिन यमुना नदी के किनारे ।
मुकाबले के दिन सुबह से भीड़ उमड़ पड़ी थी. शहंशाह के दायीं तरफ तानसेन के बैठने की जगह मुक़र्रर थी  युवक बैजू जिसे अब लोग बैजू बावरा कहने लगे थे उसे बाएं तरफ की जमीन मिली  
मुकाबला शुरू हुआ  तानसेन ने राग मालकौंस में एक भजन गाया  बैजू ने उसी राग में एक स्तुति सुनायी  हरेक बार शुरुआत तानसेन करते और बैजू उसे सही ढंग से दोहराते  देखते-देखते दोपहर हो गयी  जेठ की गर्मी लोगों को झुलसा रही थी तभी तानसेन ने राग मल्हार छेड़ा  आसमान में बादल उमड़ आये और वर्षा होने लगी  वातावरण सुहावना हो गया  शाम होने लगी थी  अन्धेरा छाने लगा था  बैजू राग दीपक गाने लगा । थोड़ी ही देर में चारो तरफ रखे दीपक अपने-आप जलने लगे  हरबार दोनों की आजमाईशों का तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत होता 
शहंशाह ने एलान किया की चुकी ज्यादा रात होने लगी है इसलिए अब आखिरी आजमाईश होनी चाहिए  इस बार बैजू ने कोई नया राग छेड़ा  कुछ ही देर में दो हिरण जंगल से निकल कर थिरकते हुए बैजू के पास आकर खड़े हो गए  बैजू ने दोनों हिरणों के गले में पास में पड़ी माला डाली और पीठ थपथपा कर लौटने का इशारा किया  अब बारी तानसेन की थी  जाहिर है उन्हें हिरण को वापिस बुलाना था  तानसेन ने भी बैजू का गाया राग छेड़ा  कहीं कोई कमी खटक रही थी  राग में वैसी मिठास और भावना नहीं दिख रही थी  बहुत कोशिश के बावजूद हिरण वापिस नहीं आये  तानसेन का गला सूख गया  आवाज भर्राने लगी  कुछ देर में कंठ से आवाज निकलनी भी बंद हो गयी  शायद पराजित होने का भय होने लगा था 
बैजू ने मुकाबले का अंत पुनः वही राग दोहरा कर किया । हिरण दोबारे फुदकते चले आये  बैजू ने माला उतार ली और हिरणों को पुचकारते हुए विदा कर दिया  बैजू ने एक माला शहंशाह के क़दमों के पास रखी  दूसरी माला तानसेन के चरणों के पास रखी । उसके बाद तीन कदम पीछे जाकर शीश नवाकर विनम्रता से खड़े हो गया । 
शहंशाह अकबर का इन्साफ चारों दिशाओं में मशहूर था  उन्होंने बैजू के लिए नवरत्न की उपाधि का एलान किया  तानसेन के लिए उन्होंने भरे गले से मृत्यु-दंड की सजा सुनायी  
बैजू ने बादशाह से इजाजत लेकर अदब के साथ याद दिलाया कि आज से 15 वर्ष पहले बैजू के बाबा को इसी कारण फांसी दे दी गयी थी  उसे न तो नवरत्न बनने की अभिलाषा है और न संगीत सम्राट तानसेन की पदवी पर हक़ जमाने का । वह संगीत सम्राट के दीर्घायु होने की कामना करता है  वह मात्र यही याचना करना चाहता है की इस भयानक कानून को वापिस ले लिया जाये  नगर निवासियों अथवा किसी को भी नाचने-गाने की स्वतंत्रता दी जाये 
शहंशाह की आँखे नम हो आयी  तानसेन ने बैजू को गले लगा लिया । 
इस आदर्श बदले की आज भी मिसाल दी जाती है और दी जाती रहेगी. 

निष्कर्ष : बैजू बावरा और तानसेन दोनों ही मनुष्य हैं, और उनके रक्त का रंग एक ही है। उनके बीच का अंतर केवल उनकी सामाजिक स्थिति का है, जो कि महत्वपूर्ण नहीं है। दोनों ही संगीत में प्रतिभाशाली हैं, और उन्हें अपनी प्रतिभा के आधार पर आंका जाना चाहिए। तानसेन को अपनी ईर्ष्या और घमंड को त्यागकर बैजू बावरा की प्रतिभा को स्वीकार करना चाहिए जैसा उन्होंने किया 

यह कहानी हमें सिखाती है कि हमें जाति, धर्म, या सामाजिक स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए। हमें सभी मनुष्यों को समान मानना चाहिए और उनकी प्रतिभा को महत्व देना चाहिए।

यह कहानी "तुम्हारा खून खून है, हमारा खून पानी" की भावना को एक सकारात्मक संदेश देती है।








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